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होटल की नौकरी छोड़ने की कहानी: जब नियमों से बड़ी हो गई फेक मैनेजमेंट

व्यस्त हवाई अड्डे के होटल में प्रबंधन समस्याओं पर विचार करता एक निराश होटल कर्मचारी।
यह दृश्य मेरे आतिथ्य के सफर की सच्चाई को दर्शाता है, जहाँ संचार में बाधा और अराजक प्रबंधन ने मुझे छोड़ने का निर्णय लेने पर मजबूर किया। आइए, मैं साझा करता हूँ कि एक व्यस्त हवाई अड्डे के होटल में काम करते समय किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

होटल इंडस्ट्री सुनने में जितनी ग्लैमरस लगती है, असलियत में उससे कहीं ज़्यादा चकरा देने वाली होती है। चमक-दमक के पीछे क्या-क्या चलता है, इसका अंदाज़ा सिर्फ वही लगा सकता है जो इस लाइन में काम कर चुका हो। आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जिसमें होटल के नियम, मैनेजमेंट की चालाकियाँ, और एयरलाइन के घमंडी मेहमानों की जुगलबंदी ने एक कर्मचारी की किस्मत ही बदल दी।

होटल की अंदरूनी राजनीति: ऊपर से सजा, अंदर से सड़ांध

अब ज़रा सोचिए, आप दिल्ली एयरपोर्ट के पास किसी बड़े होटल में नौकरी कर रहे हैं—जहाँ हर दिन नई-नई हस्तियाँ, एयरलाइंस के पायलट और क्रू आते-जाते हैं। लेकिन होटल के मैनेजमेंट का हाल वही पुराना—एकदम ढीला, बिलकुल जैसे सरकारी दफ्तर में बाबू। हमारी नायिका (जिनका नाम हम ‘सीमा’ मान लेते हैं) ने जब होटल में काम शुरू किया तो सब कुछ अच्छा लगा। लेकिन धीरे-धीरे समझ आ गया कि यहाँ तो बिन बताये ड्यूटी बदल दी जाती है, छुट्टी का कोई ठिकाना नहीं, और मैनेजर (यहाँ की ‘एम’ मैडम) को कम्युनिकेशन से उतनी ही नफरत है जितनी हमें सोमवार से।

एक और किरदार हैं ‘एच’ दीदी, जो रात की शिफ्ट में अकेली फुलटाइम ऑडिटर हैं। दिन रात शिकायतों की गाड़ी लेकर चलती रहती हैं, लेकिन खुद काम से जी चुराना इनका पसंदीदा शौक़ है। मज़े की बात, यही लोग पीठ पीछे दूसरों की बुराई करने में भी नंबर वन!

एयरलाइन के मेहमान और ‘VIP कल्चर’ की असलियत

अब बात आती है एयरलाइन वालों की। होटल का सबसे बड़ा क्लाइंट—Southwest Airlines। लेकिन भाईसाहब, इनके कर्मचारियों की अकड़ तो जैसे आसमान छू रही हो! चेक-इन के वक्त न नियम मानना, न तमीज़ से बात करना। एक कॉमेंटेटर (u/Big_Air3392) ने सही कहा, “हमेशा हर किसी से आईडी माँगी जाती है, चाहे वो कोई भी हो। क्या पता कोई और उनके नाम पर रूम ले जाए!” इस तर्क में दम भी है—भारत में भी तो पहचान पत्र माँगना एक आम सुरक्षा प्रक्रिया है, लेकिन यहाँ मैनेजमेंट को क्लाइंट की ‘भीख’ ज़्यादा प्यारी थी!

घमंडी पायलट, नियमों की बलि, और मैनेजमेंट की पलटी मार

एक दिन सीमा को मैनेजर ‘बी’ ने साफ-साफ कहा—“Southwest के लोग आ रहे हैं, आईडी लेकर ही रूम देना।” सीमा ने वही किया। तभी एक पायलट आया, जिसकी बद्तमीज़ी ने हद पार कर दी। ना सिर्फ़ बदसलूकी, बल्कि निंदनीय भाषा का इस्तेमाल भी किया। सीमा ने जब उसे रोका, तो मामला इतना बढ़ गया कि पुलिस बुलानी पड़ी! एयरलाइन ने खुद पायलट की शिकायत करने को कहा, पूरी जानकारी माँगी।

लेकिन सुबह होते-होते कहानी अचानक पलट गई। ‘एम’ मैडम आईं और बोलीं, “ये एयरलाइन हमारे बड़े क्लाइंट हैं, आगे से इनके कर्मचारियों की आईडी मत पूछना।” सीमा अवाक! अभी कल तक तो मैनेजर बी खुद कह रहे थे कि बिना आईडी रूम नहीं मिलेगा, अब अचानक नियम बदल गया? ऊपर से ग्रुप चैट में सस्पेंशन का नोटिस—“पिछली रात की घटना की जाँच होगी।” किस बात की जाँच? कर्मचारी ने तो वही किया जो उसे सिखाया गया था!

Reddit कम्युनिटी की राय: मैनेजमेंट का असली चेहरा

इस कहानी पर Reddit की कम्युनिटी में भी बहस छिड़ गई। एक यूज़र (u/streetsmartwallaby) बोले, “तुम्हारे मैनेजर की सोच ही गड़बड़ है।” दूसरे यूज़र (u/Excellent_Honey5848) ने कहा, “जब नियम तोड़ते हैं और तुम्हें ही जिम्मेदार ठहराते हैं, तो वहाँ से निकलना ही बेहतर है।” एक फ्लाइट अटेंडेंट (u/Comfortable-Wheel-41) ने बताया कि 20 साल के करियर में उनसे कभी आईडी नहीं माँगी गई—जो अपने आप में दिलचस्प है। किसी ने यह भी लिखा, “जब नियम अचानक बदल जाएँ, तो समझो बस पैसे की हेरा-फेरी चालू है।”

भारतीय दफ्तरों में भी ऐसा बहुत देखा होगा—बॉस अचानक नियम बदल देते हैं, और जब गलती हो जाए तो कर्मचारी को बलि का बकरा बना देते हैं। सबकी जान पहचान और क्लाइंट की फेवरिटिज़्म में सच्चाई और नियमों की कोई जगह नहीं बचती।

नौकरी छोड़ने का फैसला: खुशी और आज़ादी की ओर

सीमा ने आखिरकार ठान लिया—“अब और नहीं!” जाँच-पड़ताल, उलझन, और रोज़-रोज़ की सिरदर्द से तंग आकर उसने नौकरी छोड़ दी। अब वो ज़्यादा खुश और स्वस्थ महसूस करती है। उसकी कहानी उन सभी के लिए आईना है, जो ऑफिस की राजनीति, पक्षपात और बिना सर-पैर के नियमों से परेशान हैं।

कहानी से हमें यही सिखने को मिलता है—कभी-कभी सुकून और आत्म-सम्मान के लिए ‘नो’ कहना ही सबसे अच्छा होता है। और भाई साहब, अगर आपके ऑफिस में भी अचानक नियम बदल जाएँ, तो समझ जाइए—यहाँ कुछ गड़बड़ है!

निष्कर्ष: आपकी क्या राय है?

तो दोस्तों, आपके साथ भी ऑफिस में कभी ऐसी ऊल-जलूल राजनीति हुई है? क्या आपने कभी नियम निभाने के बावजूद फँसने का दर्द झेला है? नीचे कमेंट में अपनी कहानी ज़रूर शेयर करें। और अगर आपको यह किस्सा मज़ेदार लगा हो, तो दोस्तों को भी भेजें—शायद उनकी भी आँखें खुल जाएँ!


मूल रेडिट पोस्ट: Finally out of hospitality. My quitting story