होटल में 'विशेष सदस्य' बनने की होड़: क्या वाकई रूम जादू से मिल जाता है?
अगर आप कभी होटल के रिसेप्शन पर खड़े हुए हों, तो आपने ज़रूर देखा होगा कि कुछ मेहमान खुद को 'बहुत खास' समझते हैं। जैसे ही रिसेप्शनिस्ट कहे, “अभी कोई खाली रूम नहीं है,” वैसे ही सामने वाला तुरंत बोल पड़ता है – “मैं तो गोल्ड/प्लैटिनम/डायमंड मेंबर हूं!” मानो उनकी सदस्यता कार्ड दिखाते ही छप्पर फाड़ के नया कमरा तैयार हो जाएगा, बाथरूम बन जाएगा या होटल के नियम बदल जाएंगे!
आज हम इसी पर बात करेंगे – उन 'विशेष सदस्यों' की, जिनका मानना है कि होटल की फ्रंट डेस्क पर उनका स्टेटस ही सुपरपावर है। और हां, इसमें शादी-ब्याह वाले, घोड़े पालने वाले और ‘अरे भाई, मैं तो स्पेशल हूं’ कहने वालों की भी भरमार है। तो आइए, जानें होटल वालों की ज़ुबानी, वो किस्से जो हर किसी के चेहरे पर मुस्कान ले आएंगे।
होटल की फ्रंट डेस्क: हर दिन एक नया तमाशा
होटल की फ्रंट डेस्क पर काम करना वैसे ही आसान नहीं होता। ऊपर से रोज़ाना ऐसे मेहमान आते हैं, जिन्हें लगता है कि उनकी 'रिवॉर्ड लेवल' सुनते ही रिसेप्शनिस्ट हाथ जोड़कर कहेगा – “मालिक, आपके लिए तो सब मुमकिन है!” असलियत ये है कि चाहे कोई कितना भी चमकदार (शाइनी) स्तर का मेंबर हो, अगर होटल फुल है, तो रूम जादू से नहीं बनता।
एक साहब ने तो हद ही कर दी – पूरा होटल बुक था, मगर उन्होंने फोन कर कहा, “मैं शाइनी मेंबर हूं, मेरे लिए रूम रिज़र्व है!” रिसेप्शनिस्ट ने बढ़िया जवाब दिया – “माफ कीजिए, शाइनी से भी ज्यादा चमकदार लोगों ने सारे रूम पहले ही ले लिए हैं।” ऐसे ही एक कमेंट में किसी ने चुटकी ली – “मैं तो सुपर-डुपर शाइनी मेंबर हूं, मुझसे ज्यादा चमक कौन सकता है?” सच कहें, होटल वालों को ऐसे जवाब देने में भी बहुत मज़ा आता है, लेकिन आमतौर पर उन्हें प्रोफेशनल ही रहना पड़ता है।
शादी-ब्याह, घोड़े और ‘स्पेशल’ बनने की होड़
शादी वाले मेहमान तो जैसे होटल वालों के लिए सिरदर्द बन जाते हैं। सुबह 8 बजे चेक-इन की ज़िद – “हमारी शादी है, हमें जल्दी कमरा चाहिए, तैयार होना है!” अरे भाई, अगर इतनी जल्दी आना था तो रात पहले कमरा बुक क्यों नहीं किया? रिसेप्शनिस्ट बार-बार समझाते हैं कि चेक-इन टाइम दोपहर 3 बजे है, वेबसाइट से लेकर बुकिंग कन्फर्मेशन तक हर जगह लिखा है, मगर फरमाइशें खत्म नहीं होतीं।
कई बार तो लोग ऐसे सवाल पूछते हैं – “पूरा होटल फुल है? एक भी कमरा नहीं?” जैसे रिसेप्शनिस्ट जान-बूझकर रूम छुपा रहा हो। एक कमेंट में किसी ने कहा, “भैया, अगर चाहें तो पीछे चलकर खुद देख लीजिए, मुझे झूठ बोलने से क्या मिलेगा?”
और घोड़े पालने वालों की तो बात ही अलग है। होटल के पास अगर कोई हॉर्स पार्क या इवेंट सेंटर है, तो मान लीजिए ऐसी 'रॉयल' भीड़ आ जाएगी, जिन्हें हर चीज़ में स्पेशल ट्रीटमेंट चाहिए। एक होटल कर्मचारी ने मज़ाक में कहा – “ये लोग असल में इतने अमीर होते हैं कि मना सुनना ही नहीं आता।”
ग्राहक सेवा और इंसानियत: मीठे बोल, मीठा फल
होटल में काम करने वालों की सबसे बड़ी सीख यही है – अगर आप विनम्रता से बात करें, तो सामने वाला भी आपकी मदद के लिए पूरा ज़ोर लगा देगा। एक ग्राहक ने बताया, “मैं हमेशा स्टाफ से अच्छे से बात करता हूं, कभी उल्टा-सीधा नहीं बोलता। इसी वजह से अक्सर मुझे वही कमरा मिल जाता है जो पसंद है, और होटल वाले भी मेरे लिए छोटी-छोटी चीजें करते हैं।”
एक कमेंट में लिखा था – “अगर आप गुस्से में, धमकी देकर कुछ मांगेंगे, तो जितनी मदद मिल सकती थी, उतनी भी नहीं मिलेगी। उलटा, अगर विनम्रता से कहें, तो स्टाफ खुद कोशिश करता है कि आपकी परेशानी हल हो जाए।”
कई बार तो कुछ लोग अपनी बीमारी, शादी, या कोई और बहाना भी डाल देते हैं – “मैं कैंसर सर्वाइवर हूं, मुझे तो ये चाहिए।” ऐसे में रिसेप्शनिस्ट भी सोचते हैं – “भाई, हमदर्दी है, पर नियम सबके लिए बराबर हैं।”
योजना बनाएं, होटल वाले जादूगर नहीं होते!
कई समझदार ग्राहकों ने भी अपनी राय दी – अगर आपको सुबह जल्दी कमरा चाहिए, तो एक रात पहले से कमरा बुक करें, होटल को फोन करके बताएं कि आप सुबह आ रहे हैं, ताकि वो आपको ‘नो-शो’ न कर दें। एक ग्राहक ने कहा – “मैं हमेशा दो रात बुक करता हूं, फ्रंट डेस्क को पहले ही सूचित कर देता हूं, ताकि कोई दिक्कत न हो। आखिरकार, प्लानिंग और कॉमन सेंस सबसे बड़ी चीज़ है।”
लेकिन अफसोस, बहुत से लोग बस आखिरी वक्त पर पहुंचकर उम्मीद करते हैं कि होटल वाले उनके लिए आसमान से रूम गिरा देंगे। होटल कर्मचारी अक्सर मज़ाक करते हैं – “अगर आप कमरा चाहते हैं, तो खुद बना लीजिए, हथौड़ा-हथौड़ी कितनी चलाना जानते हैं?”
निष्कर्ष: होटल में भी इंसान काम करते हैं, जादूगर नहीं!
हर होटल में नियम होते हैं, सीमाएँ होती हैं। रिसेप्शन पर बैठा व्यक्ति भी इंसान है, मशीन नहीं कि किसी की फरमाइश पर चुटकी बजाते ही सब बदल जाए। आपकी विनम्रता, समझदारी और थोड़ी सी योजना, होटल वालों की मदद के लिए सबसे बड़ा मंत्र है।
तो अगली बार जब होटल जाएं, अपनी सदस्यता कार्ड की चमक कम दिखाएं, और मुस्कुराकर कहें – “भाई, अगर हो सके तो मदद कर दीजिए।” यकीन मानिए, होटल वाले भी इंसान हैं, और मीठे बोलों का असर हर जगह होता है।
क्या आपके साथ कभी ऐसा अनुभव हुआ है? या आप खुद होटल में काम करते हैं? नीचे कमेंट में अपनी मज़ेदार या हैरान कर देने वाली कहानी जरूर साझा करें!
मूल रेडिट पोस्ट: I’m so done with entitled people