होटल की लॉबी में नंगे पाँव: जज्बा या जिद?
कभी-कभी जीवन में ऐसे पल आते हैं जब आप चुपचाप खड़े होकर सामने वाले की हरकतों को देखकर मन ही मन सोचते हैं – "भाई, आखिर क्यों?" होटल की लॉबी में ड्यूटी के दौरान जब मैंने एक मेहमान को नंगे पाँव बर्फ की मशीन की ओर जाते देखा, तो यही सवाल सिर उठाने लगा। उनके आत्मविश्वास में ऐसी अदा थी, मानो ये उनकी रोज़मर्रा की दिनचर्या हो, कोई शर्म, संकोच या हिचक नहीं। जैसे ये उनका अधिकार है – और वो भी उस फ़र्श पर, जिसे मैंने खुद अपने हाथों से इतनी बार साफ किया है कि डॉक्टर भी देख लें तो दो पल सोच में पड़ जाएँ।
होटल की ज़मीन: इतिहास की परतें या स्वच्छता का भ्रम?
एक बात कहूँ, हमारे होटल के फ़र्श पर वो सब रह चुका है, जिसकी कल्पना शायद कोई न करे। एयरपोर्ट से आए जूते, पेट्रोल पंप की चप्पलें, बच्चों के बिस्किट के टुकड़े, और वो रहस्यमयी चिपचिपाहट! ऊपर से तीन ऐसे कुत्ते, जिन्हें सफाई का ‘क’ भी नहीं पता। रोज़ाना दो बार पोंछा लगता है, पर जैसे ही पोंछा सूखता है, ‘मानवता’ फिर से अपनी छाप छोड़ जाती है। एक अनुभवी होटलकर्मी की मानें, तो हमारे टॉयलेट की सफाई ज़्यादा इरादतन होती है, फ़र्श को तो बस “गिला आशा” ही मिलती है, और उस पर पीला ‘कौशन’ वाला बोर्ड जैसे चार भाषाओं में चिल्ला रहा हो – “सावधान! सोच के चलो!”
नंगे पाँव का जज्बा: बहादुरी या बेपरवाही?
अब सोचिए, उस मेहमान की दिलेरी – न कोई हिचक, न कोई डर, सीधा फ़र्श पर पाँव रखकर निकल पड़े, जैसे महाभारत का कोई योद्धा युद्ध के मैदान में उतर रहा हो। एक टिप्पणीकार ने बहुत बढ़िया कहा, “जी, हमारे यहाँ नंगे पाँव चलने वाले लोग, अपने घर में तो चप्पल पहनकर चलते हैं, पर होटल में ऐसे घूमते हैं मानो गाँव के खेत हों।” और होटल के कर्मचारियों का तो कहना ही क्या – “अभी ताज़ा पोंछा लगाया था, और ये साहब अपने काले पैरों के निशान छोड़ते जा रहे हैं! अब फ़र्श गंदा है या उनके पाँव, यह बहस का विषय है।”
दूसरी ओर, कुछ लोग मानते हैं कि इंसान तो धरती, मिट्टी, घास, और न जाने किन-किन जगहों पर नंगे पाँव चलता है, तो होटल की साफ-सुथरी ज़मीन से डर किस बात का? लेकिन जनाब, गाँव की कच्ची ज़मीन और होटल की लॉबी में फर्क है। वहाँ इम्युनिटी बढ़ती है, यहाँ पैर में काँच घुसने के पूरे चांस हैं! एक और मेहमान का किस्सा सुनिए – उनकी दोस्त नशे में नंगे पाँव लॉबी बार में चली गई, और काँच का गिलास टूटते ही सब हक्के-बक्के रह गए। किसी ने समझाया, “ये आपकी सुरक्षा के लिए है, अस्पताल में रात बिताने का शौक नहीं है!”
सफाई, परजीवी और वो सफेद गाउन
एक अनुभवी वेटरनरी टेक्नीशियन की टिप्पणी ने तो हद कर दी – “नंगे पाँव चलने से जो परजीवी पैरों से शरीर में जा सकते हैं, सोचकर ही उल्टी आने लगती है। कृपया, अपनी सुरक्षा के लिए जूते पहनिए!” और वो सफेद गाउन… साहब, ऐसे खुले गाउन के साथ, बेल्ट लटकता हुआ, जैसे कोई किंग बनने की कोशिश कर रहा हो। गाउन की बेल्ट का भी तो कोई हक है, उसे कमर पर बाँधिए, वरना फैशन स्टेटमेंट के चक्कर में कहीं और न पहुँच जाएँ!
भारतीय सन्दर्भ: परंपरा, आधुनिकता और आम समझ
हमारे यहाँ तो बचपन से ही सिखाया जाता है – “बेटा, बाहर से आकर पाँव धोकर अंदर आओ।” मंदिर, घर, यहाँ तक कि किसी के बैठक में भी नंगे पाँव जाने से पहले सोचते हैं। होटल तो फिर भी अनजान लोगों की जगह है – न जाने कौन कहाँ से आया है! पर कुछ लोग इसे ‘इम्युनिटी बढ़ाने’ का बहाना मानते हैं – जैसे एक पाठक ने मज़ाक में कहा, “बचपन में मिट्टी तो सबने खाई है!”
लेकिन, क्या ये सचमुच इम्युनिटी है या बेपरवाही? हर किसी की सोच अलग है। कोई इसे ‘आजादी’ मानता है, कोई ‘अशिष्टता’। किसी को इसमें रोमांच दिखता है, किसी को गंदगी। वैसे, हमारे यहाँ महिलाएँ जब नई-नई सफाई करती हैं तो ताजे पोंछे पर पाँव रखने वाले को गुस्से से घूरती हैं – “अभी-अभी लगाया है, देख के चलो!” शायद होटल के कर्मचारी भी मन ही मन यही सोचते हैं।
निष्कर्ष: आप क्या सोचते हैं?
तो अगली बार जब आप किसी होटल की लॉबी में नंगे पाँव किसी को घूमते देखें, तो मुस्कुरा दीजिए – शायद वो बहादुर है, या फिर थोड़ा बेपरवाह। क्या आप खुद कभी होटल में नंगे पाँव चले हैं? या आपको भी सफाई और सेहत की चिंता सताती है? अपनी राय कमेंट में ज़रूर बताइए। आखिर, ये बहस सिर्फ होटल की लॉबी तक सीमित नहीं, ये हमारी आदतों, सोच और समाज के बारे में भी बहुत कुछ कहती है।
अंत में, अपनी और सबकी सुरक्षा के लिए – चप्पल पहनना बुज़ुर्गों की सलाह ही नहीं, होटल वालों की भी विनती है।
तो, अगली बार बर्फ लेने जाएँ – जूते मत भूलिए!
मूल रेडिट पोस्ट: Barefoot