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होटल रिसेप्शनिस्ट की रात और दो 'इमोशनल सपोर्ट' कुत्तों वाली मेहमान

होटल के रिसेप्शनिस्ट और दो कुत्तों के साथ महिला के साथ रात का ऑडिट दृश्य, भावनात्मक समर्थन जानवरों को उजागर करता है।
इस फोटो-यथार्थवादी चित्रण में, एक होटल रिसेप्शनिस्ट रात के ऑडिट की जटिलताओं का सामना कर रहा है, जबकि एक मेहमान अपनी दो भावनात्मक समर्थन कुत्तों के साथ arrives करती है। हमारे नवीनतम ब्लॉग पोस्ट, "रात के ऑडिट की एक और कहानी" में रात के समय चेक-इन के साथ आने वाली अप्रत्याशित चुनौतियों को जानें।

होटल की रात की शिफ्ट में काम करना वैसे ही कम रोमांचक नहीं होता, लेकिन कभी-कभी ऐसी घटनाएं हो जाती हैं कि नींद तो दूर, हंसी भी रोकना मुश्किल हो जाता है। आज की कहानी एक ऐसे ही रिसेप्शनिस्ट की है, जिसे रात के समय एक महिला मेहमान से दो-दो हाथ करने पड़े—और वजह थी उसके दो प्यारे 'इमोशनल सपोर्ट' कुत्ते!

होटल में 'इमोशनल सपोर्ट एनिमल' का झमेला

भाई साहब, हमारे देश में तो पालतू जानवरों को हम 'परिवार का हिस्सा' मानते हैं—जैसे बबलू की मम्मी का टॉमी या शर्मा जी की बिल्ली। लेकिन पश्चिमी देशों में अब एक नया चलन है—'इमोशनल सपोर्ट एनिमल'। मतलब, अगर आपको लगता है कि आपका कुत्ता या बिल्ली आपका मूड सुधारता है, तो आप उसे 'इमोशनल सपोर्ट' घोषित कर सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस नाम से कुछ लोग होटल, फ्लाइट या बस में अपने जानवर को मुफ्त घुमाने की कोशिश करने लगते हैं!

इस कहानी के हीरो रिसेप्शनिस्ट साहब ने भी जब महिला से कहा, "मैडम, हर जानवर के लिए 20 डॉलर फीस देनी होगी," तो मैडम ने तुरंत तीर चला दिया, "ये मेरे 'इमोशनल सपोर्ट' एनिमल हैं, इनमें फीस नहीं लगती!" अब भैया, हमारे यहां तो कोई अगर बोले, "ये मेरा सहारा है," तो लोग इज्जत देंगे, पर होटल के नियम तो नियम हैं। रिसेप्शनिस्ट ने भी साफ कह दिया, "मैडम, सेवा वाले जानवर (Service Animal) और इमोशनल सपोर्ट एनिमल में फर्क होता है। यहां नियम है, तो फीस तो देनी ही पड़ेगी।"

बहस, गाली-गलौज और धमकी—मेहमान भी कमाल के!

मां कसम, इसके बाद जो हंगामा मचा, वो किसी टीवी सीरियल से कम नहीं था! महिला ने गुस्से में चिल्लाना शुरू कर दिया, "बाकी होटल वाले तो कुछ नहीं कहते! तुम तो एकदम घटिया इंसान हो!" बाहर जाकर रिसेप्शनिस्ट को धमकाने लगीं—"बाहर आओ, तुम्हें सबक सिखाती हूं!"

अब सोचिए, अपने यहां तो ऐसे हालात में स्टाफ मजबूरी में, "मैडम, चलिए बैठिए, चाय पी लीजिए," कहकर माहौल शांत करते हैं। मगर यहां रिसेप्शनिस्ट ने भी दो टूक बोल दिया, "मैडम, आप धमकी दे रही हैं, मैं पुलिस बुला सकता हूं।" महिला बोली, "मुझे फर्क नहीं पड़ता, गंजे! (वैसे साहब गंजे नहीं थे, लेकिन गुस्से में तो लोग कुछ भी बोल जाते हैं)।"

आखिरकार रिसेप्शनिस्ट ने कड़क आवाज में कह दिया, "यहां से निकल जाओ, वरना पुलिस बुला लूंगा।" मैडम भी तमतमाती हुई चली गईं, और होटल में फिर शांति छा गई।

कम्युनिटी की राय—पश्चिमी 'पेट कल्चर' पर चुटीले तंज

इस पोस्ट पर Reddit की कम्युनिटी ने भी खूब मज़े लिए। एक कमेंट में किसी ने लिखा, "हमारे ज़माने में ऐसे जानवरों को 'पेट' कहते थे, 'इमोशनल सपोर्ट एनिमल' नहीं।" सोचिए, हमारे देश में भी अगर कोई बोले, "मेरा टॉमी मेरा इमोशनल सपोर्ट है," तो मोहल्ले वाले हँस-हँस के लोटपोट हो जाएंगे!

एक और यूज़र ने मज़ेदार तंज कसा—"हर जानवर के लिए 20 डॉलर, और आपके लिए खास ऑफर—दोनों के लिए सिर्फ 40 डॉलर! क्योंकि आप हमारे 'वैल्यूड कस्टमर' हैं!" भाई, ये तो वैसे ही हुआ जैसे हमारे यहां सब्ज़ी मंडी में—"दस रुपए में दो किलो ले लो, भैया आपके लिए खास रेट!"

एक और कमेंट पढ़कर तो हंसी छूट गई—"इमोशनल सपोर्ट डॉग काम नहीं कर रहे!" सच में, कभी-कभी लगता है कि कुत्ते-बिल्ली तो बड़े शरीफ होते हैं, इंसान ही बखेड़ा खड़ा कर देते हैं।

किसी ने यह भी लिखा कि 'इमोशनल सपोर्ट एनिमल' का नियम असल में परमानेंट हाउसिंग (यानि घर किराए पर लेने) के लिए बना था, होटल या बाजार के लिए नहीं। मगर लोग मौके का फायदा उठाने में माहिर हैं—जैसे हमारे यहां कोई शादी में खीर देखकर लाइन में लग जाता है, चाहे भूख हो या न हो!

होटल कर्मचारियों की दुविधा—नियम, फीस और ग्राहक की 'भावना'

अब सोचिए, होटल वालों की भी अपनी मजबूरी है। कोई ग्राहक अपने साथ तीन-तीन जानवर ले आए, हर जानवर की फीस 35 डॉलर, तो एक रात में पालतू जानवरों के लिए ही 100 डॉलर से ज़्यादा लग जाए! हमारे यहां तो कई बार होटल का कमरा ही इतने में मिल जाता है। तो भैया, होटल स्टाफ को भी नियम और ग्राहक दोनों को संतुलित करना पड़ता है। कई बार तो स्टाफ भी आंखें बंद कर लेता है—"जाओ, रहने दो, न लड़ाई चाहिए, न फीस।"

एक और मज़ेदार किस्सा—एक महिला ने अपने कुत्तों की आवाज़ छुपाने के लिए कहा, "ये तो बेबी मॉनिटर की आवाज़ है!" अब भैया, बेबी मॉनिटर क्या इतना जोर से भौंक सकता है?

क्या सीख मिली—होटल में काम करना आसान नहीं!

कुल मिलाकर, होटल की रात की ड्यूटी में ऐसा मसाला रोज़ मिलता है। कभी कोई मेहमान जानवर के नाम पर, तो कभी कमरे के रेट पर बखेड़ा खड़ा कर देता है। मगर जो होटल स्टाफ धैर्य और हिम्मत से काम करता है, उसकी भी दाद देनी चाहिए। आख़िरकार, ग्राहक भगवान है—मगर भगवान भी गुस्से में आए, तो स्टाफ को भी अपने हक की बात कहनी आती है!

आपने ऐसे किसी होटल या गेस्ट हाउस में कोई दिलचस्प या मज़ेदार अनुभव किया है? कमेंट करके जरूर बताइए—कहानी आपकी, मंच हमारा!


मूल रेडिट पोस्ट: Another Tale of night audit