जब ऑफिस की राजनीति में बड़े शब्द बन गए छोटे-मोटे बदले का हथियार
कहते हैं, "जब तीर-तलवार न चले तो शब्द का वार सबसे गहरा होता है।" दफ्तर की राजनीति में जब सामने वाला चालाक और अड़ियल हो, तो सीधा-सादा तरीका अक्सर बेअसर हो जाता है। ऐसे में कभी-कभी ज़ुबान का ताना सबसे असरदार हथियार बन जाता है। आज की कहानी एक ऐसे ऑफिस की है, जहाँ एक सुपरवाइज़र ने अपने "मुसीबत कर्मचारी" को शब्दों के जाल में उलझा कर ऐसा सबक सिखाया कि बाकी लोग भी मुस्कुरा उठे।