होटल की नौकरी में फंसा “धोखा”, और बॉस की दोहरी बातें – क्या आप भी ऐसे फंसे हैं?
कहते हैं, “नौकरी में बॉस की बात भगवान की बात होती है।” लेकिन जब बॉस खुद ही बार-बार बात बदल दे, तो कर्मचारी क्या करे? आज की कहानी है होटल के एक रिसेप्शनिस्ट की, जिसने जैसे-तैसे कंपनी के नियमों का पालन किया… और फिर भी फंस गया! सोचिए, कभी आपके साथ भी ऐसा हुआ है?
जब “ईमानदारी” भी बन गई मुसीबत
साल था 2020-21, जब पूरी दुनिया कोरोना से जूझ रही थी। होटल इंडस्ट्री में गेस्ट कम थे, लेकिन धोखाधड़ी (fraud) बढ़ रही थी। ऐसे में होटल में “एसोसिएट रेट” यानी कर्मचारियों और उनके परिवार के लिए सस्ती रेट पर कमरे बुक करने का सिस्टम था। लेकिन इसी का सबसे ज़्यादा गलत इस्तेमाल भी हो रहा था।
होटल के जनरल मैनेजर (GM) की नौकरी छोड़ने के बाद, रीजनल डायरेक्टर साहब कभी-कभी होटल आकर अपनी हाजिरी लगा जाते थे। एक दिन वह रिसेप्शन पर आए और बड़े ही गंभीर अंदाज में बोले, “एसोसिएट रेट के फॉर्म ध्यान से चेक करना, बहुत धोखा हो रहा है इन दिनों।” हमारे रिसेप्शनिस्ट (जिन्हें हम अमित मान लें) ने भी सिर हिलाकर कहा, “जी सर, मैं बहुत सतर्क हूं, बिना सही फॉर्म के कोई भी सस्ते रेट में चेक-इन नहीं कर पाता।”
“कागज़ दिखाओ, वरना चाबी नहीं!”
इसी दौरान एक रात, लगभग 10 बजे एक गेस्ट का फोन आया। “भाईसाहब, मैंने मोबाइल चेक-इन किया है, पर कमरे की चाबी क्यों नहीं मिली?” अमित ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “साहब, आपने जो एसोसिएट रेट में बुकिंग की है, उसके लिए फॉर्म चाहिए। बिना उसके चाबी नहीं दे सकते।”
अब गेस्ट साहब भड़क उठे, “कौन सा फॉर्म? मुझे तो किसी ने कुछ नहीं बताया!” अमित ने समझाया, “ये रेट सिर्फ कर्मचारियों या उनके परिवार वालों के लिए है, और बुकिंग के वक्त भी साफ लिखा है – फॉर्म ज़रूरी है। बिना उसके ये रेट नहीं मिलेगा।”
गेस्ट ने बहस की, “मेरे पास कन्फर्मेशन नंबर है, $79 की बुकिंग है, आप रेट मानो।” लेकिन अमित टस से मस नहीं हुआ। कई तरह के रेट देखे, पर सबसे सस्ता रेट भी $239 से कम नहीं था। आखिरकार गेस्ट ने गुस्से में फोन रख दिया, “मैं तुम्हारे बॉस से शिकायत करूंगा!” अमित ने रीजनल डायरेक्टर साहब का नंबर दे दिया, क्योंकि GM तो था ही नहीं।
बॉस की राजनीति: “जो करो, वो भी गलती!”
अब असली मसाला यहीं है! अगली बार जब रीजनल डायरेक्टर होटल आए, तो बड़े नाराज़ थे। बोले, “तुमने केस ठीक से हैंडल नहीं किया!” अमित हैरान, “पर सर, आपने ही तो कहा था, बिना फॉर्म के रेट मत देना!”
यहाँ, Reddit पर एक यूज़र ने बड़ा मज़ेदार कमेंट किया – “ये तो बिलकुल वैसा है, जैसे श्रोडिंगर की बिल्ली! करो तो भी फंसो, न करो तो भी फंसो।” हिंदी में कहें तो – “आगे कुआँ, पीछे खाई।”
कई कमेंट्स में लोगों ने शक जताया कि शायद डायरेक्टर साहब खुद ही किसी अपने रिश्तेदार को सस्ते में कमरे दिलाना चाहते थे! एक यूज़र ने तो मज़ाक में लिखा, “लगता है डायरेक्टर साहब ही ‘फ्रॉड’ के पीछे थे, और अब खुद फंस गए।” सोचिए, ऐसे बॉस के साथ काम करना कितना मुश्किल है!
एक और यूज़र ने सलाह दी – “ऐसे बॉस को सब कुछ लिखित में मांगो, ताकि बाद में कोई कहे तो आपके पास प्रूफ हो।” ये सलाह भारत के किसी भी दफ्तर में काम आने वाली है – “बातों का भरोसा मत करो, ईमेल या व्हाट्सऐप पर लिखवा लो!”
कर्मचारी का असली संकट: “किसकी सुनें, किसकी न सुनें?”
भारत में अक्सर होता है – नियम तो सबके लिए हैं, पर कभी-कभी बॉस की मर्जी सबसे ऊपर होती है। आजकल की दफ्तर संस्कृति में भी यही उलझन है – “कंपनी कहती है ईमानदारी रखो, लेकिन बॉस कहे तो जुगाड़ कर लो!” Reddit पर एक और कमेंट था – “ऐसे मैनेजर सिर्फ इसलिए एक्सेप्शन बनाते हैं, क्योंकि ग्राहक गुस्से में आ जाए तो सिरदर्द बढ़ जाता है।”
सोचिए, अगर अमित ने फॉर्म के बिना कमरा दे दिया होता, और बाद में पकड़ में आता, तो क्या होता? फिर भी गलती अमित की ही मानी जाती! ये एकदम वैसा ही है जैसे – “न बाबा, ना ही खेलेंगे, ना ही हारेंगे!”
सीख और मज़ेदार निष्कर्ष
तो, इस कहानी से क्या सीख मिलती है? दफ्तर में जब भी नियम और बॉस की मर्जी टकरा जाए, तो खुद को बचाने का सबसे अच्छा तरीका है – सबकुछ लिखित में रखो! और अगर कभी-भी ऐसा लगे कि बॉस की बात गोलमोल है, तो सीधे पूछो – “सर, क्या आप ये बात लिखित में बता सकते हैं?”
और हाँ, अगर आप होटल या किसी सर्विस इंडस्ट्री में काम करते हैं, तो ये समझ लीजिए – ग्राहक राजा है, पर नियम भी राजा हैं। दोनों के बीच संतुलन बैठाना ही असली कला है।
आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है, जब नियम पालन करने के बाद भी बॉस ने डांट लगाई हो? अपनी कहानी कमेंट में ज़रूर साझा करें! और अगर आपकी भी कोई “बॉस बनाम नियम” वाली किस्सा है, तो हमें बताएं – शायद अगली बार हम उसी पर ब्लॉग लिखें!
मूल रेडिट पोस्ट: Umm, sorry I did exactly what you told me to do?