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होटल रिसेप्शन की कहानियाँ: जब 'सीख लो भाई' कहना पड़ जाए बार-बार!

रिसेप्शन पर निराश होटल कर्मचारी, बुकिंग प्रबंधन की चुनौतियों को दर्शाता हुआ।
एक होटल कर्मचारी की फोटोरियलिस्टिक छवि, जो रिसेप्शन पर निराशा व्यक्त कर रहा है। यह बुकिंग और मेहमान अनुभव प्रबंधन में रोज़ की चुनौतियों को दर्शाता है। आइए, मैं अपने आतिथ्य उद्योग के अनुभव और विचार साझा करता हूँ!

कभी-कभी ऑफिस की ज़िंदगी किसी बॉलीवुड फिल्म से कम नहीं लगती। कोई कहेगा – “भैया, ये काम मुझे समझ नहीं आ रहा”, तो कोई सीधे-सीधे अपने ऊपर से जिम्मेदारी फेंककर, “आप ही कर दीजिए ना, मुझे नहीं आता!” कह देता है। होटल रिसेप्शन यानी Front Desk पर काम करने वालों की ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही होती है – रोज़ नए-नए मेहमान, नए सवाल और पुराने स्टाफ की पुरानी बहानेबाज़ी।

रिसेप्शन या रिज़र्वेशन? जिम्मेदारी की गेंद किसके पाले में!

कहानी है एक लोकप्रिय रिसॉर्ट की, जहाँ हमारे नायक पहले Front Desk पर थे और अब उन्हें प्रमोट करके Reservation डिपार्टमेंट में भेज दिया गया। पहले रिसेप्शन पर रहते हुए उन्होंने काम का “डमी प्रूफ” गाइड बना दिया था – मतलब, किसी को भी आसानी से समझ आ जाए कि वॉक-इन गेस्ट की बुकिंग कैसे करनी है, रूम चेंज कैसे करना है, कौन सा कमरा खाली है वगैरह।

पर अब क्या हो रहा है? रिसेप्शन पर बैठे सहकर्मी हर बार फोन घुमा देते हैं – “भैया, सामने गेस्ट खड़ा है, बुकिंग कर दीजिए!” और खुद मूकदर्शक बनकर खड़े हो जाते हैं। मेहमान बेचारे भी सोचते होंगे – “अरे, भाईसाहब तो सामने हैं, फिर फोन पर क्यों!”

ज़रा सोचिए, जैसे किसी शादी में हलवाई को सब्ज़ी बनानी आती है, फिर भी बार-बार किसी और से पूछे – “प्याज काटूं या टमाटर?” वैसे ही यहाँ, रिसेप्शन वाले हर छोटी-छोटी बात पर Reservation डिपार्टमेंट को परेशान कर रहे हैं।

“हॉकी सीज़न” और मिर्ची वाले मेहमान – हर कमरे की अलग कहानी

अब बात है Minnesota के ठंडे मौसम और हॉकी सीज़न की। यहाँ के मेहमान भी भारत के शादी-ब्याह वाले रिश्तेदारों जैसे – “मुझे #123 वाला कमरा चाहिए, क्योंकि मेरे ताऊजी उसी में हैं!” और रिसेप्शन वालों को कोई जोश नहीं – सीधे कॉल, “ये गेस्ट रूम बदलना चाहता है, आप बात कर लीजिए।” खुद कोई जुगाड़ करने की कोशिश तक नहीं।

एक बार तो -50°C की भयंकर ठंड में एक केबिन के पाइप फ्रीज़ हो गए, अब रिसेप्शन वाले बोले – “पाइप जम गए हैं, गेस्ट को दूसरा कमरा चाहिए।” Reservation वाले ने तुरंत जवाब दिया – “भाई, #1234 वाला बिल्कुल खाली और साफ है, उधर भेज दो।”

लेकिन जवाब – “मुझे ट्रांसफर करना नहीं आता।” अब सोचना पड़ता है, क्या हर बार नई ट्रेनिंग देनी पड़ेगी? जैसे हर बार आलू के पराठे बनाना सिखाना पड़े, वरना किचन बंद ही हो जाएगा!

“सीखना है तो खुद करना पड़ेगा!” – कम्युनिटी के जुमले और सीख

Reddit कम्युनिटी ने इस पर खूब मज़ेदार और काम की बातें कहीं। एक यूज़र बोले – “इतनी बार समझाने के बाद भी अगर रिसेप्शन वालों को नहीं आता, तो ये उनकी जिम्मेदारी है, आपकी नहीं।” बिलकुल वैसा ही जैसे ऑफिस में हर काम का ठेका एक ही बंदे पर न हो जाए!

दूसरे ने सलाह दी – “अब उन्हें खुद से कराओ, चाहे टाइम लगे। बिना खुद की गलती के डर के, करने दो। गलती होगी तो सीखेंगे भी।” हमारी हिंदी फिल्मों में भी तो यही दिखाया जाता है – “गलती इंसान से ही होती है, पर उसी से वो बड़ा बनता है।”

कोई बोला – “तीन बार सवाल पूछने की छूट दो, उसके बाद कहो – अब खुद सोचो, अगला स्टेप क्या होना चाहिए। जब तक खुद कोशिश नहीं करेंगे, सीखेंगे नहीं।”

एक अनुभवी मैनेजर ने अपनी ट्रेनिंग स्टाइल शेयर की – “देखो एक, करो एक, सिखाओ एक” – मतलब, पहले खुद देखो कैसे होता है, फिर खुद करो, फिर दूसरों को सिखाओ। जैसे पुराने ज़माने में गुरुकुल की परंपरा थी – शिष्य खुद सीखकर आगे सिखाता था।

कुछ ने तो मज़ाक में कहा – “अब तो मैनेजमेंट को बता दो, वरना रिसेप्शन वाले अपनी जिम्मेदारी आप पर ही डालते रहेंगे!” भाई, ये तो वही हो गया – “काजू कतली के चक्कर में हलवाई को रोज़ नई रेसिपी बतानी पड़ रही है।”

डर का इलाज – ग़लती करने दो, सीखने दो

बहुत से कमेंट्स में ये भी सामने आया कि नए लोग अक्सर फैसले लेने से डरते हैं – “अगर ग़लती हो गई तो?” लेकिन, जो मैनेजर हैं – वो कहते हैं, “डर का इलाज यही है कि खुद कोशिश करो, ग़लती होगी तो सीखने का मौका मिलेगा।”

जैसे क्रिकेट में नया खिलाड़ी पहली बार बैटिंग करने जाए तो घबराता है, पर जब तक क्रीज़ पर टिकेगा नहीं, रन बनाना नहीं सीखेगा। यहाँ भी वही बात – रिसेप्शन की ड्यूटी खुद करनी होगी, फोन घुमा-घुमा कर जिम्मेदारी नहीं टाली जा सकती।

निष्कर्ष: सीखना है तो मैदान में उतरना ही पड़ेगा!

ज़िंदगी के हर काम की तरह, रिसेप्शन का काम भी सीखने का है – और वो तब ही आता है जब खुद हाथ आजमाओ। बार-बार किसी और से करवा के, खुद कुछ नहीं सीख पाओगे।

तो अगली बार अगर आपके ऑफिस में कोई बार-बार “मुझे नहीं आता!” बोले, तो उसे शांति से कहिए – “पहले खुद कोशिश करो, गलती होगी तो हम हैं ही तुम्हारे साथ।”

आपका क्या अनुभव रहा है ऑफिस की ऐसी कहानियों में? कभी आपको भी किसी ने बार-बार एक ही बात पूछकर परेशान किया है? कमेंट में ज़रूर बताइए, और अगर ये किस्सा पसंद आया हो तो शेयर करना न भूलें!


मूल रेडिट पोस्ट: Fed up with my FDA