हॉकी सीज़न आया, होटल की मुसीबतें संग लाया: खेल टीमों की मस्ती और बवाल की दास्तान
हर साल जब क्रिकेट या कबड्डी का सीज़न खत्म होता है, तो होटल वालों के दिल में थोड़ी राहत की सांस आती है – “चलो, अब शांति मिलेगी!” लेकिन अमेरिका में, जहाँ बेसबॉल और सॉफ्टबॉल खत्म होते ही हॉकी का तूफान आ जाता है, वहाँ होटल कर्मचारियों की हालत कुछ और ही हो जाती है। ऐसा लगता है जैसे शरारती बच्चों की बारात होटल में उतर आई हो – ऊपर से उनके स्पोर्ट्स-प्रेमी पापा भी साथ!
जब होटल बना खेल का मैदान
इस बार होटल में एक साथ दो हॉकी टीमों की बुकिंग थी – 12 से 14 साल के लड़कों की टीमें, जिनके साथ उनके ‘स्पोर्ट ब्रदर्स’ पापा भी थे। होटल स्टाफ ने पहले से ही घर के नियम हर जगह चिपका दिए थे – “सार्वजनिक जगहों पर शराब मना है”, “बच्चों पर निगरानी रखें” वगैरह-वगैरह। लेकिन ये नियम मानने की बजाय, कुछ मेहमान तो बस नाम लिखकर चलते बने – जैसे स्कूल में हाजिरी लगानी हो।
पहले ही दिन 40 चेक-इन! और उसके साथ ही शुरू हो गया ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ का सिलसिला — “क्या हम जल्दी चेक-इन कर सकते हैं?”, “मेरी वाइफ का नाम तो रूम में है नहीं, क्या उसे चाबी मिल सकती है?” एक स्टाफ सदस्य ने तो मज़ाक में कहा, “शायद आपको अपनी गर्लफ्रेंड के नाम पर भी कमरा दे दूँ, लेकिन क्रेडिट कार्ड की फॉर्मलिटी कौन करेगा?”
बच्चों से ज़्यादा तगड़े निकले उनके पापा!
यहाँ आमतौर पर लोग सोचते हैं कि छोटे बच्चे शोरगुल करते हैं, लेकिन यहाँ मामला उल्टा था। एक कमेंट में एक सदस्य ने लिखा, “बच्चे तो गेमिंग सेंटर में शांति से कंप्यूटर पर गेम खेल रहे थे, असली झंझट तो उनके पिता लोग कर रहे थे!” सच बात है, बच्चे जहाँ-तहाँ घूम रहे थे, लेकिन जब स्टाफ ने टोका, तो वे चुपचाप बैठ गए। परंतु, पापा लोग लॉबी में मीटिंग के बहाने टीवी पर मैच देखने और बीयर पीने में मशगूल थे।
जब स्टाफ ने नियम याद दिलाए, तो पापा लोग बोले – “अभी तो 10 भी नहीं बजे!” और “ठीक है, मां जी!” (सोचिए, बड़ों की हरकतें बच्चों से भी आगे निकल गईं)। एक और कमेंट में तो किसी ने कहा, “ये हॉकी डैड्स होटल में आकर ऐसे बर्ताव करते हैं जैसे शादी-ब्याह में बारात आई हो!”
होटल में महौल – डोरिटोज़, डियोड्रेंट और धमाल!
एक और मजेदार टिप्पणी में किसी ने लिखा, “हॉकी सीज़न में तो होटल के लॉबी से डोरिटोज़ के टुकड़े और बॉडी स्प्रे की खुशबू महीनों तक नहीं जाती।” भारतीय होटलों में भी कई बार शादियों के बाद पान मसाले और फूलों की खुशबू महीनों तक रहती है, वैसे ही यहाँ भी होटल के हर कोने में स्पोर्ट्स टीमों की छाप रह जाती है।
खेल के बाद, जब टीमों ने होटल छोड़ा, तो हालात बयाँ करने लायक नहीं थे – एक कुर्सी टूटी मिली, लॉबी अस्त-व्यस्त। जब स्टाफ ने पूछा, “किसका काम है ये?”, तो जवाब मिला – “किस ‘नेपोबेबी’ ने किया, पता ही नहीं चलता!” (नेपोबेबी यानि बड़े बाप की औलाद, जिनकी जिम्मेदारी कोई नहीं लेता)। और ऊपर से, अगली रात के लिए कुर्सी अनुपलब्ध!
होटल स्टाफ की ‘रक्षा कवच’ – नियम और जवाब
ऐसे माहौल में होटल स्टाफ के लिए सबसे बड़ा सहारा है – नियमों से भरा बोर्ड और कड़े लेकिन विनम्र जवाब। एक स्टाफ सदस्य ने बताया कि उसने चैटजीपीटी से तुरंत जवाब बनवा लिए – जिसमें ‘जेंटल पेरेंटिंग’ की तर्ज पर, बड़ी शांति से याद दिलाया गया कि, “आपने चेक-इन करते समय नियमों पर हस्ताक्षर किए थे, कृपया उनका पालन करें।”
एक और दिलचस्प कमेंट में किसी ने लिखा – “कभी-कभी तो लगता है कि होटल स्टाफ का काम बच्चों की देखभाल से ज्यादा बड़ों को समझाना है!” बहुत हद तक यह भारतीय होटलों में भी लागू होता है – जहाँ बारातियों को शांत रखना किसी युद्ध से कम नहीं।
अंत में – होटल का अनुभव, सबक और हंसी
सारा मामला पढ़कर आप सोच रहे होंगे – “क्या होटल में बच्चों की टीमों को बुकिंग देना सही है?” सच्चाई यह है कि बच्चों से ज्यादा चुनौती उनके माता-पिता हैं। होटल स्टाफ को अक्सर ऐसे हालात का सामना करना पड़ता है, जिसमें उन्हें सख्ती और विनम्रता का संतुलन साधना पड़ता है।
अंत में, होटल के प्रबंधक ने मज़ाक में कहा – “अब अगले सीज़न के लिए तैयार रहें, क्योंकि अगली बार क्रिकेट या कबड्डी की टीम आ सकती है!” भारत में भी, होटल स्टाफ को शादी सीज़न या किसी बड़े खेल टूर्नामेंट में ऐसे ही अनुभवों का सामना करना पड़ता है।
तो अगली बार जब आप किसी होटल में जाएं, तो स्टाफ की मेहनत और उनकी चुनौतियों को जरूर याद रखें। और हाँ, अपने बच्चों और साथ आए बड़ों पर भी नजर रखें – नहीं तो अगला ब्लॉग आपकी कहानी पर भी बन सकता है!
क्या आपके साथ कभी होटल में ऐसा कोई मजेदार या अजीब अनुभव हुआ है? कमेंट में जरूर साझा करें!
मूल रेडिट पोस्ट: And a new season begins!!!!