होटल में आए मेहमानों की कारस्तानी: कबाड़ा कर दिया कमरा और सब्र का इम्तिहान
होटल की रिसेप्शन डेस्क पर काम करने वाले लोगों की जिंदगी जितनी दिखती है, उससे कहीं ज्यादा रंगीन और चुनौतीपूर्ण होती है। हर दिन नए-नए मेहमान, नई फरमाइशें, और कभी-कभी ऐसे मेहमान भी आ जाते हैं जो होटल की नीतियों को अपनी जेब में डालकर चलते हैं। आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं एक ऐसी ही घटना, जिसमें एक जोड़े ने होटल के नियम-कायदों की धज्जियां उड़ा दीं और होटल स्टाफ की सहनशीलता की परीक्षा ले डाली।
हरकतों से भरपूर मेहमान: कहानी की शुरुआत
ये किस्सा एक सुदर्शन होटल का है, जहां शनिवार को एक जोड़े ने फोन करके एक खास कमरे की बुकिंग की। होटल की पॉलिसी के हिसाब से कुछ कमरे ही पालतू कुत्तों के लिए होते हैं, बाकी नहीं। इन मेहमानों ने जिस कमरे की जिद की, वो कुत्तों के लिए नहीं था। लेकिन जैसे ही वे रविवार को आए, चुपचाप अपने दो प्यारे कुत्तों को भी कमरे में ले आए।
सोचिए, हमारी दिल्ली-लखनऊ ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने वाले लोगों की तरह इन्होंने बिना बताए कुत्ते को घुसा दिया! और फिर अगले दिन, बिना किसी झिझक के, अपने ठहराव को एक रात और बढ़ा लिया। होटल कर्मचारी सोच रहे थे – “कौन सा साला कानून इन पर लागू होता है?”
बहानों की बारिश और झूठ का झोला
जब स्टाफ के अगले दिन सुबह ड्यूटी करने वाले कर्मचारी ने मेहमान को समय पर चेकआउट करने के लिए कहा, तो साहब ने तुरंत बहाना बना दिया – “कल ही मुझे कैंसर डिटेक्ट हुआ है, पत्नी को सोने दीजिए।” अब हमारे यहाँ अक्सर लोग बहाने बनाने में उस्ताद होते हैं – कभी शादी का, कभी ट्रेन छूटने का, तो कभी बच्चे की तबियत खराब होने का। यहाँ साहब ने बीमारी का कार्ड खेला।
मज़ेदार बात ये थी कि बाकी स्टाफ को पता था कि कल साहब तो बार में दोस्तों के साथ मस्त पार्टी कर रहे थे, और उनकी पत्नी सुबह से उठकर हंसी-ठिठोली कर रही थीं। लेकिन फिर भी, नियम तो नियम है – चेकआउट का समय 11 बजे, तो 11 बजे ही।
नियम, नसीहतें, और सब्र का इम्तिहान
ये मेहमान तो मानने वाले थे नहीं। ग्यारह बजकर पाँच मिनट पर फिर आ गए – “बीस मिनट और चाहिए, पत्नी अभी उठी नहीं।” अब स्टाफ ने समझाया कि चूंकि कमरे में चुपके से कुत्ते लाए हैं, इसलिए सफाई कर्मचारियों को गहरी सफाई करनी होगी, ताकि जिन लोगों को एलर्जी है, उन्हें परेशानी न हो। लेकिन साहब ने तो जैसे कसम खा रखी थी – “न नियम मानेंगे, न होटल की इज्जत छोड़ेंगे।”
आखिरकार, 12 बजकर 10 मिनट पर चेकआउट किया। होटल ने देर से चेकआउट, एक्स्ट्रा सफाई, और गंदे तौलिए-चादरों के लिए चार्ज भी लगा दिये। ऊपर से, कमरा देखकर सफाई कर्मचारी सोच में पड़ गए – “ये होटल था या कोई मेले का मैदान?”
मेहमान गए नहीं – और नया तमाशा
अब आप सोचेंगे कि कहानी खत्म हो गई। पर नहीं! ये लोग होटल के रेजिडेंट्स लाउंज में जाकर आराम से 3 बजे तक जम गए। और जाते-जाते, उनके कुत्ते ने वहाँ कालीन पर ‘कर्म’ कर दिखाया – सारा होटल देखता रह गया।
कुछ पाठकों ने कमेंट में सही कहा – “ऐसे लोग होटल की नीतियों की अहमियत समझाने के लिए ही पैदा हुए हैं।” एक ने तो यहाँ तक पूछ लिया, “क्या आपने इनका नाम DNR (Do Not Rent) लिस्ट में डाला?” जैसे हमारे यहाँ ‘काली सूची’ बनती है, वैसे ही होटल वाले भी ऐसे मेहमानों की लिस्ट रखते हैं, ताकि दोबारा ये लोग न घुस पाएं।
एक कमेंट में किसी ने मज़ेदार बात कही – “इतना सब करने के बाद भी, इन्होंने एक्स्ट्रा चार्जेज़ पर बहस नहीं की? ये तो गजब है!” सच में, कुछ लोग दूसरों के लिए ‘चेतावनी’ बनकर ही आते हैं।
सीख और समाज की तस्वीर
इस घटना में हमें ये भी दिखता है कि किसी भी जगह नियम क्यों बनाए जाते हैं। चाहे वो होटल हो, ट्रेन हो या ऑफिस – नियम हमें सामूहिक व्यवस्था और दूसरों की भलाई के लिए पालन करने होते हैं। किसी ने कमेंट में खूब लिखा – “कुछ लोग दूसरों के लिए मिसाल नहीं, चेतावनी बनकर आते हैं।”
और देखिए, ये भी भारतीय समाज की तस्वीर है – कुछ लोग नियमों के साथ समझौता करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं, और बाकी लोग सोचते रह जाते हैं, “सब्र का फल क्या मिलेगा?”
निष्कर्ष: आपकी राय?
तो दोस्तों, कभी-कभी होटल स्टाफ की जिंदगी भी ‘कॉमेडी शो’ से कम नहीं होती। ऐसे मेहमानों से आप भी जरूर मिले होंगे – जो नियमों को मजाक समझते हैं, बहानों की पोटली लिए घूमते हैं, और जाते-जाते सबका मूड खराब कर जाते हैं।
क्या आपको भी ऐसी कोई घटना याद है? नीचे कमेंट में लिखिए, या अपने दोस्तों के साथ ये किस्सा शेयर कीजिए। याद रखिए, “अतिथि देवो भवः” तो ठीक है, लेकिन अच्छा अतिथि वही है जो घर का मान रखे!
मूल रेडिट पोस्ट: Guests that just keep on giving