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हमेशा ऐसे ही करते आए हैं' – दफ्तरों में जमीं पुरानी आदतों की दिलचस्प दास्तान

1980 के दशक में CAD प्रणाली मानकीकरण पर चर्चा करते इंजीनियरों की कार्टून-3D चित्रण।
1980 के दशक में CAD प्रणाली मानकीकरण पर सहयोग करते इंजीनियरों का जीवंत कार्टून-3D चित्रण, जो प्रौद्योगिकी और टीमवर्क के विकास को उजागर करता है।

हर दफ्तर में एक पुरानी कहावत खूब चलती है – "हमेशा ऐसे ही करते आए हैं!" चाहे सरकारी दफ्तर हो या प्राइवेट कंपनी, ये जुमला सुनना आम बात है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये 'ऐसे ही' शुरू कैसे हुआ? आज मैं आपको एक ऐसी तकनीकी दुनिया की कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जिसमें एक अजीबो-गरीब वजह ने हजारों कर्मचारियों और पाँच फैक्ट्रियों तक को एक ही ढर्रे पर सालों-साल चलाए रखा।

जब आदत बन गई सिस्टम!

1980 के दशक की बात है। अमेरिका की एक बड़ी इंजीनियरिंग कंपनी में CAD (Computer Aided Design) सिस्टम से जुड़े टेक्निकल सपोर्ट इंजीनियर को एक बड़ा जिम्मा दिया गया – कंपनी की हज़ारों ड्रॉइंग्स को एक ही स्टैंडर्ड में लाना। सोचिए, 30-40 ड्रॉइंग्स हर प्रोडक्ट यूनिट की, 20 कैटेगरी, और हज़ारों यूनिट्स! ऊपर से, हर ड्रॉइंग 30 साल में अलग-अलग इंजीनियरों के हाथों बनी।

अब तक सब ड्रॉइंग्स एक ही पैटर्न में थीं – नीचे, दाएँ, ऊपर, हर जगह राइट टू लेफ्ट (दाएँ से बाएँ)। लेकिन एक 'Interior Series' थी, जो उल्टा – लेफ्ट टू राइट (बाएँ से दाएँ) बनी थी। जिज्ञासु इंजीनियर ने पूछा – "ऐसा क्यों?" ड्राफ़्टिंग इंजीनियरों से लेकर आर्किटेक्ट्स और प्रोडक्शन तक, सबका एक ही जवाब – "हमें नहीं पता, हमेशा ऐसे ही करते आए हैं!"

"गुड ओल्ड रस" – आदत की जड़

सच्चाई जानने की ललक में इंजीनियर आख़िरकार एक 25 साल पुराने मैनेजर के पास पहुँचे। साहब हँसते-हँसते बोले – "अरे भाई, 30 साल पहले जब ये सब शुरू हुआ था, उस Interior Series के ड्रॉइंग्स 'गुड ओल्ड रस' बनाते थे। बेचारे रस थोड़े तिरछी नज़र वाले (cross-eyed) थे, उन्हें बाएँ से दाएँ लिखना आसान लगता था।"

बस, रस की ये व्यक्तिगत सुविधा कब कंपनी का 'स्टैंडर्ड प्रैक्टिस' बन गई, किसी को पता ही नहीं चला। रस तो रिटायर हो गए, पर उनकी आदत कंपनी की धरोहर बनकर हज़ारों ड्रॉइंग्स में जड़ जमा गई!

"हमेशा से ऐसे ही करते हैं" – दफ्तरों की संस्कृति

ये कहानी पढ़कर कई लोगों को अपने-अपने दफ्तरों की याद आ गई। एक पाठक ने लिखा – “हमारे यहाँ 120 साल पुराना कारखाना है। कुछ पार्ट्स 1920 के डिजाइन से चले आ रहे हैं। हर नई पीढ़ी सवाल करती है – 'इसे ऐसे क्यों बनाते हैं?' लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं मिलता। जब भी बदलाव की कोशिश हुई, रिजल्ट खराब ही आया। क्यों? वो असली वजहें, जो पुरानी पीढ़ी जानती थी, अब कोई याद नहीं रखता।”

एक और पाठक ने चुटकी ली – “कंपनी में सिखाया गया था – अगर गलती करो, तो भी लगातार एक जैसी गलती करो! कम-से-कम सब कुछ एक जैसा तो दिखेगा।”

यह बात सरकारी दफ्तरों की चाय वाली चर्चाओं से लेकर बड़ी MNCs तक, हर जगह फिट बैठती है। हमारे यहाँ भी तो फाइलों की सीरियल नंबरिंग, मुहर लगाने की दिशा, या फ़ाइलें ऊपर-नीचे रखने के नियम – सब पीढ़ी दर पीढ़ी चलते आ रहे हैं, बिना ये जाने कि शुरू क्यों हुआ था!

बदलाव की उलझनें और 'चेस्टर्टन की बाड़'

कई बार जब कोई नई सोच लाता है, तो पुराने लोग कहते हैं – “ऐसे ही ठीक है, मत छेड़ो!” एक पाठक ने 'चेस्टर्टन की बाड़' (Chesterton’s Fence) का बड़ा अच्छा उदाहरण दिया – जब तक ये न समझो कि कोई पुरानी चीज़ क्यों बनी थी, तब तक उसे हटाने की जल्दबाजी न करो।

एक और पाठक का कमेंट – "अगर कोई बदलाव करके देखता भी है, तो अक्सर सामने आता है कि नया तरीका उतना अच्छा नहीं, चाहे वजह किसी को याद हो या न हो।"

यहाँ तक कि एक पाठक ने तो कहा, “हमारे कॉलेज के रजिस्ट्रार ऑफिस ने नए सिस्टम के लिए कहा – पुराने सिस्टम की सारी 'विशेषताएँ' रखनी होंगी। अरे भई, पहले देख तो लो कि कौन सी आदतें वाकई ज़रूरी हैं!”

थोड़ी हँसी-मज़ाक, थोड़ी सीख

इन सब बातों को पढ़कर एक बात तो साफ है – दफ्तरों की संस्कृति में बदलाव लाना आसान नहीं। चाहे तकनीक बदल जाए, इंसानों की आदतें जल्दी नहीं जातीं। कई बार ये आदतें किसी 'गुड ओल्ड रस' की वजह से शुरू होती हैं, कभी किसी पुराने बॉस की जिद्द, तो कभी किसी सरकारी नियम की वजह से।

हमारे यहाँ भी, 'सरकारी नौकरशाही' वाली कहावत – "फाइल ऐसे ही चलती है!" – तो हर कोई सुन चुका है। परिवारों में भी, दादी-नानी के नुस्खे हों या पापा की चाय बनाने की स्टाइल – "हमेशा ऐसे ही करते आए हैं" का जादू हर जगह चलता है।

निष्कर्ष – क्या आप भी किसी 'रस' की परंपरा निभा रहे हैं?

यह कहानी सिर्फ तकनीकी दुनिया की नहीं, बल्कि हर दफ्तर, हर परिवार, हर समाज की है। कभी-कभी ज़रूरत है, पुराने ढर्रे को समझने की, उसकी असली वजह जानने की। क्या पता, आप भी किसी 'रस' की गढ़ी परंपरा के सहारे ही तो नहीं चल रहे?

अब आपकी बारी – क्या आपके दफ्तर, परिवार या मोहल्ले में भी ऐसी कोई अनोखी परंपरा है, जिसका कारण किसी को याद नहीं? कमेंट में जरूर बताइए, और अपने दोस्तों के साथ ये मजेदार कहानी शेयर कीजिए!

क्योंकि, "हमेशा ऐसे ही करते आए हैं" – में भी छुपा है एक बड़ा मज़ेदार राज़!


मूल रेडिट पोस्ट: Because we've always done it that way.