होटल की ड्यूटी, हॉकी का कहर और गिल्ट ट्रिप – जब काम से ज़्यादा थकाऊ होते हैं साथी कर्मचारी
कहते हैं होटल में काम करना किसी जंग से कम नहीं। लेकिन जब होटल तीन स्टार हो, स्टाफ सीमित, और ऊपर से हॉकी सीज़न आ जाए, तो समझिए कि ‘काम’ शब्द ही अपना असली रूप दिखाता है। हमारे नायक – तीन साल से इसी होटल की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, और हॉकी के मौसम में जो आफ़त टूटती है, उसका कोई जवाब नहीं। थकावट, तनाव और गिल्ट ट्रिप – सब कुछ एक साथ।
होटल की ड्यूटी और हॉकी का तूफ़ान
ज़रा सोचिए – सर्दियों की रातें, पूरा होटल हॉकी टीमों से भरा हुआ, और फ्रंट डेस्क पर अकेले आप! पिछले दो सालों में तो हाल ये था कि हर हॉकी वीकेंड के बाद मानसिक थकावट ऐसी कि सपनों में भी वही हंगामा दिखे। एक बार तो हालात इतने बिगड़ गए कि पुलिस को सात गाड़ियों के साथ आना पड़ा। पुलिस वालों ने भी सिर पकड़कर कहा – “इतने बड़े होटल में अकेले ड्यूटी? ये तो सरासर अन्याय है!”
इसीलिए इस साल हमारे नायक ने ठान लिया – अब बस! बॉस से सीधा बोल दिया, “हॉकी वाले शुक्रवार-शनिवार की रातें अब नहीं करूंगा।” बॉस ने भी अपने स्टाइल में समझाया – “शुक्रवार तो मुमकिन नहीं, स्टूडेंट वर्कर हैं, लेकिन शनिवार की छुट्टी मिल सकती है।” थोड़ा समझौता हुआ, थोड़ा राहत मिली।
‘इक तो काम कम नहीं, ऊपर से सहकर्मी का व्यवहार!’
अब आते हैं असली मसाले पर – हमारे नायक की ‘दिन की शिफ्ट’ वाली सहयोगी। जी हां, वही जो हर रोज़ 6:30 बजे आ जाती हैं, बिना घड़ी देखे ‘ऑफ द क्लॉक’ काम शुरू। अगर पेन कम पड़ जाएं, तो खुद खरीदकर ले आती हैं। रजिस्टर कार्ड तक घर ले जाकर मार्कर से हाइलाइट करती हैं – इतनी लगन, इतनी मेहनत, लेकिन किसी को चैन नहीं।
अगर कभी हाउसकीपिंग धीमी हो जाए, तो खुद झाड़ू-पोंछा लेकर कमरे साफ करने लगती हैं। और जब हॉकी की ड्यूटी की बात आई, तो ऐसे देखती हैं जैसे हमारे नायक ने होटल छोड़कर भागने का ऐलान कर दिया हो।
गिल्ट ट्रिप की अद्भुत कला
“शनिवार को ड्यूटी नहीं करोगे?!” – stern look, तनी हुई आवाज़, और फिर वही फेवरेट डायलॉग – “तुम्हें पता है, इससे बॉस को खुद आना पड़ेगा!” अब हमारे नायक भी ठहरे अनुभवी, बोले – “भई, यूरोप ट्रिप के दौरान तो स्टूडेंट वर्कर ने भी संभाल लिया था। सब चलता है।”
लेकिन दिन की शिफ्ट वाली महिला को चैन कहां? “नहीं-नहीं, हॉकी में स्टूडेंट वर्कर नहीं चलेगा। मैं खुद बॉस को बोलूंगी, मैं करूंगी शिफ्ट। देखो, हम सबने हॉकी नाइट्स निकाली हैं। यहां तक कि रॉबर्ट साहब 70 की उम्र में भी कर गए!”
यहां कमेंट सेक्शन की एक मजेदार बात याद आती है – एक यूज़र ने लिखा, “भई, बॉस अगर खुद शिफ्ट करेंगे तो शायद उन्हें असली हालात का अंदाजा हो जाएगा, और सबके लिए कुछ नए नियम बन जाएं!” मतलब, हमारे नायक ने तो पूरे स्टाफ की भलाई का रास्ता खोल दिया।
क्या काम ही सब कुछ है? – समाज और ‘वर्कोहलिज़्म’ की बहस
हमारे यहां भी ऐसे बहुत लोग मिलेंगे जो मानते हैं – “काम करते रहो, मेहनत से किसी का कुछ बिगड़ा नहीं!” लेकिन क्या वाकई? एक कमेंट में किसी ने बहुत सुंदर लिखा – “ये जो कहते हैं ‘काम से किसी का कुछ नहीं बिगड़ता’, शायद उन्हें कभी असली तनाव या बीमारियों का सामना नहीं करना पड़ा। कई बार तो लोग इसी बोझ में टूट जाते हैं।”
दूसरी तरफ, दिन की शिफ्ट वाली महिला का ‘आदर्श कर्मचारी’ वाला रुख – खुद से ज्यादा दूसरों की चिंता, बॉस की जगह भी सोच लेना, हर बात में दखल – ये हमारे ऑफिसों में भी खूब देखने को मिलता है। ऐसे लोगों को देखकर कई बार लगता है जैसे वही बॉस हों, और असली बॉस को भी ‘गिल्ट ट्रिप’ पर भेज रहे हों!
पाठकों के लिए – क्या कभी आपने भी ये झेला है?
अंत में, बात वही है – अपने काम की परवाह ज़रूर करें, लेकिन अपनी सेहत और मानसिक संतुलन को नज़रअंदाज़ ना करें। होटल हो या कोई और दफ्तर, काम का बोझ और गिल्ट ट्रिप देने वाले साथी हर जगह मिलेंगे। लेकिन ज़रूरत है अपनी हद तय करने की, खुलकर बोलने की – जैसे हमारे नायक ने किया।
आपका क्या अनुभव रहा है ऐसे ऑफिस ‘वर्कोहलिक्स’ या गिल्ट ट्रिप मास्टरों से? कमेंट में ज़रूर बताएं – हो सकता है आपकी कहानी भी किसी को राहत दे जाए!
मूल रेडिट पोस्ट: The guilt trip