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होटल में आईडी दिखाने पर हंगामा! क्या सच में नस्लभेद या सिर्फ बहाना?

सेवा डेस्क पर एक निराश ग्राहक, पहचान पत्र दिखाने की मांग कर रहा है, नस्ली पूर्वाग्रह के मुद्दों को दर्शाते हुए।
सेवा डेस्क पर एक तनावपूर्ण क्षण का फोटोरेयलिस्टिक चित्रण, जहां एक ग्राहक पहचान पत्र की आवश्यकताओं को लेकर निराशा व्यक्त कर रहा है। यह चित्र नस्ली पूर्वाग्रह और रोजमर्रा की बातचीत की जटिलताओं पर चर्चा की भावना को कैद करता है।

होटल की रिसेप्शन डेस्क पर काम करना जितना आसान दिखता है, असल में उतना ही चुनौतीपूर्ण भी है। जो लोग सोचते हैं कि बस चाबी दो, मुस्कराओ और सब सेट हो गया—उन्हें आज की ये कहानी ज़रूर पढ़नी चाहिए! कभी-कभी तो लगता है जैसे होटल स्टाफ, मेहमानों के नखरे झेलने के लिए ही बना है। और जब बात आईडी माँगने की आती है, तो न जाने कितने ड्रामे शुरू हो जाते हैं।

तो भैया, मामला कुछ यूँ था कि एक साहब, जो उम्र में रिसेप्शनिस्ट से दुगुने थे, गुस्से में तमतमाते हुए काउंटर पर आए और चाबी फेंकते हुए बोले—"इन चाबियों को दुबारा एक्टिव कर दो।" रिसेप्शनिस्ट ने बेहद शांति से कहा, "क्या मैं आपकी आईडी देख सकता हूँ?" अब साहब ने ऐसे आँखें घुमाईं, जैसे कि रिसेप्शनिस्ट ने उनकी आत्मा माँग ली हो!

होटल की आईडी पॉलिसी: सुरक्षा या शक?

होटल में आईडी दिखाना कोई नई बात नहीं। भारत में भी जब आप चेक-इन करते हैं, तो आधार, पैन या ड्राइविंग लाइसेंस माँगा जाता है। ये सिर्फ होटल की सुरक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि आपकी भी सुरक्षा के लिए है। सोचिए, अगर कोई बिना आईडी दिखाए आपकी चाबी ले जाए तो क्या हो? कई पाठकों ने भी यही बात लिखी—"मुझे तो अच्छा लगता है कि होटल आईडी चेक करता है, वरना कोई भी मेरी चाबी ले सकता है!"

एक और कमेंट में किसी ने अपने अनुभव साझा किए—"एक बार होटल स्टाफ ने बिना पूछे हमारे कमरे में किसी को घुसा दिया था। तब से मैंने सबक ले लिया कि होटल की सुरक्षा पॉलिसी कितनी जरूरी है।"

नखरेबाज मेहमान और नस्लभेद का बहाना

अब वापस आते हैं हमारे 'ड्रामेबाज़' मेहमान पर। जब रिसेप्शनिस्ट ने फिर से आईडी माँगी, तो साहब बोले—"आईडी ऊपर कमरे में है।" रिसेप्शनिस्ट ने भी समझदारी दिखाते हुए कहा, "तो फोटो दिखा दीजिए।" लेकिन साहब फिर भी टाल-मटोल करते रहे। आखिरकार, रिसेप्शनिस्ट ने खुद कमरे तक चलने की पेशकश की। लिफ्ट में जाते हुए साहब बोले, "क्या आप सच में ये सब करते हैं? मुझे लगता है आप ये मेरी जाति देखकर कर रहे हैं।"

दोस्तों, ऐसे मौके पर होटल स्टाफ की स्थिति बिलकुल वैसी हो जाती है जैसे भारत में टीटी से टिकट पूछने पर यात्री कहे, "आप मुझे शक की निगाह से क्यों देख रहे हैं?" जबकि असलियत ये है कि होटल की ये पॉलिसी सबके लिए है—चाहे आप किसी भी जाति, धर्म या रंग के हों।

रिसेप्शनिस्ट ने भी साफ-साफ कह दिया—"ये आपकी सुरक्षा के लिए है, किसी जाति या रंग के कारण नहीं।" लेकिन साहब मानने को तैयार नहीं थे। फिर कमरे पर पहुँच कर पता चला, कमरा साहब के नाम पर है ही नहीं! बोले—"ये मेरे बॉस का कमरा है।" अब भाई, नाम ही नहीं है तो आईडी किसकी चेक होगी?

होटल स्टाफ की जद्दोजहद: नियम निभाओ या बवाल झेलो?

इस पूरी घटना के बीच सबसे मज़ेदार बात ये थी कि जितना ज्यादा साहब बहस करते रहे, उतना ही वक्त बर्बाद हुआ। एक पाठक ने बड़ी मज़ेदार टिप्पणी की—"इन लोगों के चक्कर में काम दस गुना ज्यादा लंबा हो जाता है!" आखिरकार, बॉस से कॉन्फर्मेशन के बाद चाबी दी गई। लेकिन रिसेप्शनिस्ट को पक्का यकीन था कि अब मैनेजमेंट के पास कोई रंगीन शिकायत जरूर जाएगी।

कई पाठकों ने लिखा कि होटल स्टाफ नियम के अनुसार काम करता है, फिर भी मेहमान उन्हें गलत समझ लेते हैं। एक ने लिखा, "मुझे तो ये अच्छा लगता है कि होटल मेरी सुरक्षा का ध्यान रखता है। किसी अजनबी को मेरी चाबी थमा देना तो बहुत गलत होगा।" वहीं, कुछ ने मज़ाक में लिखा—"किसी की जाति नहीं, असली समस्या सिर्फ बेतुके बहानेबाज़ लोग हैं!"

सीख: नियम सबके लिए हैं, बहाने किसी के लिए नहीं!

इस कहानी से एक बात तो साफ है—चाहे भारत हो या विदेश, होटल स्टाफ की हालत 'धोबी का कुत्ता' जैसी है—न घर का, न घाट का! अगर नियम निभाओ तो शिकायतें, न निभाओ तो खतरा। इसलिए अगली बार जब आप होटल जाएँ और स्टाफ आपसे आईडी माँगे, तो मुस्करा कर दीजिए। आखिर, आपकी सुरक्षा सबसे पहले है!

आप क्या सोचते हैं?

क्या आपको कभी होटल या ऑफिस में ऐसी अजीब स्थिति का सामना करना पड़ा है? क्या आपको लगता है कि सुरक्षा नियमों में लचीलापन होना चाहिए या सख्ती जरूरी है? अपने अनुभव और राय कमेंट में जरूर साझा करें। और हाँ, अगली बार रिसेप्शनिस्ट से मुस्कुराकर मिलिए—शायद उनका दिन अच्छा बन जाए!


मूल रेडिट पोस्ट: Because I ask for I ID its racially motivated?