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होटल में बिल्लियों की एंट्री बंद! लेकिन मेहमानों का गुस्सा क्यों फूट पड़ा?

होटल के रिसेप्शन पर
एक होटल के रिसेप्शन की जीवंत तस्वीर, जहां एक कर्मचारी मेहमान को बिल्लियों पर प्रतिबंध के बारे में समझा रहा है। स्पष्ट संकेतों के बावजूद, पालतू जानवरों की नीतियों को लेकर गलतफहमियां अक्सर होती रहती हैं, जिससे रोज़ाना की परेशानियाँ बढ़ती हैं।

कभी-कभी होटल में काम करना किसी फिल्मी ड्रामे से कम नहीं होता। रोज़ नए-नए किरदार, उनकी अलग-अलग फरमाइशें और ऊपर से कुछ ऐसे मेहमान, जो नियमों को अनदेखा कर अपनी ही दुनिया में रहते हैं। आज हम आपको एक ऐसे होटल रिसेप्शनिस्ट की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जो हर दिन ‘बिल्ली’ नाम की मुसीबत से दो-चार हो रहा है।

होटल के नियम और ‘बिल्ली प्रेम’ का संघर्ष

अब ज़रा सोचिए, एक होटल है जहाँ बोर्ड पर साफ-साफ लिखा है—‘यहाँ कुत्ते तो स्वागतयोग्य हैं, लेकिन बिल्लियों की एंट्री सख्त मना है।’ वजह भी बड़ी ठोस—होटल मालिक को बिल्लियों से इतनी तेज़ एलर्जी है कि उनके आस-पास रहना भी जानलेवा हो सकता है। फिर भी, हर दिन कोई न कोई मेहमान अपनी बिल्ली को गोदी में लिए, मुस्कुराते हुए रिसेप्शन पर आ ही जाता है और कहता है, “हमने कमरा बुक किया है, और हमारी प्यारी बिल्ली भी हमारे साथ है।”

जब रिसेप्शनिस्ट बड़े ही विनम्रता से उस मेहमान को नियमों के बारे में बताता है और कहता है कि ‘माफ़ कीजिए, बिल्लियों की अनुमति नहीं है, आपकी बुकिंग बिना किसी चार्ज के कैंसल कर सकते हैं’, तब तो जैसे मेहमान का खून खौल उठता है। वो गुस्से से फनफना जाता है, उल्टा-सीधा सुनाने लगता है, मानो नियम रिसेप्शनिस्ट ने खुद बनाए हों!

‘पेट-फ्रेंडली’ का मतलब सिर्फ़ कुत्ते?

भारत में भी कई होटल खुद को ‘पेट-फ्रेंडली’ बताते हैं, लेकिन असलियत में कई बार इसका मतलब सिर्फ़ ‘कुत्ते फ्रेंडली’ होता है। एक कमेंट करने वाले ने लिखा, “ये बड़ा अजीब है कि होटल वाले खुद को पेट-फ्रेंडली कहते हैं, पर बिल्लियों के लिए दरवाज़ा बंद रखते हैं। कम से कम वेबसाइट पर तो खुलकर लिख ही सकते हैं!”

इस बात पर कई लोगों ने सहमति जताई कि ‘पेट-फ्रेंडली’ शब्द अगर सिर्फ कुत्तों के लिए इस्तेमाल हो, तो बिल्लियों के मालिकों के लिए बड़ी परेशानी हो जाती है। एक पाठक ने मज़ाक में कहा, “अगर इतनी दिक्कत है तो बोर्ड पर बड़ा सा लिख दो—यहाँ सिर्फ कुत्तों का स्वागत है, बिल्लियों से दूर रहें!” वैसे, भारत में भी कई बार ऐसे मज़ेदार बोर्ड गाँव के दुकानों या दफ्तरों के बाहर देखे जाते हैं—“यहाँ सिर्फ़ आम लोग आएं, खास लोगों का प्रवेश वर्जित है!”

मेहमानों की जिद, होटल वालों की मुसीबत

इस कहानी में सबसे दिलचस्प बात ये है कि, रिसेप्शनिस्ट हर बार मेहमान की बुकिंग बिना किसी चार्ज के कैंसल करने को तैयार रहता है, यहाँ तक कि आसपास कोई ‘कैट-फ्रेंडली’ होटल ढूँढने में भी मदद करता है। लेकिन फिर भी कुछ मेहमान ऐसे रूठ जाते हैं, मानो किसी ने उनका खिलौना छीन लिया हो। एक कमेंट में किसी ने लिखा, “कुछ लोग तो सोचते हैं कि अगर नियमों को नजरअंदाज कर देंगे, तो होटल वाले भी मजबूरन उन्हें घुसा लेंगे। लेकिन ऐसा नहीं होता!”

किसी ने मज़ाकिया अंदाज़ में लिखा, “ऐसे गुस्सैल मेहमानों को तो दरवाज़े से बाहर ‘कैटापल्ट’ कर देना चाहिए!” (यानी गुलेल से बाहर फेंक देना चाहिए!)—इस पर खुद रिसेप्शनिस्ट भी हँस पड़ा। कुछ पाठकों ने तो यहाँ तक कह डाला, “अगर मैं इस होटल में काम करता, तो रोज़-रोज़ ये बिल्लियों वाला ड्रामा देखकर ‘कैटाटॉनिक’ हो जाता!” (यानि इतना परेशान हो जाता कि हिलना-डुलना भी मुश्किल हो जाता।)

बिल्लियों से जुड़े कुछ दिलचस्प अनुभव

एक पाठक ने तो अपनी यात्रा का किस्सा सुनाया—“हम नई जगह शिफ्ट हो रहे थे, हमारे साथ दो छोटे बच्चे, दो टीवी और प्यारा सा बिल्ली भी थी। होटल में बुकिंग से पहले दस बार पूछा कि पेट-फ्रेंडली का मतलब क्या है, तब जाकर चैन की नींद आई।”

कुछ ने अनुभव साझा किया कि कई बार होटल की वेबसाइट तो सही जानकारी देती है, लेकिन ट्रैवल बुकिंग वेबसाइट्स (‘OTA’) पर सिर्फ ‘pet friendly’ लिखा रहता है, जिससे कन्फ्यूजन और बढ़ जाता है। यही कारण है कि कई मेहमान नियम पढ़े बिना सीधे होटल पहुँच जाते हैं, और फिर शुरू हो जाता है झगड़ा।

एक और मज़ेदार वाकया—किसी ने एक बार चुपके से बिल्ली को होटल में घुसा लिया, लेकिन जब उसकी गर्लफ्रेंड ने कमरे में बिल्ली का ‘लिटर बॉक्स’ ले जाते हुए कैमरे में दिख गई, तब होटल वाले ने फोन कर साफ़ कह दिया, “यहाँ बिल्लियों की इजाज़त नहीं है।” उस गेस्ट ने गुस्से में फोन ही फेंक दिया!

निष्कर्ष: नियमों का सम्मान करें, रिसेप्शनिस्ट को नहीं सताएँ

कहानी का लब्बोलुआब यही है—हर जगह के अपने नियम होते हैं, और उनके पीछे वजह भी। होटल मालिक की सेहत दांव पर लग सकती है, इसलिए बिल्लियों की अनुमति नहीं है। रिसेप्शनिस्ट तो महज़ ड्यूटी निभा रहा है, उस पर गुस्सा निकालना ठीक नहीं। वैसे भी, भारत में तो ‘अतिथि देवो भव:’ की परंपरा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि नियम ताक पर रख दें।

तो अगली बार आप कहीं होटल बुक करें, खासकर अगर आपके साथ प्यारा सा जानवर है, तो नियम ज़रूर पढ़ लें। और अगर किसी होटल वाले ने मना कर दिया, तो गुस्सा करने की बजाय मुस्कुरा कर कहें—“कोई बात नहीं, अगली बार सही जगह देख लेंगे।”

आपका क्या अनुभव रहा है ऐसे नियमों या मेहमानों के साथ? कमेंट में ज़रूर बताएँ—और अगर आपके पास भी कोई मज़ेदार बिल्ली या होटल वाली कहानी हो, तो साझा करें!


मूल रेडिट पोस्ट: We don’t accept cats and I’m sick of people getting pissed at me over it