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ऑफिस की तकनीकी टीम की सुबह का झटका: जब यूज़र की मासूमियत ने सबको चौंका दिया

डेटा ट्रांसफर करते समय उपयोगकर्ता त्रुटियों से जूझता हुआ निराश पेशेवर।
एक फोटो-यथार्थवादी चित्रण जिसमें एक निराश कर्मचारी अप्रत्याशित डेटा ट्रांसफर समस्या से जूझता हुआ दिख रहा है, जो उपयोगकर्ता की cluelessness से दिन की शुरुआत की निराशा को बखूबी दर्शाता है।

हर ऑफिस की तकनीकी टीम (IT Support) के पास कुछ ऐसे किस्से होते हैं, जिन्हें सुनकर हँसी भी आती है और माथा भी ठनकता है। आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है—जहाँ एक यूज़र ने अपनी ’मासूमियत’ से पूरे टेक्निकल सपोर्ट स्टाफ का दिन बना दिया... या यूं कहिए, बिगाड़ दिया!

सोचिए, सुबह-सुबह चाय की चुस्की के साथ, काम पर ध्यान लगाने ही वाले हैं कि अचानक एक डिमांड आ जाती है—“भैया, ज़रा ये सारा डाटा DVD या USB में डाल दीजिए।” सुनने में तो सीधा-सादा, लेकिन असली मसाला तो इसके बाद शुरू होता है!

यूज़र की अजीब डिमांड: “C/users/USERNAME” चाहिए बस!

अक्सर भारतीय दफ्तरों में भी ऐसा होता है कि कोई पुराना कर्मचारी अपने पद से हटता है, फिर किसी और नाम से वापस आ जाता है—मानो टीवी सीरियल की री-एंट्री! अब सिस्टम के लिए तो ये नया ही इंसान है, मगर टीम को पुराने डाटा की जरूरत महसूस होती है। हुआ यूं कि हमारे किस्से के हीरो को आदेश मिला, “भैया, इस यूज़र का सारा डेटा DVD या USB में डाल दीजिए—बस C/users/USERNAME और Documents फोल्डर चाहिए।”

अब ज़रा सोचिए, इसमें कितनी गड़बड़ है—

  1. सबसे पहला सवाल—इतना ज़रूरी डाटा किसी ऐसे कंप्यूटर में क्यों रखा गया जो बैकअप पर ही नहीं है? जब कंपनी में One Drive और सर्वर मौजूद हैं, तो फिर शादी की एल्बम की तरह लोकल फोल्डर में क्यों?

  2. टीम का काम एक इंसान के लोकल ड्राइव पर ही क्यों अटका है? भाई, ऑफिस में सबका काम सिस्टम पर होना चाहिए, न कि किसी की पर्सनल डायरी में!

  3. कम से कम कंप्यूटर का नाम तो दे दो, जिससे पता चले कि वो कंप्यूटर अभी है भी या रिटायर हो गया। यहाँ तो हाल वही है—“नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा…”

  4. और मान लीजिए, किसी तरह डेटा मिल भी गया, तो इसको पेनड्राइव या DVD में डालना ही क्यों? सीधा कॉपी-पेस्ट कर लेते, न!

  5. सबसे मज़ेदार बात—यूज़र ने खुद कोई पेनड्राइव या DVD दी ही नहीं! और ये मानकर चल रहे हैं कि जहाँ वो बैठे हैं, वहाँ DVD प्लेयर जरूर होगा।

  6. ऊपर से, शायद उनके पास दूसरे लोगों की ड्राइव एक्सेस करने का अधिकार भी नहीं है। तो अगर सब कुछ मिल भी गया, तो पढ़ेंगे कैसे?

  7. और हाँ, यही यूज़र दो हफ्ते पहले अपनी Teams चैट हिस्ट्री को भी ट्रांसप्लांट करवाना चाहते थे, मानो उसमें रामायण-वेद छुपा है!

टेक सपोर्ट की दुनिया के दिलचस्प तजुर्बे

एक टिप्पणीकार ने बड़ी ईमानदारी से लिखा, “मुझे एंड यूज़र्स से नफरत है... बस!” (अब दफ्तरों में काम करने वाला हर टेक सपोर्ट बंदा इसका दर्द समझ सकता है!) किसी और ने सवाल उठाया—“बिना कंप्यूटर के, आप ये सब कैसे करेंगे?” वाकई, जैसे बिना रसोई के रसोईया, बिना गाड़ी के ड्राइवर!

और हां, वही पुराना सवाल—आपको कैसे पता चलेगा कि जो डाटा मांगा जा रहा है, वो वाकई उसी पुराने कर्मचारी का है? कहीं कोई और तो नहीं सोशल इंजीनियरिंग का जादू चला रहा? आखिरकार, हर साल कई बार कंपनियों में “सोशल इंजीनियरिंग ट्रेनिंग” भी तो होती है, ताकि ऐसे धोखे से बचा जा सके।

OP यानी कहानी के लेखक ने भी बताया, “सौभाग्य से मुझे ये चिंता नहीं करनी पड़ी, क्योंकि ये मेरी जिम्मेदारी नहीं थी। लेकिन मुझे आश्चर्य है, जिसने ये चेक किया कि फाइलें वाकई सही हैं या नहीं, उसने कैसे देखा? उसके पास भी तो दूसरों की ड्राइव का एक्सेस नहीं होगा।” आखिरकार, किस्मत से यूज़र ने अपना पुराना लैपटॉप रखा हुआ था, तो लोकल कैश से फाइल्स कॉपी कर दी गईं—वरना तो मामला खिचड़ी-खिचड़ी हो जाता!

भारतीय ऑफिस संस्कृति और टेक्नोलॉजी की जुगलबंदी

यह किस्सा सिर्फ विदेशी दफ्तरों का नहीं, अपने यहां भी रोज-रोज देखने मिलता है। अक्सर बॉस लोग, मैनेजर या अनुभवी कर्मचारी, टेक सपोर्ट को “अपना तरीका” सिखाने लगते हैं, जैसे “भैया, ऐसे ही कर दो, जल्दी हो जाएगा।” जब आप कंपनी की पॉलिसी की बात करते हैं, तो मुंह फुला लेते हैं—“हम तो इतने साल से ऐसे ही कर रहे हैं!”

एक और टिप्पणी में लिखा गया, “हमारे यहाँ लाइन मैनेजर को हर एक्स-यूज़र का सारा डेटा मिलना चाहिए, पर असलियत में कभी होता नहीं।” जब ऑफिशियल प्रोसेस को इग्नोर कर खुद का जुगाड़ शुरू कर देते हैं, फिर जब टेक्निकल टीम ना कहती है, तो नाराज हो जाते हैं—“क्या यार, इतना भी नहीं कर सकते?”

फिर आती है Teams चैट हिस्ट्री वाली बात—भैया, कुछ लोग तो Teams को अपनी नोटबुक समझ बैठे हैं। “मैंने बॉब से Teams पर पूछा था, अब हर बार वहीं सर्च करता हूँ, कहीं और लिखा ही नहीं!” जब चैट ऑटो-हाइड हो जाती है, तो परेशान हो जाते हैं। सच में, “बचपन का प्यार” की तरह Teams history को भी दिल से लगा लेते हैं।

टेक्निकल टीम का दर्द: समझिए तो सही!

अक्सर टेक्निकल टीम का काम दिखता नहीं, लेकिन जब डाटा गायब हो जाए, तो सबकी नजर उन्हीं पर जाती है। एक टिप्पणी में बहुत सही लिखा गया, “जब डाटा गायब होता है, तो मैनेजमेंट भी मानती है कि गलती यूज़र की है, जो डाटा गलत जगह रखा।” लेकिन तब तक तो दूध का दूध, पानी का पानी हो चुका होता है!

यही वजह है कि कई दफ्तरों में प्रोफाइल को “रोमिंग” पर रखा जाता है—ताकि आपकी सारी फाइलें सर्वर में खुद-ब-खुद सेव होती रहें। लेकिन जब तक लोग खुद सीखेंगे नहीं, तब तक यह “ID10T” नामक एरर (यानी user की गलती) चलती रहेगी।

आपकी राय?

तो दोस्तों, क्या आपके ऑफिस में भी ऐसे ही किस्से होते हैं? कभी किसी ने आपसे Teams history बचाने को कहा, या डाटा DVD में डालने की फरमाइश की? अपने मजेदार (या सिर पकड़ने लायक) अनुभव हमारे साथ ज़रूर शेयर करें! क्योंकि ऑफिस की ये कहानियां, सच कहें तो, सबको जोड़ती हैं और कभी-कभी हँसने का मौका भी देती हैं।

अगर आपको यह ब्लॉग पसंद आया हो, तो नीचे कमेंट करें, अपने दोस्तों के साथ शेयर करें, और अगली बार जब कोई “C/users/USERNAME” मांगे—तो मुस्कुरा लें, क्योंकि आप अकेले नहीं हैं!


मूल रेडिट पोस्ट: No better way to start the day than with a large dose of exasperation at user cluelessness.