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होटल के काउंटर पर बड़ों की बचकानी हरकतें: क्या हमारे पास कोई इलाज है?

एक आधुनिक सेटिंग में बचकाने वयस्क व्यवहारों का सामना करती एक निराश महिला का कार्टून-3डी चित्रण।
इस जीवंत कार्टून-3डी छवि में, एक महिला वयस्क बच्चों के साथ अपनी निराशा को संभालते हुए, रोज़मर्रा की जिंदगी में अपरिपक्व व्यवहार का सामना करती है।

अगर आप सोचते हैं कि होटल का रिसेप्शनिस्ट बनना बड़ा आसान काम है, तो जनाब, ज़रा रुकिए! असली मसाला तो वहीं मिलता है, जब बड़े-बड़े 'समझदार' मेहमान बच्चों जैसी हरकतें करने लगें। आज की कहानी एक ऐसे ही होटल फ्रंट डेस्क कर्मचारी की ज़ुबानी, जिसने हाल ही में अपने सब्र का इम्तिहान झेला।

जब बड़े भी बन जाते हैं बच्चे

कहते हैं, “अतिथि देवो भवः”—लेकिन भैया, जब मेहमान देवता कम और नखरेबाज़ बच्चे ज्यादा लगने लगें, तो क्या किया जाए? हमारे किस्से के नायक (या कहें, बेचारे फ्रंट डेस्क वाले) हाल ही में रिश्ते और परिवार की मुश्किलों से गुज़र रहे थे। ऊपर से ऑफिस में आए दिन टेढ़े-मेढ़े ग्राहक! ऐसे में किसी का भी पारा चढ़ना लाज़मी है।

एक शाम एक महिला होटल में आईं, पूछा—कमरा खाली है? भाईसाहब ने आदर से बताया, “हां, एक कमरा बचा है।” कमरा दिखाया, सारी सुविधाएं समझाईं, और उन्होंने बुकिंग कर ली। पति महाशय तो अंदर आते वक्त ‘नमस्ते’ भी नहीं बोले—चलिए, शायद सफर से थके हों!

इंटरनेट का जादू...या जंजीर?

अब असली तमाशा दो घंटे बाद हुआ। वही महिला गुस्से में आग-बबूला होकर नीचे आईं—“रूम में इंटरनेट ही नहीं है!” अब रिसेप्शनिस्ट सोचने लगे, बाकी किसी ने शिकायत नहीं की, शायद नेट डिस्कनेक्ट हो गया हो? प्यार से समझाया, “मैम, कभी-कभी सिग्नल कमज़ोर होता है, कमरे के दरवाज़े के पास ट्राई कीजिए।”

महिला ने बात काट दी—“मैं कह रही हूं, नहीं है!” आवाज़ में इतना गुस्सा कि जैसे रिसेप्शनिस्ट ने खुद वाई-फाई काट दिया हो! भाईसाहब ने तुरंत कहा, “मैं अभी चेक करवा देता हूं।” जाने से पहले याद दिलाया, “चाबी यहीं छोड़ दीजिएगा।” वजह? होटल की चाबी होटल की संपत्ति होती है—और पहले कई बार मेहमान चाबी लेकर चलते बने, तो नुकसान रिसेप्शनिस्ट की जेब से!

अब आया असली ‘ड्रामा’। महिला बोलीं, “हूं? क्यों?” फिर बड़े प्यार से समझाया गया, “मैम, ये निजी संपत्ति है, बाहर ले जाना मना है। लौटिए, चाबी मिल जाएगी।” महिला ने ताना मारा, “अगर मेरे लौटने तक कुछ गायब हुआ तो?” अब ये क्या सवाल हुआ! भाईसाहब बोले, “कोई आपकी गैरमौजूदगी में क्यों जाएगा?” फिर भी महिला ने चाबी ऐसे फेंकी जैसे कोई टूटा हुआ खिलौना हो, और निकल गईं।

किस्सा यहीं खत्म नहीं होता

कहानी सुनते-सुनते आपको भी गुस्सा आ रहा होगा, है ना? और यही गुस्सा कई Reddit यूज़र्स ने भी जाहिर किया। एक ने मस्त तंज कसा—“क्या उन्हें लगता है कि चाबी साथ ले जाएंगी तो रिसेप्शनिस्ट के पास दूसरा रास्ता नहीं बचेगा रूम में घुसने का?” वहीं, एक और ने समझाया, “छोटे होटल्स में अक्सर पुरानी किस्म की चाबियाँ होती हैं, जिनका ज्यादा ट्रैकिंग नहीं हो पाता।” यानी, चाबी रखना होटल की सुरक्षा और रिसेप्शनिस्ट की नौकरी दोनों के लिए ज़रूरी है।

एक और कमेंट पढ़कर तो हंसी छूट गई—“अगर होटल स्टाफ को रूम में घुसना ही होता, तो चाबी से नहीं, मास्टर चाबी से घुस सकते हैं!” भारत में भी अक्सर लॉज या पुराने गेस्ट हाउस में चाबी रिसेप्शन पर छोड़ने की परंपरा है—क्या आपने कभी ऐसी स्थिति झेली है?

दफ्तर की राजनीति से अलग नहीं होटल का काउंटर भी

जैसे भारत में दफ्तरों में बॉस की डांट, सहकर्मियों की चुगली और कागज़ी घोड़े दौड़ते रहते हैं, वैसे ही होटल का रिसेप्शन भी एक जंग का मैदान है। ग्राहक के नखरे एक तरफ, ऊपर से नियम-कायदे अलग! रिसेप्शनिस्ट को ‘समझदारी’ और ‘संवेदनशीलता’ दोनों का बैलेंस बनाकर चलना पड़ता है।

कई बार ग्राहक सोचते हैं कि “हम पैसे दे रहे हैं, तो मालिकाना हक़ मिल गया”—लेकिन भाई, नियम सबके लिए हैं! होटल मालिक की संपत्ति की सुरक्षा, बाकी मेहमानों की सुविधा, सबका खयाल रखना पड़ता है। और जब कोई बिना बात बद्तमीज़ी करे, तो सब्र का बांध टूट जाना लाजिमी है।

होटल वालों के लिए टिप्स—और मेहमानों के लिए भी

अगर आप रिसेप्शन पर काम करते हैं, तो याद रखिए—हर ग्राहक राजा नहीं, कुछ तो बस ‘राजा बेटा’ हैं! और अगर आप मेहमान हैं, तो थोड़ा सा शिष्टाचार—“नमस्ते”, “धन्यवाद”—किसी का दिन बना सकता है। क्लेश से बचिए, वरना कहानी बनकर इंटरनेट पर वायरल हो सकते हैं!

सबक यही है—बड़ों को कभी-कभी बच्चों से भी ज्यादा तमीज़ सीखने की ज़रूरत होती है। और होटल का रिसेप्शन? वहां हर दिन एक नई कहानी बनती है!

आपकी क्या राय है?

क्या आपने भी कभी होटल में ऐसे ‘बच्चे बने बड़े’ देखे हैं? या खुद रिसेप्शन पर ऐसे अनुभव झेले हैं? नीचे कमेंट में अपनी कहानी जरूर सुनाइए, और अगर पोस्ट पसंद आई हो तो शेयर करना मत भूलिए। अगली बार जब होटल जाएँ, तो रिसेप्शनिस्ट को भी एक मुस्कान दीजिए—कौन जाने, उनका दिन कैसा चल रहा हो!


मूल रेडिट पोस्ट: I don’t get paid enough for adult toddlers