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होटल की छत, फंसी मेहमान और दरवाज़ा जो खुला ही था – एक रिसेप्शनिस्ट की मज़ेदार दास्तान

एक महिला बाथिंग सूट में रात के समय एक बंद हॉट टब दरवाजे के पास मदद के लिए मजाकिया अंदाज में पुकार रही है।
एक फिल्मी पल में, हमारी मेहमान rooftop पर हॉट टब से "बंद" होकर मदद के लिए चिंतित कॉल कर रही थी। उसे पता नहीं था कि दरवाजा वास्तव में बंद नहीं था! आइए इस रात की मजेदार घटना पर हंसते हैं।

होटल में काम करना वैसे भी कम दिलचस्प नहीं होता, लेकिन जब कोई मेहमान खुद ही मुसीबत बना ले, तो मामला वाकई दिलचस्प हो जाता है। सोचिए, आधी रात को छत पर रखे हॉट टब के बाहर कोई मेहमान ठंड में कांपती हुई खड़ी हो, फोन पर 112 (या अमेरिका में 911) पर कॉल कर रही हो, जबकि दरवाज़ा एकदम खुला हो! बस, ऐसे ही एक होटल रिसेप्शनिस्ट की सच्ची कहानी आज आपके लिए लाया हूँ, जो जितनी मज़ेदार है, उतनी ही सोचने वाली भी।

दरवाज़ा खुला था, पर समझदार बंद था!

शाम के करीब 11 बजे, रिसेप्शनिस्ट (जो कहानी सुना रहे हैं) छत पर लगे हॉट टब को बंद करने गए। वहां देखा कि एक महिला, नहाने के कपड़ों में ठंड से कांपती हुई, दरवाज़े के बाहर खड़ी है और 911 पर कॉल कर रही है। रिसेप्शनिस्ट ने दरवाज़ा खोला, महिला अंदर आई, और पुलिस कुछ ही मिनट में वहां आ गई। रिसेप्शनिस्ट ने पुलिस को समझाया कि सब ठीक है, महिला कभी भी सच में फंसी नहीं थी – दरवाज़ा तो खुला ही था!

अब सोचिए, इतनी बड़ी होटल में, जब भी कोई दिक्कत हो, तो सबसे पहले रिसेप्शन (यानी फ्रंट डेस्क) पर कॉल किया जाता है। लेकिन हमारी इस गेस्ट को न जाने क्या सूझी कि सीधे पुलिस ही बुला ली। अगर वो हॉट टब में से ही रिसेप्शन को फोन कर देती, तो ठंड में भी न फंसती और सब आसान हो जाता। खुद रिसेप्शनिस्ट भी हैरान थे – "पता नहीं उसने मुझे कॉल क्यों नहीं किया?"

"खींचो या धकेलो" – दरवाज़ों की जंग

यह किस्सा पढ़कर मुझे हमारे यहां अक्सर होने वाले किस्से याद आ गए, जब लोग शॉपिंग मॉल, बैंक या सरकारी ऑफिस में दरवाज़ा खोलने के लिए "खींचने" की जगह "धक्का" देते हैं या उल्टा कर देते हैं। एक कमेंट में किसी ने मज़ाक में लिखा, "अगर दरवाज़ा खींचना था, तो उसने धक्का दिया, और अगर धक्का देना था, तो उसने खींचा। और कुछ कोशिश ही नहीं की।"

यह बात सच है! कई बार हम खुद भी ऐसी गलती कर बैठते हैं। हमारे देश में भी कई जगह दरवाज़ों पर "Push" या "Pull" की जगह हिंदी में "धक्का दें" या "खींचें" लिखा होता है, लेकिन लोग फिर भी गड़बड़ा जाते हैं। एक और मज़ाकिया कमेंट था – "लगता है ये मेहमान 'Midvale School for the Gifted' से ग्रेजुएट थी," यानी उनकी समझदारी पर हल्का सा कटाक्ष।

होटल में रोज़मर्रा की मस्त-मस्त मुश्किलें

फ्रंट डेस्क पर काम करने वाले लोग सिर्फ चेक-इन, चेक-आउट या चाबी देना ही नहीं करते; उनकी रोज़मर्रा की जि़ंदगी में ऐसा बहुत कुछ होता है, जो मज़ेदार भी है और सिरदर्द भी। जैसे, एक और किस्सा किसी ने शेयर किया कि शादी के बाद सुबह-सुबह लॉबी में भीड़ थी, एक महिला अपना पर्स कुर्सी पर छोड़कर कॉफी लेने चली गई। जब लौटी, तो पर्स गायब था! उसने हाउसकीपिंग वाले पर चोरी का इल्ज़ाम लगा दिया, पुलिस बुला ली, घंटों हंगामा चला। आखिर में पता चला कि परिवार के ही किसी बुजुर्ग ने गलती से पर्स उठा लिया था। लेकिन महिला ने होटल वालों को कभी माफ़ी नहीं मांगी, उल्टा ऑनलाइन एक स्टार रिव्यू छोड़ दी!

इसी तरह एक और मेहमान ने अपने चश्मे के लिए होटल स्टाफ को चोर बता दिया, जबकि सीसीटीवी में साफ दिख गया कि वो खुद चश्मा सिर पर लगाकर चली गई थी।

होटल स्टाफ की जि़ंदगी – आधी रात की मारामारी

हमारे असली कहानीकार रिसेप्शनिस्ट के साथ तो और भी मज़ेदार वाकया हुआ। दो हफ्ते बाद, होटल के बाहर किसी को किसी ने पीट दिया। घायल मेहमान होटल में घुस आया और कुर्सियां फेंकने लगा। रिसेप्शनिस्ट ने पहले तो सोचा, चलो एक कुर्सी फेंकी है, चोट लगी होगी, छोड़ो! लेकिन जब कुर्सियों की बारिश होने लगी, तो रात 12 बजे होटल मैनेजर को बुलाना पड़ा, पुलिस को भी फोन करना पड़ा। आखिर में मेहमान को अस्पताल ले जाना पड़ा – पर कोई जेल नहीं गया!

इस पर कई कमेंट्स में सलाह दी गई – "भैया, अगर कभी मारपीट हो रही हो, तो सबसे पहले पुलिस को ही फोन करो! मैनेजर दूसरी कॉल होनी चाहिए।" होटल स्टाफ की यह मजबूरी है कि उन्हें हर हाल में शांत रहना पड़ता है, चाहे खुद पर कुर्सी फेंक दी जाए!

क्या हम भी ऐसे हैं?

कभी-कभी हम खुद भी छोटी-छोटी बातों को बड़ा बना देते हैं। जैसे, कोई चीज़ खो जाए तो बिना जांचे-परखे किसी पर इल्ज़ाम लगा देते हैं, या कभी खुद गलती हो, तो मानने की जगह दूसरों को दोष दे देते हैं। होटल स्टाफ के लिए यह रोज़ का सिरदर्द है, लेकिन वे फिर भी मुस्कुरा कर काम करते हैं।

समुदाय के कुछ कमेंट्स में बड़ा दिलचस्प तंज था – "कुछ लोग कभी अपनी गलती मानते ही नहीं। झूठा रिव्यू छोड़कर निकल जाते हैं, लेकिन माफ़ी मांगना नहीं आता।" और वाकई, यह सिर्फ होटल की समस्या नहीं, हम सबकी आदत बन गई है।

निष्कर्ष – अगली बार सोच-समझकर दरवाज़ा खोलिए!

दोस्तों, अगली बार जब आप किसी होटल या दफ्तर में फंस जाएं, तो पहले सोचिए – क्या सच में दरवाज़ा बंद है या हमारी समझदारी बंद है? रिसेप्शन पर फोन करना, मदद मांगना छोटे कदम हैं, लेकिन कई बार बड़ी मुसीबत टाल सकते हैं। और हां, अपनी ग़लती मानने में कभी शर्म न करें – यह भी इंसानियत का हिस्सा है।

अगर आपके साथ भी कभी ऐसा अजीब किस्सा हुआ हो, तो कमेंट में जरूर शेयर करें। कौन जाने, आपकी कहानी भी किसी दिन इंटरनेट पर वायरल हो जाए!

शुभकामनाएं – सुरक्षित रहिए, खुश रहिए, और अगली बार दरवाज़ा सही दिशा में खोलिए!


मूल रेडिट पोस्ट: Silly person that can't push a shit open.