होटल में मेहमानों की मनमानी: क्या कभी उन्हें भी रेटिंग मिलनी चाहिए?
सोचिए, आप एक होटल के रिसेप्शन पर खड़े हैं। सामने कोई साहब आते हैं, चेहरा तमतमाया हुआ, आवाज़ में गुस्सा और शिकायतों की झड़ी—कभी पार्किंग को लेकर, कभी कमरे के कालीन पर, तो कभी खिड़की से दिखने वाले नज़ारे पर। होटल स्टाफ की हालत ऐसी, जैसे बिन बात के कसूरवार! और ऊपर से विदा होते वक्त एक शानदार 1-स्टार रिव्यू छोड़ जाते हैं, जैसे कोई ताज छोड़ रहे हों।
इन हालात में कभी-कभी दिल से यही निकलता है—अरे भई, अगर मेहमान हमें रेट कर सकते हैं, तो क्या हम भी उन्हें रेट नहीं कर सकते?