होटल रिसेप्शन पर 'आईडी' की जिद: एक जिद्दी मेहमान की अजब कहानी
कहते हैं, "साधारण समझदारी सबसे असाधारण चीज़ है" – और होटल रिसेप्शन पर काम करते हुए आपको इसका असली मतलब रोज़ ही देखने को मिल जाता है। आज मैं आपको ऐसी ही एक मजेदार घटना सुनाने जा रहा हूँ, जिसमें एक आईडी कार्ड ने न जाने कितनी नौटंकी, बहसबाज़ी और ‘नाटकबाज़ी’ खड़ी कर दी। अगर आपको लगता है कि सिर्फ भारत में ग्राहक ‘राजा’ होते हैं, तो जनाब, ये किस्सा आपको सोचने पर मजबूर कर देगा!
होटल की दुनिया का "मिस्टर मिसरी"
इस कहानी के मुख्य पात्र हैं मिस्टर मिसरी – नाम से ही अंदाज़ा लगा लीजिए कि साहब कितने ‘मूड’ में रहते होंगे! उम्रदराज़, अनुभव में भारी, लेकिन तमीज़ में कंजूस। इन्होंने अपने नाम से दो कमरे बुक किए थे – एक खुद के लिए, दूसरा अपने दोस्त मिस्टर हम्बल के लिए।
अब मिस्टर हम्बल समय से आधा घंटा पहले ही होटल पहुँच गए। रिसेप्शन पर जब मैंने उनसे आईडी मांगी, तो पहले तो थोड़ा झल्लाए, फिर अपने दोस्त मिस्टर मिसरी को फोन लगाया। मैंने साफ़ कह दिया, “सर, कम से कम अपने दोस्त की आईडी की फोटो ही भेज दें, हम उसी पर काम चला लेंगे।” वैसे बहुत सारे होटल में फोटो आईडी स्वीकार नहीं करते, लेकिन हमारे यहाँ थोड़ी नरमी है।
‘आईडी’ का महायुद्ध: जब बात-बात पर तू-तू, मैं-मैं
यहाँ से असली ड्रामा शुरू होता है। मिस्टर मिसरी ने सीधे रिसेप्शन पर फोन घुमा दिया और बोले, “ये क्या बेवकूफी है! मेरे गेस्ट को रूम क्यों नहीं मिल रहा?” मैंने बहुत शांति से समझाया कि ये होटल की सुरक्षा नीति है, लेकिन साहब को तो जैसे किसी ने गर्म तेल में हाथ डाल दिया हो! “मैंने कभी ऐसी बकवास नहीं सुनी!” – उनकी बीवी ने फोन छीना और बड़े सलीके से बात समझी, आईडी की फोटो भेज दी, और बात खत्म।
मिस्टर हम्बल ने तो माफी भी मांग ली, बोले, “मेरा दोस्त बड़ा ज़िद्दी है।” मैंने भी हँसते हुए कहा, “सर, मुझे बस अपना काम करना है, किसी को परेशान करना मकसद नहीं।”
"कस्टमर हमेशा सही है" – लेकिन कब तक?
अब सोचिए, कहानी यहीं खत्म हो जाती, तो मिस्टर मिसरी ‘मिसरी’ कैसे होते? करीब आधे घंटे बाद, खुद मिस्टर मिसरी होटल पधारे। शुरूआत में तो ठीक-ठाक रहे, लेकिन जैसे ही मुझे देखा, फिर से शुरू हो गए – “यही हैं वो, जिनसे फोन पर बात हुई थी?” फिर पुरानी रट, “मेरे दोस्त को रूम नहीं दिया, ऐसी पॉलिसी पहले कभी नहीं देखी!”
मैंने बहुत विनम्रता से समझाया, “सर, अगर आपको होटल की नीति से दिक्कत है, तो बुकिंग कैंसल भी की जा सकती है।” इस पर तो वे आगबबूला हो गए, “क्या आप मुझे धमका रहे हैं?” मैंने कहा, “नहीं सर, ये तो नियम हैं, आप चाहें तो मैनेजर से बात कर सकते हैं।”
यहाँ कम्युनिटी के एक कमेंट को याद करता हूँ – "यहाँ तो हर कस्टमर को लगता है, मैनेजर से बात करके सब बदल जाएगा!" यही हुआ – मिस्टर मिसरी ने मैनेजर का कार्ड लिया, और बड़े ताव से बोले, “कल देख लीजिएगा!”
होटल स्टाफ की मुश्किलें और "फ्री वाले ब्रेकफास्ट" का जुगाड़
अब तो सब शांत हो जाना चाहिए था, लेकिन जनाब का गुस्सा ठंडा कहाँ हुआ! कुछ घंटे बाद फिर लौटे – इस बार मेरे सहकर्मी के पास जाकर बोले, “इस आदमी का नाम इस कार्ड पर लिख दो।” सहकर्मी ने मना किया, तो खुद मेरे पास आए। मैंने पूछा, “किसलिए?” जवाब – “ये आपकी जरूरत नहीं!” मैंने भी दो टूक कह दिया, “अगर मेरा नाम है, तो मेरी जरूरत है।”
फिर वही हंगामा – “आपका एटीट्यूड बड़ा खराब है! मुझे मैनेजर से भी और कॉरपोरेट ऑफिस से भी शिकायत करनी है!” मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा, “सर, आप जो चाहें कर सकते हैं, मुझे कोई आपत्ति नहीं।”
यहाँ कम्युनिटी में एक मजेदार कमेंट था – "हर बार जब कोई कहता है ‘मैं कॉरपोरेट में शिकायत करूँगा’, तभी तो समझो असली तमाशा शुरू होता है!" असल में, अक्सर ऐसे लोग सिर्फ शोर मचाते हैं, मैनेजर भी शांत करवाने के लिए ‘फ्री वाला ब्रेकफास्ट’ थमा देते हैं – जैसा यहाँ भी हुआ।
एक कमेंट में किसी ने लिखा, "ऐसे लोगों को इनाम देने से वे बार-बार ऐसी हरकतें करते हैं।" सच भी है – अगर हर बार कोई गुस्से में आकर फ़ायदा पा जाए, तो अगली बार वही तरीका अपनाएगा।
होटल का सच – ग्राहक राजा, लेकिन स्टाफ भी इंसान!
कई लोगों ने सलाह दी कि ऐसे ग्राहकों को "DNR" (Do Not Rent) लिस्ट में डाल देना चाहिए, यानी भविष्य में कमरा ही न देना चाहिए। किसी ने चुटकी ली – “शायद उनकी बीवी ने पहले ही फॉर्म भर दिया हो!”
असलियत ये है कि होटल स्टाफ पर अक्सर बेवजह का दबाव बना दिया जाता है – एक कमेंट में किसी ने लिखा, “सही शिकायत करने वाले शांत ग्राहक तो अनदेखे रह जाते हैं, और चिल्लाने वाला बोनस ले जाता है।”
इस पूरे मामले में मेरे लिए सबसे अजीब बात यही रही कि आखिरकार मिस्टर मिसरी को और उनके दोस्त को ‘फ्री ब्रेकफास्ट’ मिल ही गया! काश, होटल मैनेजमेंट कभी-कभी ‘नीतियों’ पर भी उतना ही अडिग रहे, जितना वे ‘कस्टमर सर्विस’ पर रहते हैं।
निष्कर्ष: आपकी राय क्या है?
तो भाइयों-बहनों, अगली बार जब आप होटल जाएँ, रिसेप्शन पर किसी को बहस करते देखें, तो याद रखिए – कभी-कभी छोटी सी आईडी बड़ी-बड़ी कहानियाँ खड़ी कर सकती है! ग्राहक राजा ज़रूर है, लेकिन स्टाफ भी अपना काम कर रहा है – थोड़ा सब्र, थोड़ा समझदारी, और बहुत सी मुस्कान, यही होटल का असली फॉर्मूला है।
आपका क्या अनुभव है? कभी आपको भी ऐसे ‘मिसरी’ टाइप ग्राहक या स्टाफ से पाला पड़ा है? कमेंट में ज़रूर बताइए, और अगर कहानी पसंद आई हो तो अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें!
मूल रेडिट पोस्ट: All this for an ID