होटल रिसेप्शन की ड्यूटी: जब लगता है अब इससे बुरा नहीं हो सकता!
कभी-कभी जीवन में कुछ ऐसी नौकरी मिल जाती है जिसमें लगता है, "अब इससे बुरा क्या हो सकता है?" लेकिन होटल रिसेप्शन की ड्यूटी करने वालों के लिए, ये सवाल हर दिन एक नया रूप ले लेता है। सोचिए, आप सुबह 7 बजे से 3 बजे तक की शिफ्ट पर हैं, लेकिन आपका साथी हर बार नदारद! दो दिन से लगातार वही कहानी और अगले दिन भी वही साथी फिर से गायब! ऊपर से, 3 बजे चेक-इन का टाइम, यानी गजब का मेल – मेहमानों का सैलाब और शिफ्ट हैंडओवर एक साथ!
रिसेप्शन पर मेला, हैंडओवर में झमेला
अब ज़रा सोचिए, आपके होटल का नियम है कि शिफ्ट बदलते ही, यानी 3 बजे, चेक-इन भी शुरू हो जाता है। ठीक उसी वक्त आपको पिछली शिफ्ट का हाल, पेंडिंग काम, मेहमानों के स्पेशल रिक्वेस्ट और मरम्मत के मुद्दे अगले साथी को समझाने हैं। लेकिन असलियत में, दोनों लोग आधे-अधूरे मन से एक-दूसरे को समझाने की कोशिश कर रहे हैं, हर 30 सेकंड में कोई नया मेहमान दस्तक दे रहा है, कोई पूछ रहा है – "मेरा कमरा कब मिलेगा?" कोई पूछ रहा है – "पार्किंग कहाँ है?" और ऐसे में, हाथ-पाँव फूलना तो लाजमी है!
एक कमेंट में एक पाठक ने लिखा, "शिफ्ट चेंज और चेक-इन एक ही टाइम पर रखना तो हमारे यहाँ भी किसी कलेक्टर की मेहरबानी हो गई।" ऐसे में कोई भी रिसेप्शनिस्ट भगवान को याद करने लगेगा!
इंतजार करती भीड़, बेमन से सुनती बातें
3 से 4 बजे तक तो जैसे रिसेप्शन पर कुंभ का मेला लग जाता है! 20 से ज्यादा चेक-इन, लंबी लाइन, और हर कोई आपको ऐसे घूर रहा है जैसे आप कोई सर्कस का जोकर हों! सबसे मजेदार बात – जब अपनी बारी आती है तो लोग मोबाइल में घुसे रहते हैं, आप उधर पार्किंग समझा रहे हैं, इधर वो "हाँ-हाँ" करते हुए फॉर्म में नाम भर रहे हैं। और फिर पूछते हैं, "पार्किंग के पैसे कहाँ देने हैं?"
कसम से, ये वही फीलिंग है जब मां रसोई में तीन बार कह चुकी होती है, "खाना टेबल पर है", लेकिन भाईसाहब मोबाइल से नजर उठाए बिना पूछते हैं – "मम्मी, खाना कहाँ है?"
एक पाठक ने तो कमेंट में तंज कसते हुए लिखा, "इतनी बार बोर्ड लगा है, फिर भी सब भूल जाते हैं।"
पुरानी खिड़की, नई फरियादें – मेहमानों का नया ड्रामा
इस सब के बीच, एक बुजुर्ग दंपती जिन्हें आपने 3 बजे चेक-इन कराया, वापस आते हैं – "कमरा ठंडा है, खिड़की से हवा आ रही है, हीटर भी खराब है। हमें दूसरा कमरा चाहिए।" होटल लगभग फुल है, खाली सिर्फ फैमिली रूम, वो भी अभी तैयार नहीं। फिर मेंटेनेंस वाला आता है, खिड़की सील करता है, एसी वाला कहता है – "हीटर तो गरम हवा दे रहा है।" और दंपती तो बगैर पूछे ही सामान लेकर रिसेप्शन पर खड़े हो जाते हैं, जैसे – "तो, नया कमरा कब मिलेगा?"
ऊपर से फरमाइश – "अगर कमरा सामने वाली तरफ हो तो अच्छा रहेगा।" अब भाई, वो तो अपग्रेड है, उसके पैसे अलग लगते हैं! लेकिन सिस्टम ने जो कमरा दिया, वो तो केवल किस्मत से था। आप समझा रहे हैं – "ये डबल बेड है, सोफा बेड बना नहीं है, अभी भीड़ है, स्टाफ नहीं है, खुद ही देख लीजिए।" और इस बीच कतार बढ़ती जा रही है!
एक पाठक ने बिलकुल भारतीय अंदाज में टिपण्णी की – "ऐसे मेहमानों को तो शादी-ब्याह में भी देखा है, पहले से प्लेट पकड़कर लाइन में लग जाते हैं, फिर कहते हैं – 'कुछ मीठा नहीं मिला!'"
प्रबंधन की कमाल नीति और कर्मचारियों की लाचारी
सबसे बड़ा सिरदर्द – जो साथी हर बार गायब रहता है, उसे हटाया क्यों नहीं जाता? इसका जवाब खुद ओपी (लेखक) ने दिया – "जो काम पर आता है, उसे हटाएंगे तो दूसरा मिलेगा ही नहीं। जो आते भी हैं, एक हफ्ते में भाग जाते हैं।" प्रबंधन के पास बजट नहीं, ऊपर से हर छोटी मरम्मत के लिए पांच जगह से मंजूरी चाहिए। और होटल? तंग हाल, रिसेप्शनिस्ट अकेला, ऊपर से सफाई भी करनी है!
एक पाठक का अनुभव था – "हमारे यहाँ भी अफसर लोग नई-नई नीतियाँ लाकर सबकी ऐसी की तैसी कर देते हैं। हफ्ते भर में ही सब वापस पुराना तरीका अपना लेते हैं।" वही हाल यहाँ भी है।
कुछ पाठकों ने सलाह दी, "हर दिन का लॉग लिखना शुरू करो, ताकि जब कोई सवाल पूछे तो 'ये रहा सबूत' दिखा सको।" लेकिन यहाँ तो हाल ये है कि मैनेजर कभी-कभी ही आता है, बाकी समय सब अपने भरोसे!
आखिर में – ये नौकरी मुश्किल क्यों है?
ओपी लिखते हैं – "ये नौकरी मेहमानों या साथियों की वजह से नहीं, बल्कि दोनों के एक साथ सिर पर चढ़ जाने पर मुश्किल होती है।" और सच कहें तो, ये लाइन हर उस इंसान की कहानी है जो भारत के बैंक, अस्पताल, या किसी भी काउंटर पर अकेले बैठा होता है। ऊपर से मैनेजमेंट का एक ही मंत्र – जितना निचोड़ सकते हो, निचोड़ लो!
निष्कर्ष – आपकी कहानी क्या है?
दोस्तों, अगर आपने कभी रिसेप्शन, बैंक, रेलवे, या किसी सरकारी दफ्तर की काउंटर ड्यूटी की है तो आपको इस कहानी में अपना अक्स जरूर दिखा होगा। क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ है? अपने अनुभव या मजेदार किस्से कमेंट में जरूर शेयर करें। आखिरकार, ये सारी कहानियाँ हमारे समाज की असली तस्वीर हैं – जहाँ सिस्टम की गड़बड़ी और लोगों की उम्मीदों के बीच, बेचारा कर्मचारी ही पिसता है!
आपकी राय क्या है? क्या ऐसे सिस्टम बदल सकते हैं, या हमें भी "जैसा चलता है, वैसे ही चलने दो" वाली सोच में रहना पड़ेगा? अपने विचार ज़रूर बताइए!
मूल रेडिट पोस्ट: When you think it can't any worse