होटल की नौकरी में सहकर्मी की बचकानी हरकतें: जब दोस्ती दुश्मनी में बदल गई!
हर दफ्तर में कोई न कोई ‘जेन’ जरूर मिल जाती है — वो सहकर्मी जिससे पहले तो खूब बनती है, लेकिन एक दिन अचानक हालात ऐसे करवट लेते हैं कि दोस्ती से दुश्मनी का सफर चुटकियों में तय हो जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ हमारी कहानी की नायिका (चलो उसे रीना कह लेते हैं) के साथ, जो दो साल से एक होटल के रिसेप्शन पर काम कर रही है। पहले साल तो सब मस्त था, जेन और रीना एक-दूसरे को अपनी “वर्क वाइफ” बुलाती थीं! पर फिर आई वो घड़ी जब गलती, ग़लतफहमी और ‘ईगो’ के तड़के ने इस रिश्ते को पूरी तरह बदल दिया।
जब गलती छुपाने की बजाय दूसरों पर थोप दी जाए
हिन्दुस्तान के किसी भी दफ्तर में, अगर कोई सहकर्मी बार-बार वही गलती करता है, तो लोग या तो चुपचाप सिर झुका के काम निपटा लेते हैं या फिर बॉस तक बात पहुंचा देते हैं। रीना की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। हुआ यूं कि होटल के सुपरवाइज़र छुट्टी पर चले गए और जेन ने एक के बाद एक थर्ड पार्टी बुकिंग्स की पेमेंट डिटेल्स डिलीट कर दीं। ताज्जुब तब हुआ जब उसने न तो खुद नोटिस किया, न ही गलती सुधारने की कोई कोशिश की। सारे फसाद की जड़ यही थी — गलती खुद की, पर बोझ दूसरों पर डालना।
रीना ने कुछ दिनों तक रात-दिन मेहनत करके पिछली सारी गड़बड़ियों को ठीक किया और जेन को प्यार से समझाया भी। लेकिन जेन पर तो जैसे कोई असर ही नहीं हुआ! ऊपर से, जब सुपरवाइज़र लौटा और रीना ने उसे सारी बात बताई, तब जेन का बर्ताव बिलकुल बदल गया। अब जेन ने बात करना ही बंद कर दिया — न नमस्ते, न गुड मॉर्निंग, बस चुप्पी साध ली। ये वही ‘साइलेंट ट्रीटमेंट’ है, जिसे हमारे यहां कई बार लोग ‘तानाशाही चुप्पी’ भी कहते हैं।
जब दोस्ती की आड़ में स्वार्थ छुपा हो
कहते हैं, “सांप निकल जाए तो लाठी को कौन पूछे।” जेन ने भी यही किया। जब गलती की तो दोस्ती भूल गई, लेकिन जैसे ही उसे अपने शिफ्ट बदलवाने थे, अचानक दोस्ती की याद आ गई! चार शिफ्ट के लिए मैसेज कर दिया, लेकिन रीना ने साफ मना कर दिया — “अब हमारी दोस्ती सिर्फ शिफ्ट पास करने तक सीमित है।”
इस पर एक मजेदार कमेंट Reddit यूज़र ने किया, “ये तो वही बात हो गई कि पहले पुल जला दिया और अब जरूरत पड़ी तो कह रही है — अब चलो फिर से पुल बना दो!” यही तो होता है जब लोग स्वार्थ के लिए रिश्ते याद करते हैं।
दफ्तर की राजनीति में कब ‘ना’ कहना जरूरी हो जाता है
हमारे यहां अक्सर महिलाएं या नए कर्मचारी ये सोचते रहते हैं कि सबको खुश रखना चाहिए, चाहे खुद पर कितना भी बोझ क्यों न आ जाए। लेकिन रीना ने इस बार ‘ना’ कहना सीख लिया। उसने सीधे-सीधे जेन को कह दिया, “अब पुरानी दोस्ती मुमकिन नहीं, मैंने कई बार कोशिश की, माफी भी मांगी, लेकिन जब सामने वाला ही बात न करे, तो क्या किया जा सकता है?”
कम्युनिटी में एक यूज़र ने बड़ी अच्छी बात लिखी — “ऐसे लोगों के लिए ‘ना’ कहना सीखना बहुत जरूरी है, वरना वो आपके सिर पर चढ़कर नाचेंगे। गलती उन्होंने की, लेकिन सजा आपको मिले — ये कहां का इंसाफ है?” एक और सुझाव आया कि “अपने काम का पूरा रिकॉर्ड रखो, ताकि कोई भी गलतफहमी या इल्ज़ाम आए तो आपके पास सबूत हों।” ये बिलकुल वैसा ही है जैसे भारत में लोग जरूरी कागज़ात की फोटोकॉपी हमेशा संभाल कर रखते हैं — ‘क्या पता कब काम आ जाए!’
क्या ऐसे माहौल में नौकरी छोड़ देनी चाहिए?
बहुत से लोगों ने सलाह दी कि नौकरी छोड़ना जरूरी नहीं, क्योंकि गलती जेन की थी, रीना की नहीं। “आज की नौकरी के बाजार में खुद को सही साबित करने वाले लोग ही टिक पाते हैं,” एक यूज़र ने लिखा। वैसे भी, ऐसे सहकर्मी हर दफ्तर में मिल जाते हैं — कभी पॉलिटिक्स करने वाले, कभी चुगली करने वाले, तो कभी गलती छुपाने वाले। असली बात ये है कि आप अपने आत्म-सम्मान और मानसिक शांति के साथ कैसे डटे रहते हैं।
रीना ने भी यही किया। उसने न तो झगड़ा बढ़ाया, न ही खुद को शिकार बनने दिया। बस, प्रोफेशनल अंदाज में काम किया और अपना पक्ष साफ रखा। यही वो सबक है जो हर नौकरीपेशा इंसान को सीखना चाहिए — “रिश्ते जरूरी हैं, पर खुद का सम्मान सबसे ऊपर।”
निष्कर्ष: दफ्तर की राजनीति और आत्म-सम्मान
तो दोस्तों, इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि दफ्तर में दोस्ती, राजनीति और स्वार्थ सब एक साथ चलते हैं। गलती छुपाने से अच्छा है उसे स्वीकार कर लेना, वरना बात बिगड़ते देर नहीं लगती। और सबसे बड़ी बात — अगर कोई आपकी अच्छाई का फायदा उठाए, तो ‘ना’ कहना भी एक कला है।
क्या आपके दफ्तर में भी कोई ‘जेन’ है? या फिर आपने भी कभी ऐसी स्थिति का सामना किया है? अपनी राय और मजेदार किस्से जरूर साझा करें!
आखिर में बस यही कहना चाहूंगा — “काम का बोझ तो बंट जाता है, पर ईमानदारी और आत्म-सम्मान का बोझ खुद ही उठाना पड़ता है।”
मूल रेडिट पोस्ट: Coworker makes work uncomfortable after she screwed up multiple reservations.