“भैया, मैं तो होटल में रोज़ रुकता हूँ!” – होटल स्टाफ़ की दर्दभरी दास्तान
अगर आप कभी होटल में ठहरे हैं, तो रिसेप्शन पर बैठे उस कर्मचारी के चेहरे के हाव-भाव आपने ज़रूर पढ़े होंगे – कभी मुस्कुराहट में लिपटी थकान, कभी आँखों में “फिर वही सवाल!” वाला भाव। मगर क्या आपने कभी सोचा है कि हर बार ‘साहब, मैं तो बड़े-बड़े होटलों में रुका हूँ’ कहने वाले मेहमानों की फरमाइशें, होटल स्टाफ़ के लिए कितनी सिरदर्दी बन जाती हैं?
आज हम आपको सुनाते हैं एक होटल नाइट ऑडिटर की दास्तान, जिसने Reddit पर अपना दिल खोलकर रख दिया। उसकी कहानी में न सिर्फ़ उसकी भड़ास है, बल्कि होटल इंडस्ट्री के अंदरूनी चटपटे किस्से भी छिपे हैं, जिनमें हर हिंदुस्तानी को अपने दफ्तर वाले “मालिक के कहे बिना पत्ता भी नहीं हिलता” वाले अनुभव की झलक जरूर मिलेगी।