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होटल का रिमोट और मेहमानों की 'सीख ली गई लाचारी' : एक मज़ेदार किस्सा

व्यस्त शाम की शिफ्ट के दौरान रिमोट कंट्रोल से जूझते हुए निराश होटल मेहमान।
एक तनावग्रस्त होटल मेहमान की यथार्थवादी छवि, जो खराब रिमोट के साथ संघर्ष कर रहा है, जो आतिथ्य उद्योग की व्यस्त शाम की चुनौतियों को दर्शाती है।

होटल में काम करने वालों की ज़िंदगी कभी भी आसान नहीं होती। हर रोज़ कोई न कोई नया मेहमान, नई फरमाइशें और नयी-नयी परेशानियाँ लेकर आता है। लेकिन कभी-कभी कुछ ऐसे वाकये हो जाते हैं, जिन्हें सुनकर खुद हँसी आ जाती है – या फिर माथा पीटने का मन करता है! आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिसमें एक होटल कर्मचारी को रिमोट के पांच बटन समझाने के लिए न जाने कितनी बार फोन उठाना पड़ा।

रिमोट का रहस्य और हमारी 'जुगाड़' संस्कृति

हम भारतीयों की एक खासियत है – 'जुगाड़'। चाहे टीवी का रिमोट हो या पुरानी अलमारी की चाबी, हम अपने-अपने तरीके से सब कुछ चला ही लेते हैं। कई बार तो रिमोट की बैटरी निकालकर रगड़ना, या टीवी के सामने रिमोट को सीधा-सीधा घुमाना – ये सब हमारे खून में है! लेकिन सोचिए, अगर किसी होटल में कोई मेहमान बार-बार फोन करे और बोले – "मुझे आपका रिमोट समझ में नहीं आ रहा!" तो?

रेडिट पर u/random_name_245 नामक यूज़र ने कुछ ऐसा ही साझा किया। रात के 10:38 पर होटल की रिसेप्शन बेल बजी – "मुझे आपका रिमोट समझ में नहीं आ रहा! ये छठी बार है जब हमें शिकायत करनी पड़ रही है!" और मज़े की बात यह कि, होटल के रिकॉर्ड में इनकी कोई भी पूर्व शिकायत नहीं मिली थी। ऊपर से शिकायत – "फोन से फ्रंट डेस्क कॉल करने के लिए 0 क्यों दबाना पड़ता है, कोई इंस्ट्रक्शन तो है नहीं!"

अब ज़रा सोचिए, हमारे यहाँ तो होटल के कमरे में घुसते ही पहले टीवी, फिर एसी, फिर लाइट के स्विच – सबकुछ खुद ही ट्रायल-एंड-एरर से सीख लेते हैं। लेकिन यहाँ तो जैसे बटन दबाने में 'रॉकेट साइंस' लग रहा था!

मेहमानों की उम्मीदें और 'सीख ली गई लाचारी'

इस घटना पर कई लोगों ने रेडिट पर अपनी राय दी। एक यूज़र (u/FreshSpeed7738) ने तो यहाँ तक कहा – "मैं तो कभी भी रिमोट के आगे हार नहीं मानूंगा, चाहे कुछ भी हो जाए!" एक और ने चुटकी ली – "अगर मुझे ऑपरेशन समझ न आये तो मैं रिमोट छोड़कर बगल में रखी बाइबल पढ़ने लगूंगा, लेकिन रिसेप्शन को कॉल नहीं करूंगा।"

लेकिन कुछ ने एक और गहरी बात कही – आजकल के लोगों की 'सीख ली गई लाचारी' (Learned Helplessness)। यानी, जब भी कोई छोटी-सी दिक्कत आये, खुद कोशिश करने की बजाय सीधे मदद मांग लेने की आदत। एक टीचर यूज़र ने लिखा – "आजकल के बच्चों को हर चीज़ बिना मेहनत के चाहिए। माता-पिता रास्ता साफ कर देते हैं, न कोई परेशानी, न फेल होने का डर। अब यही बच्चे बड़े होकर हर छोटी-छोटी बात में दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं।"

सोचिए, अगर हर बार हमें भी ऐसे ही होटल के स्टाफ को बुलाना पड़े, तो हमारे घर की 'मम्मी टेक्नीकल सपोर्ट' तो थक ही जाएंगी!

तकनीक की बढ़ती जटिलता या आलसीपन की हद?

कुछ लोगों ने माना कि होटल के रिमोट वाकई कभी-कभी बहुत उलझे हुए होते हैं। जैसे एक सज्जन ने कहा – "मैं एक ऐसे होटल में रुका जहाँ टीवी चलाने के लिए चार रिमोट थे, और इंस्ट्रक्शन स्पैनिश में थे!" किसी ने लिखा – "कभी-कभी रिमोट पर इतने फालतू बटन होते हैं कि लगता है फ्लाइट उड़ानी है!"

पर सचाई यह भी है कि, चाहे रिमोट कितना भी सीधा हो, अगर मन में 'यह तो समझ ही नहीं आएगा' बैठ जाए, तो इंसान खुद कोशिश करना छोड़ देता है। और जब सामने वाला हर बात पर शिकायत करता है, तो स्टाफ का मन भी खट्टा हो जाता है। एक यूज़र ने तो मज़ाक में लिख दिया – "जो लोग रिमोट नहीं चला सकते, उनके लिए मेडिकल टर्म है – बेवकूफी!"

भारतीय होटल और हमारी जुबानी 'टेक-सपोर्ट'

भारत में होटल के अनुभव भी कम मज़ेदार नहीं होते। यहाँ कभी-कभी तो रिमोट ही गायब, या बैटरी ही खत्म। कई बार तो चैनल गाइड पर जो चैनल लिखे हों, टीवी पर मिलते ही नहीं। लेकिन ज्यादातर लोग अपने 'जुगाड़' से टीवी चला ही लेते हैं – या फिर सीधे रिसेप्शन पर जाकर बोल देते हैं – "भैया, टीवी नहीं चल रहा, देख लो!"

यहाँ 'सीख ली गई लाचारी' की जगह 'सीख ली गई चालाकी' चलती है। जब तक खुद से नहीं चले, तब तक सब ट्राई करो, वरना रिसेप्शन का नंबर मिलाओ और सीधे कह दो – "भाईसाब, टीवी में रामायण लगाओ!"

निष्कर्ष: हम खुद कितने 'स्वतंत्र' हैं?

कहानी से एक बात तो साफ है – तकनीक कितनी भी आसान हो, इंसान की मानसिकता सबसे बड़ा फर्क डालती है। अगर हर छोटी बात पर मदद की जरूरत महसूस हो, तो असल में हम खुद की क्षमताओं पर शक कर रहे हैं। और अगर खुद से कोशिश करें, तो शायद हर रिमोट, हर फोन, और हर '0' का रहस्य सुलझ जाए।

तो अगली बार, जब भी कोई नई चीज़ सामने आये, पहले खुद से ट्राई करें। और हाँ, कभी-कभी रिसेप्शन को भी थोड़ा आराम देना चाहिए – आखिर हर होटल के स्टाफ में भी एक इंसान ही बैठा है, कोई 'कृत्रिम बुद्धिमत्ता' (AI) नहीं!

आपका क्या अनुभव है? क्या कभी आपको होटल के रिमोट या फोन से जूझना पड़ा? या आप भी 'जुगाड़' के उस्ताद हैं? अपने किस्से कमेंट में जरूर साझा करें!


मूल रेडिट पोस्ट: I absolutely have no idea how it’s my fault or what some guests expect me to do