जब बॉस बनना भी पड़ा और कर्मचारी भी रहना पड़ा – एक नौकरी की अनोखी जुगलबंदी
हर ऑफिस में एक न एक ऐसा शख्स जरूर होता है, जिसे सब काम का उस्ताद मानते हैं, लेकिन असल में उसका ओहदा वैसा नहीं होता। आप सोच रहे होंगे, “यार, ये तो हमारे ऑफिस में भी होता है!” तो जनाब, आज की कहानी बिलकुल आपके दिल के करीब है। यह किस्सा एक मनोचिकित्सा आपातकालीन सेवा (Psychiatric Emergency Service) यूनिट का है, जिसमें हमारे नायक ने वो खेल कर दिखाया, जिसे सुनकर हर भारतीय कर्मचारी बोलेगा – “वाह भई, क्या दिमाग लगाया!”