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होटल के बद्तमीज़ मेहमानों को सबक सिखाने का पुराना देसी तरीका!

सिनेमाई शैली में प्री-ऑथराइजेशन के लिए पुराने होटल क्रेडिट कार्ड प्रोसेसिंग सिस्टम।
होटल प्रबंधन के अतीत की एक सिनेमाई झलक, जिसमें प्री-ऑथराइजेशन के लिए उपयोग होने वाली पुरानी क्रेडिट कार्ड प्रोसेसिंग मशीन को दर्शाया गया है। यह पुरानी मशीन सबसे चुनौतीपूर्ण मेहमानों को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। इसके पीछे की कहानियों को जानने के लिए हमारे नवीनतम ब्लॉग पोस्ट को पढ़ें!

होटल की नौकरी में दिन-रात न जाने कैसे-कैसे मेहमानों से पाला पड़ता है। कुछ तो इतने शराफ़त से रहते हैं कि दिल खुश हो जाए, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं कि बस... भगवान ही मालिक! आज एक ऐसी मज़ेदार कहानी लेकर आए हैं, जिसमें एक होटल कर्मचारी ने अपने पुराने ज़माने के जुगाड़ से बद्तमीज़ मेहमानों को ऐसा सबक सिखाया कि वो भी याद रखे।

वो ज़माना, जब कार्ड स्वाइप मशीन नहीं थी

आजकल तो हर जगह कार्ड स्वाइप मशीन मिल जाती है, लेकिन 90 के दशक में होटल में क्रेडिट कार्ड से पेमेंट लेना किसी तंत्र-मंत्र से कम नहीं था। उस समय "Zip Zap" या "शूप शूप" मशीन का बोलबाला था – जिसका असली नाम था 'Addressograph', लेकिन हर देश में इसे अलग-अलग नाम से पुकारते थे। जैसे स्वीडन में 'Ritsch Ratsch', तो कहीं 'Knuckle Buster' और कहीं 'Shoop Shoop'! इस मशीन का काम था – कार्ड को रखो, ऊपर से दबाओ, और 'क-चक' की आवाज़ के साथ कार्ड का इम्प्रेशन कार्बन पेपर पर उभार लो।

एक Reddit यूज़र ने याद किया – “अगर आपने मशीन चलाते वक्त ‘क-चक’ नहीं बोला, तो मशीन फँस जाती थी!”
सोचिए, बैंकिंग का ऐसा ज़माना था, जब बैंक भी दोपहर 2 बजे बंद हो जाते थे, और अगर कोई दिक्कत हो जाए तो लाइन में लगकर बैंक कॉल करना पड़ता था – ऑनलाइन एकाउंट और मोबाइल ऐप का तो नामो-निशान नहीं था!

बद्तमीज़ मेहमानों की शामत आई!

अब आते हैं असली कहानी पर। हमारे हीरो होटल में काम करते थे और रोज़ाना अलग-अलग किस्म के मेहमानों से दो-चार होते थे। लेकिन जब कोई मेहमान हद से ज़्यादा बद्तमीज़ी दिखाता, तो ये कर्मचारी भी अपनी ‘पेटी रिवेंज’ (छोटी सी बदला) निकालने से नहीं चूकते!

कैसे? मेहमान के कार्ड की स्लिप बनाना तो रूटीन था, लेकिन बद्तमीज़ी का तोड़ ये था कि कार्ड पर बार-बार $100, फिर $50, फिर $10 की प्री-ऑथराइज़ेशन (यानी कार्ड पर अस्थायी रोक) लगाते जाते, जब तक कार्ड ब्लॉक न हो जाए। इससे हुआ ये कि अगले कुछ दिनों तक वह मेहमान अपने कार्ड से पेट्रोल भरवाए या खाना खरीदे – हर जगह कार्ड रिजेक्ट!

एक कमेंट में किसी ने लिखा – “हमारे यहां भी एक बार एक गेस्ट इतना सिरदर्द बना कि अमरीकन एक्सप्रेस कार्ड को डिक्लाइन कराने में 30 मिनट लग गए!”
और मज़े की बात, किसी ने पकड़ नहीं पाया – न होटल मैनेजमेंट, न ही बैंक!

मशीनों के पीछे की जुगाड़ और देसी तरीका

कई पाठकों ने याद किया कि कैसे जब मशीन खराब हो जाती थी, तो बॉलपेन के कोने से कार्ड के नंबर कार्बन पेपर पर रगड़-रगड़ कर उभारते थे – बिल्कुल वैसे ही जैसे बचपन में सिक्के से कागज़ पर आकृति बनाते थे।
एक पाठक ने हंसी मज़ाक में कहा, “हमारे यहां तो सिक्योरिटी के लिए कई बार ग्राहक कार्बन कॉपी अपने साथ ले जाते थे, ताकि कोई गड़बड़ न कर दे!”
आज के दिन में जब कार्ड पर न तो उभरे हुए नंबर होते हैं, न ही कार्बन स्लिप – तब ये बातें सुनना किसी पुराने हिंदी फ़िल्मी गीत जैसा रोमांचक लगता है।

क्या ये सही था? पाठकों की राय

कहानी को पढ़कर कुछ लोग बोले – “वाह! क्या आईडिया है!”
वहीं कुछ ने चिंता जताई – “अगर किसी के पास एक ही कार्ड हो, और सफर में कार्ड ब्लॉक हो जाए, तो बहुत मुश्किल हो सकती है।”
जैसा कि कहानी के लेखक ने बताया, “उस समय लोगों के पास अक्सर एक ही कार्ड होता था, और बैंक से संपर्क करना भी आसान नहीं था। कई बार होटल वाले चोरी के कार्ड की लिस्ट भी चेक करते थे, जो एक मिनिएचर टेलीफोन डायरेक्टरी जैसी होती थी!”

एक पाठक ने बड़ा मज़ेदार तर्क दिया – “अगर आपने किसी का 500 रुपये वॉलेट से निकालकर हफ्ते बाद लौटाया, तब भी वो आपके लिए ‘पेटी रिवेंज’ ही है – लेकिन पैसा तो फंसा ही रहेगा!”
तो ज़ाहिर है, उस दौर में ये जुगाड़ पूरी तरह से ‘नुकसान नहीं, पर तगड़ा सबक’ वाली थी – पैसे गायब नहीं होते थे, बस कुछ दिनों के लिए बंदिश लग जाती थी।

आज का सबक: ‘जैसी करनी, वैसी भरनी!’

होटल, दुकान या ऑफिस – हर जगह ऐसे लोग मिलते ही हैं जो दूसरों को परेशान करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। लेकिन कभी-कभी पुराने ज़माने की जुगाड़ और देसी दिमाग़ मिल जाए, तो बद्तमीज़ लोगों को भी उनकी औकात दिखाना आसान हो जाता है।
और हां, अब तो टेक्नोलॉजी इतनी आगे बढ़ गई है कि ऐसा करना लगभग नामुमकिन है, लेकिन उस दौर की ये कहानियां आज भी हमें हँसा-हँसा कर लोटपोट कर देती हैं।

आपका क्या अनुभव रहा है? क्या आपने भी कभी किसी बद्तमीज़ ग्राहक या सहकर्मी को इसी तरह कोई देसी सबक सिखाया है? अपने किस्से कमेंट में ज़रूर साझा करें – क्योंकि हर किस्सा सुनने लायक होता है!


मूल रेडिट पोस्ट: Old story - Hotel and pre-authorizations