होटल की रहस्यमयी कमरा 269: जब अतिथि ने स्टाफ को ही उलझन में डाल दिया
होटल में काम करना कभी-कभी किसी टीवी सीरियल की शूटिंग जैसा लगता है – रोज़ नया ड्रामा, नए किरदार और एक से बढ़कर एक उलझनें! हाल ही में एक होटल रिसेप्शनिस्ट के साथ ऐसा ही किस्सा हुआ, जब एक महिला गेस्ट ने आकर बड़े ही नाराज़ लहजे में कहा, “आपने मुझे कमरा 269 की चाबी दी है, लेकिन वो कमरा है ही नहीं!” अब सोचिए, जब होटल के कंप्यूटर में कमरा है, तो ज़रूर कहीं न कहीं तो होगा, पर मेहमान का गुस्सा जैसे आसमान छू रहा था।
होटल की भूल-भुलैया और गुमनाम कमरा
हर होटल की बनावट कुछ अलग होती है, जैसे हमारे पुराने मोहल्लों की गलियाँ – एक मोड़ आया, दूसरी गली शुरू! इसी तरह, कई बार कमरों की नंबरिंग और उनकी लोकेशन मेहमानों को तो क्या, स्टाफ को भी चक्कर में डाल देती है। इस कहानी में भी, कमरा 269 ऐसे कोने में था कि जैसे छुपा हुआ खजाना हो। मेहमान ने तो हाउसकीपर से भी पूछ लिया, लेकिन वो भी ढूंढ न पाई।
जैसे ही रिसेप्शनिस्ट ने कहा, “मैं आपके साथ चलकर दिखा देता हूँ,” तो महिला ने आँखें तरेरीं – जैसे स्कूल में मास्टरजी ने बच्चा समझ लिया हो! दोनों लिफ्ट से दूसरे माले पर पहुँचे, और वहाँ वही हुआ जो अक्सर फिल्मों में दिखता है – एक लंबी दीवार, कोई दरवाज़ा नहीं, बीस फीट तक सन्नाटा… और अचानक एक दीवार अंदर को मुड़ती है, जहाँ छुपा बैठा था कमरा 269!
‘कमरे हैं, तो ज़रूर होंगे!’ – सिस्टम की माया
इस किस्से पर एक यूज़र ने कमाल की बात कही – “अगर होटल के सिस्टम में कमरा है, तो कहीं न कहीं ज़रूर होगा, जब तक कि मैट्रिक्स की तरह गायब न हो जाए!” यानि, कंप्यूटर में लिखा है, तो 99% चांस है कि कमरा है, बस कभी-कभी उसे ढूंढना पड़ता है।
ऐसा ही एक और मज़ेदार किस्सा एक एयरपोर्ट वर्कर ने सुनाया – वहाँ भी गेट नंबरों की ऐसी उलझन थी कि 300 नंबर के गेट 350 से शुरू होते थे और 383 तो बिल्डिंग के दूसरी तरफ रनवे के पार निकला! सुनकर लगा जैसे भारतीय रेलवे स्टेशन की प्लेटफॉर्म नंबरिंग हो – टिकट पर लिखा 1A, प्लेटफॉर्म ढूंढते-ढूंढते आधी ट्रेन छूट जाए!
ग़लत नंबर, ग़लत कमरा – और ‘कुंजी’ की असली कहानी
होटल में ग़लत कमरे पर पहुँचने का किस्सा सिर्फ छुपे कमरों तक ही सीमित नहीं है। कई बार मेहमान खुद कमरे का नंबर ग़लत समझ लेते हैं और फिर रिसेप्शनिस्ट की क्लास लगाते हैं! एक कमेंट में किसी ने कहा, “मेहमान बार-बार चाबी बदलवाता रहा, लेकिन असल में वो 301 की जगह 331 का कमरा ढूंढ रहा था।”
ऐसे मौकों पर स्टाफ को भी मज़ा आता है – एक बार एक गेस्ट ग़लत कमरे पर पहुंचा, और जब चाबी नहीं चली तो गुस्सा करने लगा। तभी असली कमरे के दरवाज़े पर एक हट्टा-कट्टा बाइक वाला निकला और बोला, “आइए भैया, यहीं रुकिए!” गेस्ट का चेहरा देखना लायक था – जैसे दसवीं का रिज़ल्ट निकलते ही पिताजी के सामने खड़ा हो गया हो!
ऐसी गलती अक्सर इसलिए होती है क्योंकि लोग बीच का नंबर ध्यान नहीं रखते। एक पाठक की राय थी, “लोग पहली और आखिरी संख्या पकड़ते हैं, बीच की भूल जाते हैं।” कुछ तो अपने ग़लती मान भी लेते हैं, लेकिन कुछ का अड़ा रहता है – ‘मैं सही हूँ, बाक़ी सब ग़लत!’
भारतीय नजरिए से – होटल और खोया-खज़ाना
हमारे यहाँ भी होटल या धर्मशाला ढूंढना कभी-कभी ट्रेजर हंट जैसा लगता है। कमरे के नंबर हर बार सीधे-सादे नहीं होते – कभी 101 के बाद 103, 105, और फिर अचानक 121! ऊपर से अगर कमरा किसी कोने में छुपा हो, तो थक कर चाय की तलब लग जाती है।
कई बार गेस्ट बहस में उतर आते हैं – “ये कमरा तो है ही नहीं, आपको गिनती नहीं आती क्या?” जैसे एक और कमेंट में किसी ने लिखा, “मैडम, सीढ़ियाँ इसी लिए होती हैं कि अगला माला मिले!” लेकिन गेस्ट को तो लगता है, शायद उन्हें डिस्काउंट चाहिए या बस बहस में जीतना है।
निष्कर्ष – होटल के कमरों की गुत्थी, मुस्कान के साथ
होटल का काम सिर्फ चाबी देना या कमरा दिखाना नहीं, बल्कि रोज़-रोज़ नए किस्सों से दो-चार होना है। कभी-कभी मेहमान ग़लत नंबर, ग़लत दिशा या ग़लत उम्मीदों के साथ आते हैं, तो कभी होटल की बनावट ही उन्हें गुमराह कर देती है।
इन कहानियों से एक बात तो साफ है – चाहे होटल हो या ज़िंदगी, हर गली, हर मोड़ पर कोई ‘छुपा कमरा’ ज़रूर बैठा है। अगली बार होटल जाएँ तो अपने कमरे का नंबर देखकर मुस्कुराइए, और अगर खो जाएँ, तो रिसेप्शनिस्ट को मास्टरजी समझकर नहीं, दोस्त मानिए!
क्या आपके साथ भी कभी ऐसा कोई अतरंगी होटल अनुभव हुआ है? कमेंट में जरूर बताइए – अगली बार हम आपके किस्से सुनाएँगे!
मूल रेडिट पोस्ट: There is no 269