होटल में शोरगुल की रात: जब बड़े लोग बच्चों से भी बदतर निकले
किसी भी होटल में काम करते वक्त अक्सर लोग सोचते हैं कि असली परेशानियाँ तो बच्चों से होती होंगी या शायद नए-नवेले युवाओं से। लेकिन जनाब, असलियत इससे एकदम उलट भी हो सकती है! आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं एक ऐसी घटना, जहाँ होटल के अनुभवी स्टाफ भी सिर पकड़कर बैठ गए। सोचिए, जब बड़े-बूढ़े ही समझदारी भूल जाएँ और सारी मर्यादा ताक पर रख दें, तब क्या होता है?
जब 'बड़े' मेहमान बन गए सिरदर्द
यह किस्सा किसी छोटे-मोटे गेस्टहाउस का नहीं, बल्कि एक अच्छे-खासे होटल का है जहाँ कई परिवार, कामकाजी लोग और थिएटर देखने आए मेहमान आराम की उम्मीद लेकर आए थे। रात के करीब 11 बजे, जब सब अपनी-अपनी दुनिया में खामोशी से सोने की तैयारी कर रहे थे, तभी ऊपरी मंज़िल से एक परेशान मेहमान रिसेप्शन पर आ धमके – "नीचे से बहुत शोर हो रहा है!"
आमतौर पर तो उल्टा होता है – ऊपर वाले कूदते-फाँदते हैं और नीचे वाले शिकायत करते हैं। लेकिन यहाँ तो सब कुछ उल्टा-पुल्टा था। रिसेप्शनिस्ट ने जाकर देखा तो कमरा थोड़ा-सा खुला था और अंदर से हँसी-ठिठोली, जोर-जोर की बातें, गानों की आवाज़ और दौड़ती-फिरती, मस्ती करती 4-5 मध्यम उम्र की महिलाएँ! जैसे कोई शादी-ब्याह का माहौल हो। होटल के गलियारे तक में उनकी आवाज़ गूंज रही थी।
बार-बार मना करने के बाद भी 'मस्ती' जारी
स्टाफ ने पूरी तहज़ीब से दरवाज़ा खटखटाया – "मैडम, क्या आप सब ठीक हैं? कृपया आवाज़ थोड़ी धीमी कर लें, कई शिकायतें आ चुकी हैं।" उनका जवाब – "हाँ-हाँ, अभी सोने जा रहे हैं।" लेकिन जनाब, बात यहीं खत्म नहीं हुई। शोर ज्यों का त्यों जारी रहा।
अब सोचिए, रात के 11 बजे के बाद, जब होटल में 'शांति का समय' होता है, तब भी ये महिलाएँ खुद को रोक नहीं पाईं। एक कमेंट में किसी ने ठीक ही कहा – "ऐसी हरकतें तो टीनएजर्स करते हैं, लेकिन ये तो उम्रदराज़ महिलाएँ थीं! क्या वाकई इन्हें दूसरों की फिक्र नहीं?"
एक और पाठक ने व्यंग्य में लिखा – "हमारे होटल में तो बच्चों से ज्यादा परेशानी ऐसे 'Dance Moms' या 'हॉकी पेरेंट्स' से होती है। बच्चे तो डाँट सुनकर चुप हो जाते हैं, लेकिन ये माँएं और उनके ग्रुप – खुद को हीरोइन समझती हैं, जैसे होटल उनका मायका हो!"
स्टाफ की मजबूरी और मेहमानों की 'बेबाकी'
अब यहाँ स्टाफ की हालत भी समझिए। बार-बार politely समझाने के बाद भी जब फर्क न पड़े तो क्या किया जाए? एक कमेंट में किसी ने बड़ी सच्ची बात कही – "अगर होटल स्टाफ सख्ती नहीं करेगा, तो अच्छे मेहमान वापस नहीं आएँगे।"
ख़ुद इस घटना के पोस्ट करने वाले ने भी बताया – "असल दिक्कत ये है कि कई बार स्टाफ को मैनेजमेंट का पूरा साथ नहीं मिलता। अगर हम सख्त हुए और मेहमान ने शिकायत कर दी, तो ऊपर से हमें ही डाँट पड़ती है। आजकल तो लोग सोशल मीडिया, रिव्यू साइट्स और हेड ऑफिस में शिकायत की धमकी देने लगते हैं। ऐसे में कई बार स्टाफ टालमटोल कर देता है।"
किसी ने तो यहाँ तक कह दिया – "दो बार चेतावनी, तीसरी बार सामान समेत बाहर! रिफंड भी नहीं मिलेगा। होटल सबका है, किसी खास ग्रुप का नहीं।"
'बड़ों' का बचपना: सिर्फ़ खुद की फिक्र
सोचिए, हम अपने बच्चों को सभ्यता, दूसरों की इज्ज़त और शोर न मचाने की सीख देते हैं। पर जब वही बच्चे बड़े हो जाते हैं और 'मम्मी गैंग' या 'ऑफिस ग्रुप' के नाम पर होटल में हंगामा करते हैं, तब क्या कहेंगे? एक पाठक ने मज़ाक में लिखा – "40 की उम्र के बाद तो नींद वैसे ही कम आती है। ग्रुप मिलेगा तो पूरी रात जागेंगे, गाएंगे, लड़ेंगे, रोएंगे और सुबह फिर ताजे-ताजे तैयार हो जाएँगे।"
कई लोगों ने महसूस किया कि ऐसी हरकतें करने वाले लोग अक्सर अगले दिन खुद ही शिकायत करने पहुँच जाते हैं – AC ठंडा नहीं था, तकिया सॉफ्ट नहीं था, वगैरह-वगैरह। मतलब, नियम सबके लिए हैं लेकिन खुद के लिए कोई जिम्मेदारी नहीं!
निष्कर्ष: होटल में भी 'सार्वजनिक शिष्टाचार' जरूरी है
हमारे देश में भीड़भाड़, शोरगुल और 'अपनी मर्जी' चलाने वालों की कोई कमी नहीं। लेकिन होटल, हॉस्पिटल या ट्रेन – जहाँ सबको मिलजुलकर रहना पड़ता है, वहाँ दूसरों की भी उतनी ही फिक्र जरूरी है जितनी अपनी। होटल में 'शांति का समय' सिर्फ़ सजावट के लिए नहीं होता – किसी की सुबह की ट्रेन, किसी का इंटरव्यू, किसी की तबीयत, सबका ध्यान रखना स्टाफ की ही नहीं, मेहमानों की भी जिम्मेदारी है।
तो अगली बार जब आप दोस्तों के साथ होटल जाएँ, याद रखें – असली मज़ा सबको साथ लेकर चलने में है, न कि दूसरों की नींद उड़ाने में!
आपकी क्या राय है? क्या कभी आपके साथ भी ऐसी कोई घटना हुई है? कमेंट में जरूर बताइए – और हाँ, अगली बार होटल जाएँ तो शांति बनाए रखें, नहीं तो कोई 'रिसेप्शनिस्ट अंकल' आपको politely, firmly बाहर का रास्ता दिखा सकता है!
मूल रेडिट पोस्ट: Selfish and entitled