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हवाई रिज़ॉर्ट की मीठी बदला-गाथा: जब बॉस की चालाकी पर भारी पड़ी छोटी सी शरारत

सुकून भरे हवाई रिसॉर्ट का कार्टून 3D चित्र, जिसमें ताड़ के पेड़ और महासागर का दृश्य है, आराम के लिए बिल्कुल सही।
इस कार्टून-3D हवाई रिसॉर्ट की जीवंत सुंदरता में डूब जाइए, जहाँ शांति और breathtaking महासागर का दृश्य मिलता है। स्वर्ग का अनुभव करें!

हर दफ़्तर में एक न एक ‘टॉम’ जरूर होता है—वो जो हमेशा आपकी फाइलों में ताक-झाँक करता है, आपके काम का क्रेडिट लेना चाहता है और फिर उड़-उड़कर अपनी ‘सफलता’ की ढिंढोरा पीटता है। ऐसे लोगों से निपटना आसान नहीं, लेकिन कभी-कभी किस्मत और थोड़ी सी चालाकी मिल जाए, तो उनके घमंड की हवा निकालने में मज़ा ही कुछ और है!

आज हम आपको ऐसी ही एक कहानी सुनाने वाले हैं, जिसमें ऑफिस की राजनीति, हवाई यात्रा, और मीठी बदला-गाथा का तड़का लगा है। पढ़िए, कैसे एक ईमानदार कर्मचारी ने अपने चुपके-चुपके चालें चलने वाले सुपरवाइजर को ‘हवाई’ में ही चित्त कर दिया!

हवाई यात्रा—इनाम या इम्तहान?

कहानी है 90 के दशक की, जब दफ्तरों में कंप्यूटर की जगह कागज़ी दस्तावेज़ और टेलीफोन कॉल्स आम बात थी। हमारे नायक लगभग 15 साल से एक कंपनी में काम कर रहे थे। हर साल वे और उनके दोस्त ‘बर्ट’ एक अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस में हिस्सा लेने हवाई (Hawaii) जाते, जो उनके लिए जैसे साल का सबसे बड़ा इनाम होता।

हवाई का वो आलीशान रिसॉर्ट—समुद्र के किनारे, लिमिटेड कमरे, और अगर समय रहते बुकिंग न हो तो बाहर होटल में रहना पड़ता। ऐसे मौके में, ऑफिस के वही ‘टॉम’ सुपरवाइजर बनकर आया, जो नायक की डेस्क पर पड़े दस्तावेज़ चुपके-चुपके पढ़ता था, और फिर उसी को अपने लोगों को दे देता था जैसे खुद बनाया हो।

एक दिन टॉम ने ‘हवाई कांफ्रेंस’ के लिए नायक की ट्रैवल फॉर्म देख ली और खुद भी फार्म भर दिया। चूंकि फंडिंग सिर्फ दो लोगों की थी, ऊपर तक पहुंचकर टॉम ने खुद को भी उस लिस्ट में घुसेड़ लिया। अब नायक और बर्ट में से किसी एक को पीछे हटना था—तय हुआ सिक्का उछालने से, और किस्मत से नायक जीत गया।

बदला—छोटी सी शरारत, बड़ा असर

अब असली खेल शुरू हुआ। नायक के पास ढेरों ‘फ्रीक्वेंट फ्लायर माइल्स’ थीं, तो वे बिज़नेस क्लास से फर्स्ट क्लास में अपग्रेड हो गए—और टॉम को कानों-कान खबर न हुई। टॉम पूरे ऑफिस में ढोल पीटता फिरा कि वह बिज़नेस क्लास में हवाई जा रहा है, रिसॉर्ट में रुकेगा, और नायक से उम्मीद करता था कि उसे सब बढ़िया जगहें दिखाएगा, बढ़िया खाना खिलाएगा।

लेकिन नायक को टॉम की ये बेतुकी उम्मीदें और घमंड कतई पसंद नहीं थीं। तभी नायक ने वो किया जिसे ‘शरारती बदला’ कहा जा सकता है—टॉम की फ्लाइट और होटल बुकिंग में हल्का सा फेरबदल।

जैसे एक टिप्पणीकार ने चुटकी ली—“भाई, ऐसे घमंडी लोगों का ट्रिप इस तरह बिगाड़ा जाए, तो मज़ा ही आ जाए!” वहीं, एक और पाठक ने कहा, “टॉम तो अब ज़िंदगी भर एयरलाइन वालों को कोसता रहेगा, अपनी गलती कभी मानेगा ही नहीं!”

पुराने ज़माने की ट्रैवलिंग—जहाँ चालाकी थी आसान

आज के जमाने में तो एयरलाइन या होटल की बुकिंग बदलना मुश्किल है—ओटीपी, आधार, सेक्योरिटी सवाल, और जाने क्या-क्या! लेकिन 90 के दशक में बस टिकट नंबर और नाम बताओ, फोन पर बुकिंग बदलवा लो! एक पूर्व एयरलाइन कर्मचारी ने भी टिप्पणी की, “सिर्फ नाम और फ्लाइट नंबर चाहिए था, बाक़ी सब हो जाता था।”

नायक ने भी बस वही किया—फोन से टॉम की फ्लाइट एक दिन आगे सरका दी और होटल का कमरा कैंसिल करा दिया। जब टॉम एयरपोर्ट पहुँचा, तो उसे पता चला उसकी बुकिंग अगले दिन की है। किसी तरह वापस उसी दिन की फ्लाइट मिल गई, लेकिन अब सिर्फ ‘कोच’ में, वह भी बीच की सीट!

सोचिए, ऑफिस का घमंडी सुपरवाइजर, जो बिज़नेस क्लास के सपने देख रहा था, अब पांच सीटों की पंक्ति में भी बीच में फँसा हुआ, और वहीं नायक फर्स्ट क्लास में मस्ती कर रहा। टॉम बार-बार आकर शिकायत करता रहा, लेकिन नायक ने मुस्कुराते हुए मना कर दिया—“भाई, मेरी सीट मुझे प्यारी!”

होटल में भी मिली ठन-ठन गोपाल

हवाई पहुँचकर असली मज़ा तब आया, जब होटल रिसेप्शन पर टॉम को पता चला कि उसका कमरा ही नहीं है! रिसॉर्ट के सारे कमरे बिक चुके थे, और मैनेजर ने बड़ी मुश्किल से उसे एक दूर के मोटेल में ठिकाना दिलवाया। टॉम ने नायक से कमरा शेयर करने की गुहार लगाई, लेकिन नायक ने बहाना बना दिया कि कमरे में सिर्फ एक ही बेड है (जबकि असल में दो थे और बालकनी से समंदर का नज़ारा भी)।

यहाँ एक पाठक ने बड़ा मज़ेदार सुझाव दिया—“ऐसे टॉम जैसे लोगों के लिए तो डेस्क पर फर्जी कागज़ ही छोड़ देना चाहिए, ताकि खुद ही मुसीबत में फँस जाए!”

कहानी की सीख—बदला भी हो तो हिसाब से

इस कहानी पर पाठकों की राय बंटी रही—कुछ ने कहा, “मज़ेदार बदला था, ऐसे लोगों को सबक मिलना ही चाहिए।” वहीं, कुछ ने इसे ‘थोड़ा ज्यादा’ बता दिया, कि होटल और एयरलाइन के कर्मचारियों पर इसका बुरा असर पड़ा होगा। लेकिन सच बात तो यह है कि ऑफिस की राजनीति में कभी-कभी ऐसी छोटी-छोटी शरारतें ही बड़े सबक दे जाती हैं।

किसी ने बिल्कुल सही लिखा—“टॉम खुद अपनी चालाकी का शिकार हुआ, नायक ने बस उसे उसके हाल पर छोड़ दिया।”

निष्कर्ष—क्या आप भी ऐसा कर पाते?

दोस्तों, इस कहानी से यही सिखने को मिलता है—अगर कोई आपके सिर चढ़ने लगे, आपके काम में टांग अड़ाए, तो थोड़ा-सा दिमाग लगाकर आप भी उसे उसकी असली जगह दिखा सकते हैं। लेकिन ध्यान रहे, बदला भी संतुलित हो, और किसी निर्दोष को नुकसान न पहुँचे।

क्या आपके ऑफिस में भी कोई टॉम जैसा है? अगर हाँ, तो आप क्या करते? नीचे कमेंट करके जरूर बताइए, और ऐसी और कहानियों के लिए जुड़े रहिए हमारे साथ!


मूल रेडिट पोस्ट: Hawaiian Resort