होटल की आखिरी घंटी: जब कुत्तों की लड़ाई ने फ्रंट डेस्क को बना दिया अखाड़ा!
कहते हैं न, मुसीबत कभी समय देखकर नहीं आती। और अगर आप किसी होटल के रिसेप्शन पर काम करते हैं, तो ये बात और भी सटीक बैठती है! वैसे तो जानवरों से प्यार करने वाले होटल में रोज़ कुछ न कुछ मज़ेदार होता ही रहता है, लेकिन जब आखिरी घंटे में कुत्तों की लड़ाई छिड़ जाए, तो समझ लीजिए आपके धैर्य की असली परीक्षा शुरू हो गई है।
आखिरी घंटे का तूफान: होटल वाले की दुविधा
तो जनाब, एक पेट-फ्रेंडली होटल में सात महीने की नौकरी के बाद मुझे कुत्तों के भौंकने की आदत-सी हो गई है। ज़्यादातर मालिक अपने कुत्तों को संभाल लेते हैं, और मामला वहीं शांत हो जाता है। लेकिन कल जो हुआ, उसने तो मेरी पूरी शिफ्ट को हिला कर रख दिया।
जैसे ही मैं कैश रजिस्टर गिनने लगा, बाहर से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आई – सोचा, "चलो, रोज़ की बात है।" तभी किसी महिला की चीख और रोने की आवाज़ सुनाई दी। मैं और मेरी मैनेजर दौड़े-भागे बाहर निकले। एलीवेटर के पास पहुंचे, तो देखा – एक बुज़ुर्ग महिला कोने में अपने छोटे से कुत्ते के साथ डर के मारे सिमटी हुई थी, आँसू बह रहे थे। उनके पति ज़मीन पर पड़े थे, शायद गिर पड़े थे। सामने एक और मेहमान अपने तीन बड़े कुत्तों (दो पिट मिक्स और एक लैब्राडोर मिक्स) को पकड़ने की नाकाम कोशिश कर रहा था – और ऊपर से दो कुत्ते तो बिना पट्टे के थे! हमारे होटल के नियमों के हिसाब से ये साफ़-साफ़ ग़लत था।
होटल के नियम, मेहमान की मनमानी और बढ़ता बवाल
अब आप सोच रहे होंगे – होटल में कुत्तों के लिए ऐसे नियम क्यों? हमारे यहाँ हर जानवर को पट्टे में रखना ज़रूरी है, ताकि बाकी मेहमानों को असुविधा न हो। लेकिन कुछ लोग तो नियमों को मज़ाक समझते हैं। वो साहब तो तीन-तीन कुत्ते (दो तो ऑफ-लीश!) लेकर घूम रहे थे, जबकि होटल में दो बड़े कुत्तों की ही अनुमति है। बाद में पता चला कि उसने एक कुत्ते को छुपा कर लाया था – जैसे स्कूल में बच्चे टिफिन में आम के अचार छुपा लेते हैं!
इस पूरे हंगामे में, बुज़ुर्ग महिला को पैनिक अटैक आ गया और उनके पति उन्हें संभालने लगे। मैंने पानी लाकर दिया, लेकिन मामला बढ़ता ही चला गया। एक तरफ़ कुत्तों के मालिक कह रहे थे कि उनका छोटा कुत्ता पहले भौंका, तो दूसरी तरफ़ महिला कह रही थीं कि बड़े कुत्ते ने उनके कुत्ते पर अटैक किया। अब सच्चाई क्या थी, ये तो ऊपर वाला ही जाने, लेकिन जब तीन बड़े कुत्ते (जो छोटी गाड़ी के बराबर थे!) बिना पट्टे के हों, तो डरना तो लाज़मी ही है।
“डॉग स्प्रिंगर” से लेकर जानवरों की जिम्मेदारी तक
इस घटना के बाद होटल की लॉबी में मानो महाभारत छिड़ गई थी – दस लोग तमाशा देख रहे थे, दो पक्ष आपस में लड़ रहे थे, और मैं, जो कभी ऊँची आवाज़ में बात नहीं करता, मुझे भी चिल्लाना पड़ा, "आप अभी लॉबी छोड़ दीजिए, बात यहीं खत्म!"।
एक मज़ेदार कमेंट आया, "ये तो डॉग्स का 'जैरी स्प्रिंगर शो' हो गया!" (अमेरिका का फेमस विवादास्पद टीवी शो) – भारत में कहें तो जैसे टीवी पर 'ससुराल सिमर का' में नागिन और मक्खी के बीच जंग चल रही हो!
एक दूसरे कमेंट ने बड़ा सही कहा – "बड़े कुत्तों की ताकत और उनका स्वभाव अगर मालिक के कंट्रोल में न हो, तो वे वाकई खतरनाक हो सकते हैं।" होटल के नियम तो इसलिए बने हैं कि ऐसे हादसे ना हों, लेकिन जब मालिक ही गैर-जिम्मेदार हों, तब क्या किया जाए?
कुछ पाठकों ने सुझाव दिया कि ऐसे मालिकों पर भारी जुर्माना लगाना चाहिए। हमारे यहाँ अगर कोई अपने पालतू जानवर की जानकारी छुपाता है, तो २५० डॉलर का फाइन है – लेकिन शायद अब पट्टा न लगाने पर भी इसी तरह का फाइन लगाना पड़ेगा।
एक और कमेंट ने बड़े प्यार से बताया, "मेरी बेटी के पास भी केन कोर्सो नस्ल का कुत्ता है, लेकिन वो हमेशा ट्रेनिंग में रहती है, मुँह पर मज़बूत पट्टा, ताकि किसी को डर न लगे। असली जिम्मेदारी तो मालिक की है।"
जिम्मेदारी की सीख, और होटल की मजबूरी
इस घटना के बाद होटल ने उस मेहमान का नाम 'डू नॉट रेंट' लिस्ट में डाल दिया है। अब वह कभी हमारे यहाँ कमरा नहीं ले सकेगा। साथ ही, एनिमल कंट्रोल को बुलाया गया, और बुज़ुर्ग महिला–पुरुष अदालत जाने की सोच रहे हैं, ताकि मेडिकल और वेटनरी बिलों का नुकसान वसूल सकें।
सच कहूँ तो, ऐसे वाकये देखकर समझ आता है कि क्यों भारत में ज़्यादातर होटल पालतू जानवरों की अनुमति नहीं देते। जिम्मेदारी की कमी, दूसरों की परवाह न करना – यही असली जड़ है।
जैसा एक पाठक ने कहा, "प्यारे कुत्तों की बदनामी इन गैर-जिम्मेदार मालिकों की वजह से होती है।"
और सच में, चाहे कुत्ता छोटा हो या बड़ा, अगर मालिक होशियार और जिम्मेदार है, तो कोई भी नस्ल डरावनी नहीं होती।
निष्कर्ष: होटल में शांति चाहिए, नियमों का पालन ज़रूरी
आखिर इस पूरे मामले से क्या सिखने को मिला? चाहे आप होटल में हों या अपने मोहल्ले में – पालतू जानवर रखना शौक नहीं, जिम्मेदारी है। नियम सबके लिए बने हैं, और उनका पालन करना हर किसी का कर्तव्य है।
होटल हो या सोसाइटी, अगर हम सब थोड़ा ध्यान रखें, तो ऐसी घटनाएँ कभी न हों।
तो अगली बार जब आप अपने डॉगी या बिल्ली के साथ ट्रैवल करें, तो पट्टा, टोकरी और नियमों की पूरी लिस्ट साथ रखें – वरना आखिरी घंटे में जो बवाल मच सकता है, उसकी कोई गारंटी नहीं!
क्या आपके साथ भी कभी ऐसी कोई घटना हुई है? नीचे कमेंट में जरूर बताइए – और अगर पसंद आया हो, तो शेयर करना न भूलें!
मूल रेडिट पोस्ट: Why is it always the last hour?