होटल के रिसेप्शन पर एक और पागलखाने जैसी शाम: जब मेहमान बने सिरदर्द
कभी-कभी लगता है कि होटल के रिसेप्शन पर काम करना किसी मनोरोग अस्पताल में ड्यूटी करने से कम नहीं! एक-से-एक अजीबो-गरीब मेहमान, रोज़-रोज़ नई चुनौतियाँ, और ऊपर से नियमों की कड़ाई—कसम से, दिमाग का दही हो जाता है। हाल ही में यूके की एक नामी होटल चेन में घटी एक घटना पढ़कर तो यही लगा कि "मेहमान भगवान है" वाली कहावत अब सिर्फ कहावत बनकर रह गई है।
सोचिए, आप रिसेप्शन पर खड़े हैं, और कोई साहब आते ही अपना गुस्सा, अपनी शर्तें और अपने नियम थोपने लगते हैं—जैसे होटल उन्हीं के लिए बना हो, बाकी सब उनके नौकर!