साहब या मैडम? होटल रिसेप्शन पर ऐसी गलती हो जाए तो क्या हो!
कभी-कभी छोटी सी गलती भी बड़ी मुसीबत बन जाती है, वो भी जब आप किसी होटल के रिसेप्शन पर हों! सोचिए, फोन पर किसी को 'मैडम' कह दिया, और सामने वाला 'साहब' निकला—या फिर 'साहब' कह दिया और वे 'मैडम' थीं। इसीलिए कहते हैं, जुबान संभलकर चलाओ, खासकर जब रोज़ नए-नए लोग मिलते हों।
आज हम इसी मजेदार और थोड़ी सी शर्मिंदगी भरी कहानी की बात करेंगे, जिसमें होटल रिसेप्शनिस्ट की जिंदगी के कुछ दिलचस्प पल छुपे हैं। साथ ही, Reddit कम्युनिटी के लोगों की भी प्रतिक्रियाएं जानेंगे, जो खुद अपने-अपने अनुभवों के साथ इस चर्चा में शामिल हुए।
होटल की रिसेप्शन—जहाँ 'साहब-मैडम' का खेल चलता रहता है
होटल, चाहे बड़ा हो या छोटा, रिसेप्शन पर हर तरह के मेहमान आते हैं। कभी-कभी उनकी आवाज़ या अंदाज़ से सही पहचान करना मुश्किल हो जाता है। एक सज्जन रिसेप्शनिस्ट को याद है कि उन्होंने एक 'साहब' को 'मैडम' कह दिया, और मजे की बात यह कि वह साहब हँस पड़े। लेकिन जब गलती से एक महिला को 'साहब' कह दिया, तो उन्होंने नौकरी छीनने की धमकी दे दी! अब भला, ऐसी स्थिति में कौन फंसे?
हमारे यहाँ भी अक्सर ऐसा होता है—कई बार फोन पर या किसी से बिना देखे बात करते हुए हम सामने वाले के बारे में अंदाज़ा लगा लेते हैं कि वो पुरुष हैं या महिला, और फिर वही 'साहब' या 'मैडम' वाला चक्कर! रिसेप्शनिस्ट ने तो तय कर लिया कि अब वो कभी किसी को 'साहब', 'मैडम', 'श्रीमान', 'श्रीमती', कुछ भी नहीं कहेंगे—नाम से ही बुलाएंगे या फिर "जी नमस्ते, आपकी क्या सेवा करूं?" जैसा तटस्थ तरीका अपनाएंगे। एक यूज़र ने मज़े में लिखा—"भैया, हिंदी में तो 'आप' है ही, जो सबके लिए चलता है!"
बाथरूम की जंग: दादी अम्मा बन गईं कानून की किताब
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। एक दिन एक दादी अम्मा रिसेप्शन पर आकर बवाल करने लगीं कि होटल के लॉबी में सिर्फ एक ही बाथरूम क्यों है? अब भला, छोटे शहर के पुराने होटल में, जो 1990 के दशक में बना हो, वहां भला कितने बाथरूम होंगे? दादी अम्मा ने तो ADA और equality जैसे कानूनों की भी दुहाई दे डाली। रिसेप्शनिस्ट मन ही मन सोच रहे थे—"दादी, आप 9 घंटे पोकोनोस से गाड़ी चला के यहाँ समुंदर देखने आईं हैं या बाथरूम गिनने?"
यहाँ एक कमेंट बहुत मजेदार था—"पक्का दादी को लंबा सफर करके 'मर्दाना' टॉयलेट चाहिए था!" अब भला, हमारे यहाँ तो गांव-कस्बों में बस स्टैंड के बाथरूम का हाल देखिए, कौन कानून, कौन व्यवस्था! फिर भी रिसेप्शनिस्ट ने धैर्य रखा और दादी को याद दिलाया कि उनके कमरे में तो प्राइवेट बाथरूम है।
'मेड' या 'हाउसकीपर'? भाषा में भी सम्मान छुपा है
हमारी हिंदी में 'झाड़ू-पोंछा' करने वाली महिला को अक्सर 'मेड' या 'कामवाली' कह दिया जाता है, जो सही नहीं है। रिसेप्शनिस्ट को यह बात बहुत अखरती थी कि लोग हाउसकीपिंग स्टाफ को 'मेड' बुलाते हैं। उन्होंने एक मिसाल दी—"मेरी सबसे अच्छी हाउसकीपर एक पुरुष थे, लेकिन किसी ने उन्हें 'बटलर' नहीं कहा।" एक कमेंट में किसी ने लिखा, "बटलर का तो काम ही अलग है, लेकिन सम्मान देना सबका हक है।"
हमारे समाज में भी भाषा के ज़रिए ही सम्मान या असम्मान झलकता है। सोचिए, अगर किसी को बार-बार "ओ मेड!" या "ओ कामवाली!" कहके बुलाया जाए, तो कैसा लगेगा? बेहतर है 'हाउसकीपर' या 'सफाईकर्मी' कहा जाए, जिससे उनका काम और मेहनत सम्मानित हो। एक अन्य कमेंट था—"अब समय है कि हम सबको बिना जेंडर की पहचान के, सम्मान के साथ बुलाएं।"
संबोधन की उलझन: 'आप' है सबसे बड़ा सहारा!
Reddit पर इस पोस्ट के बाद एक बहस छिड़ गई—क्यों अंग्रेज़ी में सम्मान सूचक शब्द 'साहब/मैडम' जेंडर के हिसाब से होते हैं, जबकि गाली-गलौज में ऐसा नहीं? एक यूज़र ने मजाक में लिखा, "'डियर डम्बास' तो सबके लिए चलता है!"
यहाँ हिंदी की खूबसूरती देखिए—हमारे पास 'आप' जैसा शब्द है, जो न तो मर्द देखता है न औरत, न उम्र, न ओहदा। चाहे बॉस हो या ग्राहक, सबको 'आप' कह सकते हैं। एक कमेंट में कहा गया—"नाम से बुलाओ, या फिर तीसरे व्यक्ति में बात करो, eccentric लगोगे लेकिन गलती नहीं होगी!"
और अगर शक हो, तो नया जमाना है—"नमस्ते मित्रो, आपसे कैसे मदद करूँ?" या फिर "भाइयों-बहनों और अन्य साथियों, स्वागत है!" वैसे भी, आजकल तो 'माननीय', 'महोदय', 'महोदया' जैसे शब्द भी चलन में हैं जो थोड़ा तटस्थ हैं।
निष्कर्ष: होटल में भी गलती इंसान से ही होती है
तो जनाब, होटल रिसेप्शन हो या कोई भी दफ्तर, गलती तो सबसे होती है। कभी-कभी सामने वाला हँस देता है, कभी गुस्सा कर बैठता है। लेकिन याद रखिए, भाषा में विनम्रता और सम्मान सबसे बड़ी बात है। 'साहब' या 'मैडम' से ज्यादा जरूरी है सामने वाले की पहचान और भावनाओं की कद्र करना।
अब आप बताइए—क्या कभी आपसे भी ऐसी कोई मजेदार या शर्मनाक गलती हो गई? या किसी ने आपको गलत संबोधित किया हो? कमेंट में जरूर शेयर करें! और हाँ, अगली बार होटल जाएं, तो रिसेप्शनिस्ट से मुस्कुराकर बात करें—शायद उसी मुस्कान में कोई नई कहानी बन जाए।
मूल रेडिट पोस्ट: Pronouns and similar random memories