होटल में हॉकी टीमों का हमला: जब नियमों की कमी ने सबको परेशान कर दिया
भाई साहब, अगर आप कभी होटल या गेस्ट हाउस में काम कर चुके हैं, तो आपको पता होगा कि ग्रुप बुकिंग यानी सामूहिक बुकिंग कितनी सरदर्दी ला सकती है। ऊपर से अगर वो ग्रुप हॉकी टीम का हो, तो समझ लीजिए, जैसे बारातियों की फौज आ गई हो — बच्चे-दौड़, माता-पिता की फरमाइशें, और हर चीज़ का हल्ला। आज मैं आपको एक ऐसे ही होटल की कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जहाँ न नियम कायदे हैं, न कोई काम की तयशुदा लकीर — बस जैसे-तैसे होटल चल रहा है, और कर्मचारियों के बीच मनमुटाव अपनी चरम सीमा पर है।
जब नियम खुद ढूंढ़ने पड़ें: होटल की गजब गाथा
इस होटल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ कोई कॉर्पोरेट कल्चर या SOP (Standard Operating Procedure) नहीं है। मतलब, हर कोई अपने हिसाब से काम करता है — आज अगर बॉस ने कहा कार्ड का इम्प्रिंट चाहिए, तो कल किसी को पता नहीं क्या नया नियम आ जाए! ऐसे माहौल में हमारे कहानी के नायक ने पिछले हफ्ते की एक गड़बड़ से सबक लिया। पिछली बार जब हॉकी की टीम आई, तो माता-पिता अपने उस कार्ड को ही घर भूल आए, जिससे बुकिंग हुई थी। नतीजा? रिफंड, नई पेमेंट, बहस और सिरदर्द!
तो इस बार उसने टीम मैनेजर को ईमेल कर के पहले ही बता दिया कि कृपया माता-पिता को समझा दें — गाड़ी की जानकारी और असली पेमेंट वाला कार्ड साथ लाएं, वरना चेक-इन लंबा खिंच जाएगा। अब ये बात सुनते ही दिन की शिफ्ट वाली सहयोगी का पारा सातवें आसमान पर!
एक छोटी सी जानकारी, औरत का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर
दिन की शिफ्ट वाली सहयोगी को अभिभावकों के फोन आने लगे — "हम कार्ड साथ लाएँगे, फोटो क्यों भेजें?" इधर कहानी का नायक समझाता रहा कि भाई, ये सब झंझट से बचाने के लिए ही तो बताया था। पर सहयोगी का कहना — "तुम्हारी वजह से आज मेरा दिन खराब हो गया, हमेशा कुछ ना कुछ कर देते हो।"
अब नायक सोच में पड़ गया — "क्या गुनाह कर दिया? लोगों को पहले से बता देना गलत है क्या?" जवाब मिला — "तुम्हें जैसा करना है, तब करो, मुझे परेशान मत करो।"
यह वही सहयोगी है, जो हॉकी के सीज़न में नायक के शनिवार की छुट्टी पर भी बुरा मानती है। और मज़ेदार बात ये कि खुद हॉकी मॉम रह चुकी हैं! एक बार बोलीं — "हम तो वाइन पीते थे, बच्चों ने कभी गड़बड़ नहीं की।" अब ये अलग बात है कि जब आप दूसरे कमरे में जश्न मना रहे हों, बच्चे क्या कर रहे हैं, कौन देखता है!
नियमों के बिना होटल का हाल — "जो चल रहा है, चलने दो"
रेडिट पर एक कमेंट में किसी ने लिखा — "ऐसा लगता है, जैसे हॉकी टीम वाले गाँव से पहली बार शहर आए हों, होटल देखा ही नहीं कभी!" और सच में, बिना पक्के नियमों के, ग्रुप बुकिंग जंगलराज बन जाती है।
एक और कमेंट में सलाह दी गई — "हर प्रक्रिया को लिखो, फाइल बनाओ, तभी होटल चलेगा। वरना 'वाइब्स' के भरोसे तो दुकान नहीं चलती!" यानी 'चलता है' वाली भारतीय सोच यहाँ भी भारी पड़ रही है — जब तक गड़बड़ न हो, तब तक सब ठीक; और गड़बड़ हो जाए, तो दोष एक-दूसरे पर डालो।
होटल के बॉस ने भी मान लिया — "हर हफ्ते नियम बदल जाते हैं, कभी कार्ड चाहिए, कभी नहीं।" और इधर सहयोगी का ग़ुस्सा — "मुझे क्यों बताना पड़ा, मैंने तो हमेशा ऐसे ही काम किया है।" कमाल की बात ये कि जब किसी और ने नियमों की शीट बनाने की कोशिश की, तो उसे भी बुरा मान गईं — "माता-पिता नाराज़ हो जाएंगे!"
दफ्तर की राजनीति और 'मेरा क्या, मुझे क्या!'
यह कहानी सिर्फ होटल या हॉकी टीम की नहीं है, बल्कि हर उस भारतीय दफ्तर की भी है, जहाँ काम करने के तरीके आज भी 'चलता है' पर टिके हैं। एक कमेंट ने खूब कहा — "आपकी मंशा मदद करने की थी, अगर किसी को और बेहतर तरीका आता, तो बोल देते — 'जैसे-तैसे निपटा लो' कहने से काम नहीं चलता।"
दूसरी तरफ, पुराने कर्मचारी अक्सर नए बदलावों से चिढ़ जाते हैं — "हम तो ऐसे ही कर लेते हैं, तुम क्यों परेशान हो रहे हो?" जैसे किसी मोहल्ले में नया दुकानदार आने पर बुज़ुर्ग बोलते हैं — "हम तो 40 साल से ऐसे ही कर रहे हैं बेटा!"
यहाँ तक कि जब एक कर्मचारी के लिए डॉक्टर की सलाह पर नया कुर्सी मंगवाया गया, सहयोगी ने उसे भी अपना अपमान समझ लिया! "इस कुर्सी की वजह से अब सबको ये झेलना पड़ेगा?" पुराने जमाने की टूटी कुर्सी पर ही बैठकर अपनी नाराज़गी जताती रहीं!
सीख क्या है? — बिना नियमों के गाड़ी कहाँ चलती!
तो पाठकों, इस कहानी से सीख यही है कि चाहे होटल हो या आपका खुद का दफ्तर — बिना साफ़-साफ़ नियमों के, बिना प्रक्रिया लिखे, कामयाबी मुश्किल है। और जब भी आप सुधार लाने की कोशिश करें, तो 'पुराने लोग' या 'चलता है गैंग' आपको चिढ़ा सकते हैं, लेकिन अंत में अच्छे नियम सबके लिए फायदेमंद होते हैं।
कहीं आप भी अपने ऑफिस में ऐसे ही 'नियम-विहीन' माहौल से जूझ रहे हैं? या कभी ग्रुप बुकिंग में ऐसी कोई अजीब घटना आपके साथ घटी हो? अपने अनुभव नीचे टिप्पणी में जरूर साझा करें — हो सकता है, आपकी कहानी भी अगली बार चर्चा में आ जाए!
मूल रेडिट पोस्ट: My coworker is pissed at me and I don't quite understand why