जब होटल बना खेल का मैदान: बच्चों की शरारतें और माता-पिता की लापरवाही
होटलों में ग्रुप बुकिंग अक्सर किसी जुआ से कम नहीं लगती। कभी तो सब कुछ शांति से चलता है, और कभी ऐसा लगता है जैसे बारात आ गई हो! हाल ही में एक होटल में लगभग एक तिहाई कमरे एक युवा स्पोर्ट्स टीम ने बुक किए। अब सोचिए, 90 के करीब बच्चे और उनके माता-पिता - होटल का हाल क्या हुआ होगा, अंदाज़ा लगाइए।
इस टीम के जाने का दिन जैसे-जैसे करीब आ रहा था, वैसे-वैसे होटल के कर्मचारियों की सांसें भी ऊपर-नीचे हो रही थीं। बतौर नाइट ऑडिटर, जब मैं आखिरी रात आया, तो ईमेल्स और मैसेज देखकर दिमाग घूम गया। इतने कारनामे कि होटल की दीवारें भी शरमा जाएं!