विषय पर बढ़ें

होटल में आई 'यूनिकॉर्न' फैमिली – जब ग्राहक बने मिसाल और सबक!

एक यूनिकॉर्न परिवार की एनीमे-शैली की चित्रण, जिसमें एक तनावग्रस्त होटल ऑडिटर फ्रंट डेस्क पर है।
हमारे नवीनतम मेहमान की कहानी की रंगीन दुनिया में आपका स्वागत है, जहाँ एक यूनिकॉर्न परिवार होटल चेक-इन के मजेदार संघर्षों का सामना करता है। आइए हम रात के ऑडिटर्स द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों, जैसे अस्वीकृत भुगतान और थके हुए माता-पिता के बारे में जानें!

हमारे यहाँ होटल की रिसेप्शन डेस्क पर रोज़ नए-नए रंग देखने को मिलते हैं। कोई नाराज़, कोई थका, कोई जल्दी में – और फिर कभी-कभी आते हैं ऐसे मेहमान, जिनसे मिलकर दिल गार्डन-गार्डन हो जाता है। आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है – एक ‘यूनिकॉर्न’ फैमिली की, जिन्होंने न सिर्फ होटल स्टाफ की मुश्किल आसान कर दी, बल्कि बाकी सबको भी एक जबरदस्त सबक दे गए।

जब होटल बुकिंग बनी सिरदर्द – तीसरे पक्ष की वेबसाइट का झोल

रात के 11 बजे थे। मैं अपनी शिफ्ट शुरू ही कर रहा था कि एक परिवार – माँ, पिता और करीब 8 साल की प्यारी सी बच्ची – होटल के दरवाज़े पर पहुँचे। पिता जी की हालत देखकर ही लग रहा था कि वे पिछले 25 घंटे से सोए नहीं हैं; आँखों में नींद, चेहरे पर थकान।

अब दिक्कत ये थी कि इन्होंने होटल की बुकिंग किसी तीसरे पक्ष (जैसे कि ऑनलाइन ट्रेवल एजेंसी) से की थी, और उन लोगों ने जो वर्चुअल कार्ड दिया था, वो डिक्लाइन हो गया था। मतलब होटल को पैसे ही नहीं मिले थे! भारत में भी ऐसे किस्से खूब होते हैं – हम सोचते हैं सस्ता मिलेगा, लेकिन चक्कर में फँस जाते हैं।

समझदार मेहमान – गुस्से की जगह समझदारी

जैसा अक्सर होता है, ऐसी परिस्थिति में ज़्यादातर मेहमान या तो चिल्ला पड़ते हैं या होटल वाले को ही दोष देने लगते हैं – "हमने तो पैसे दे दिए, अब आपकी जिम्मेदारी!"। लेकिन यहाँ माँ जी ने कमाल कर दिया। उन्होंने पूरे धैर्य से मेरी बात सुनी, समझा कि असली गलती तीसरे पक्ष की है, और एकदम तसल्ली से बोलीं – "हमें क्या करना चाहिए?"

मैंने समझाया – "सबसे अच्छा है कि आप अपनी बुकिंग कैंसल कर दें और सीधा होटल से चेक-इन कर लें, वर्ना ये तीसरे पक्ष वाले आपको घंटों घुमा सकते हैं।" पति ने भी कोशिश की, फोन मिलाया, फिर टेक्स्ट किया, और आखिरकार लगभग आधा घंटा बर्बाद हो गया। उधर से जवाब – "हमें आपकी बहुत कद्र है" (वो झूठा स्क्रिप्ट वाला जवाब), फिर होल्ड पर डाल दिया।

होटल बुकिंग का असली सबक – सीधा बुक करो, चैन से सोओ

आखिरकार, पति-पत्नी को मेरी सलाह सही लगी। उन्होंने कॉल पर ही बुकिंग कैंसल करवा दी। उधर से जवाब आया – "कैंसल हो गई" और फोन काट दिया। इतने में बस 7 मिनट लगे और परिवार खुशी-खुशी अपने कमरे में चला गया। होटल स्टाफ की तारीफ करते-करते गए – "आपने बहुत अच्छे से हैंडल किया, थैंक यू!"

यहाँ एक मज़ेदार बात थी, जो एक कमेंट में भी आई – "सही बात पर जिम्मेदारी डाली, होटल पर नहीं। उम्मीद है तीसरा पक्ष अब और पैसा नहीं मांगेगा!" (u/SkwrlTail)। बहुत लोगों ने माना कि आजकल की भागदौड़ में, सीधे होटल में बुकिंग करना ही सबसे अच्छा है। एक सदस्य ने तो लिखा, "अब मैं कभी होटल बुकिंग ऐप से बुक नहीं करता, चाहे फ्लाइट या कार के लिए कर लूं, होटल सीधा ही बुक करता हूँ!" (u/puzzled65)। उनके हिसाब से, होटल वाले हमारे असली मेज़बान हैं – और मेज़बान को नाराज़ करना, मतलब छुट्टी का मज़ा किरकिरा करना!

सस्ती चीज़ का चक्कर – भारी पड़ सकता है

अक्सर हम सोचते हैं कि वेबसाइट से सस्ते में बुकिंग मिल जाएगी। पर एक और कमेंट में बिल्कुल सही लिखा था – "थोड़ा सस्ता जरूर मिलता है, लेकिन अगर जिस कमरे के पैसे दिए, उसमें ठहर नहीं पाए, तो क्या फायदा?" (u/ProfessionalBread176)। होटल और मेहमान के बीच बेवजह की उंगलियों का खेल शुरू हो जाता है – किसकी गलती, किसकी जिम्मेदारी। ऊपर से अगर कैंसिलेशन और रिफंड के चक्कर में फँस गए तो डबल झटका।

एक अनुभवी सदस्य ने यहाँ तक कहा, "मैंने खुद OTA (ऑनलाइन ट्रेवल एजेंसी) में काम किया है, वहाँ कस्टमर को कितनी दिक्कत होती है, मैंने खुद देखी है।" (u/oingapogo)। यानी जो दिखता है, वो हमेशा सच नहीं होता।

भारतीयों के लिए सीख – मेज़बान को सम्मान, सफर में आराम

हमारे यहाँ भी अक्सर लोग रिश्तेदार के घर रुकने की सलाह देते हैं – "अरे, मौसी के यहाँ ठहर लेना!" लेकिन जब वहाँ पहुँचो तो पता चलता है, मौसी को खबर ही नहीं थी! ठीक वैसे ही, होटल में भी अगर सीधा बुक करो तो होटल वाले खुद आपकी मदद करते हैं। अगर किसी तीसरे की बुकिंग रही, तो होटल भी हाथ बाँध लेता है – "साहब, हम आपके गेस्ट नहीं, उनके गेस्ट हैं!"

जैसा कि एक कमेंट में समझाया गया – सीधी बुकिंग में अगर कोई दिक्कत आती है, तो होटल स्टाफ के पास ज्यादा अधिकार होते हैं आपकी मदद करने के। तीसरे पक्ष के चक्कर में, आपको दस लोगों से बात करनी पड़ती है और हर कोई किसी और पर जिम्मेदारी डाल देता है। (u/ScenicDrive-at5)

निष्कर्ष – अगली बार सफर से पहले ये याद रखना!

तो भाइयों-बहनों, अगली बार कहीं घूमने जाएँ, तो होटल की बुकिंग सीधी होटल से ही करें। कुछ पैसे ज़रूर ज्यादा लग सकते हैं, पर मन की शांति और चैन की नींद उसके आगे कुछ भी नहीं। और अगर कभी कोई दिक्कत हो भी, तो होटल वाले भी पूरी मदद करते हैं – आखिर "मेज़बान का फर्ज़" भी तो होता है!

क्या आपके साथ कभी ऐसा अनुभव हुआ है? नीचे कमेंट में जरूर बताइए, और अगर यह कहानी पसंद आए तो अपने यार-दोस्तों के साथ शेयर करें। और हाँ, होटल वालों की भी तारीफ करना न भूलें – उनके बिना सफर अधूरा है!


मूल रेडिट पोस्ट: Unicorn guest story