विषय पर बढ़ें

साहब, ये होटल है, चिटिंग का अड्डा नहीं! – होटल रिसेप्शन की सच्ची-कड़वी दास्तान

एक एनीमे-शैली का चित्रण जिसमें एक होटल लॉबी दिखाई दे रही है, जिसमें एक कन्फ्यूज़्ड मेहमान और एक सख्त रिसेप्शनिस्ट हैं।
इस जीवंत एनीमे दृश्य में, हम एक हैरान मेहमान को गंभीर होटल रिसेप्शनिस्ट का सामना करते हुए देख रहे हैं, जो एक प्रतिष्ठित होटल में गड़बड़ी की हास्यपूर्ण स्थिति को पूरी तरह से कैद करता है। मेरे पहले काम की इस अविस्मरणीय अनुभव की कहानी में डूबिए!

अगर आपको लगता है कि होटल में रिसेप्शन की नौकरी सिर्फ मुस्कुराकर चाबी पकड़ाने की है, तो जनाब, आप बड़ी गलतफहमी में हैं! असली मज़ा तो तब आता है जब आपको अपने ही लोगों को, मतलब कर्मचारियों के रिश्तेदारों और दोस्तों को, होटल की छूट (discount) दिलाने के नाम पर Sherlock Holmes बनना पड़े। आज मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ एक ऐसी घटना, जिसने मेरी नौकरी के शुरुआती दिनों में मुझे ‘CID’ की फीलिंग दिला दी थी।

होटल में छूट का फॉर्म – छूट या चोर दरवाज़ा?

तो बात कुछ यूँ है कि हमारे होटल में कर्मचारियों और उनके जान-पहचान वालों के लिए स्पेशल डिस्काउंट स्कीम चलती थी। सुनने में बड़ी अच्छी लगती है, है ना? लेकिन भाई, इस छूट को पाने के लिए इतना कड़ा वेरीफिकेशन था कि सरकारी परीक्षा भी इससे आसान लगने लगे!

सबसे पहले तो एक फॉर्म भरना पड़ता, जिसमें साफ-साफ लिखा होता कि किस कैटेगरी में कितनी छूट मिलेगी – कर्मचारी, उनके बिलकुल करीबी (जैसे बीवी, बच्चे), और फिर दोस्त या दूर के रिश्तेदार। कर्मचारी और उनके करीबी को ज्यादा छूट, बाकी सबको कम।

अब इस फॉर्म के साथ पहचान-पत्र (ID), फॉर्म का प्रिंटआउट, कंप्यूटर से वेरीफिकेशन का स्क्रीनशॉट, और खुद की सिग्नेचर – पूरा ‘पंचायत’ लगाना पड़ता था! और अगर कोई गलती हो गई, तो मैनेजर तो अलग, अकाउंट्स वाले भी सर पर चढ़ जाते! यानि रिसेप्शन पर बैठे-बैठे हम खुद को नीरज चोपड़ा समझने लगते थे – कभी-कभी ऐसा फॉर्म फेंकने का मन करता!

“भैया, ये कौन सा नया कानून है?” – मेहमानों की नाक में दम

अब जो असली तमाशा होता, वो था चेक-इन के वक्त! लोग आते, फॉर्म अधूरा या फोटोशॉप से नाम बदलकर, और फिर बहस शुरू – “अरे हमें तो पहले कभी ये नहीं पूछा गया!”, “दूसरे होटल में तो सिर्फ हँसते हुए रूम दे दिया था!” वगैरह वगैरह। एक बार तो एक साहब बोले, “ये सब स्कैम है क्या? मैं सुपर-डुपर एलीट हूँ, मुझे आईडी क्यों देनी पड़ेगी? अगर मेरा नाम किसी गलत काम में आ गया तो?”

मतलब, गज़ब का भरोसा है! जैसे होटल रिसेप्शन कोई चिटिंग गैंग हो! हमने समझाने की कोशिश की – “साहब, ये होटल की नीति है। पहचान-पत्र का मिलान करना ज़रूरी है, और महीने के अंत में सारे डॉक्यूमेंट्स नष्ट भी कर दिए जाते हैं।” लेकिन साहब तो अड़े रहे। आखिरकार, हमारे एक सहयोगी ने मैनेजर से बात करवाई, तब जाकर उनकी आईडी की कॉपी ली गई।

अगली सुबह जब ये साहब चेक-आउट करने आए, तो मुस्कुराते हुए नीचे आए लेकिन मुझे देखकर ऐसे घूरा, जैसे मैंने उनका पर्स चुरा लिया हो! भाई, दिल पर लग गई बात!

होटलवाले भी इंसान हैं, भगवान नहीं!

इस सब में सबसे मज़ेदार बात ये थी कि अक्सर वही लोग, जो डिस्काउंट के चक्कर में झगड़ते थे, फॉर्म ठीक से भरने तक की जहमत नहीं उठाते थे। एक बार हमारे एक साथी ने तंग आकर कह दिया – “भैया, अगर फॉर्म प्रिंट नहीं कर सकते तो बिज़नेस सेंटर से निकाल लो, वरना छूट नहीं मिलेगी।” जवाब आया, “ईमेल से भेज दूँ क्या?” अरे भाई, नियम तो नियम है!

एक कमेंट में किसी ने बड़ी सही बात कही – “जैसे-जैसे छूट कम होती है, वैसे-वैसे मेहमानों का स्तर भी नीचे जाता है।” सही बात है! कुछ लोग तो परिवार के नाम पर दो-दो कमरे बुक कर लेते, जबकि नियम था – कर्मचारी को दो कमरे, करीबी को एक, और बाकी को जितने मर्जी, लेकिन अलग रेट पर। फॉर्म में हेर-फेर, फोटोशॉप से नाम बदलना, एक्सपायर फॉर्म – हर तरह की जुगाड़ देखी है हमने! और जब पकड़ में आ जाएँ, तो बहस – “हम तो इतने होटल में रुक चुके, कहीं कोई दिक्कत नहीं हुई!”

पहचान-पत्र की कॉपी – कानून, सुरक्षा और भरोसा

अब सबसे बड़ा झगड़ा होता आईडी की कॉपी पर। कुछ कहते, “आईडी की कॉपी लेना गैरकानूनी है।” सच भी है – सरकारी आईडी (जैसे पासपोर्ट, मिलिट्री कार्ड) की कॉपी बनाना मना है, लेकिन ड्राइविंग लाइसेंस वगैरह ली जा सकती है।

एक पाठक ने कहा – “मुझे आईडी दिखाने में कोई दिक्कत नहीं, पर कॉपी बनाना कुछ हद तक ठीक नहीं लगता। होटल को ज़रूरी है, पर क्रेडिट कार्ड की कॉपी कोई क्यों देगा?” तो ये डील दोतरफा है – होटलवाले सुरक्षा के लिए कॉपी रखते हैं, और गेस्ट भरोसे के लिए आईडी दिखाते हैं।

कुछ लोग तो रिसेप्शनिस्ट पर ही शक करते हैं – “क्या पता आप ही कोई गड़बड़ कर दें!” अरे भाई, हम तो न्यूनतम वेतन पर काम कर रहे हैं, आपका कार्ड क्लोन करने का रिस्क क्यों लें? जैसे एक अनुभवी होटल कर्मचारी ने कमेंट किया – “हमें तो नौकरी की ज़्यादा चिंता है, आपके कार्ड का रिस्क उठाने से!”

निष्कर्ष – नियम सबके लिए, बहस किसी के लिए नहीं

सच कहें, तो होटल का रिसेप्शन कोई अदालत नहीं, लेकिन नियम सबके लिए एक जैसे हैं। बहस करने से न आपकी छूट बढ़ेगी, न रिसेप्शनिस्ट की तनख्वाह! अगर नियम पसंद नहीं, तो दूसरा होटल चुनिए – हम भी चैन से सांस ले लेंगे!

होटल की असली कहानी वही जानता है, जो वहाँ काम करता है। तो अगली बार जब आप डिस्काउंट लेने जाएँ, तो फॉर्म और आईडी संभालकर ले जाइए – वरना रिसेप्शन पर आपकी भी ‘सीआईडी’ हो सकती है!

क्या आपके साथ कभी ऐसी अजीब स्थिति हुई है? कमेंट में ज़रूर बताइए! और अगर होटल की दुनिया की और मजेदार कहानियाँ पढ़ना चाहते हैं, तो जुड़े रहिए हमारे साथ।


मूल रेडिट पोस्ट: Sir, This Is a Reputable Hotel, Not a Scam Ring