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साहब, आप सोफे पर नहीं सो सकते… क्योंकि सोफा है ही नहीं!

एक्वा रूम में निजी गर्म खनिज स्नान, हमारी संपत्ति की अद्वितीय विशेषता जो आपको पूर्ण विश्राम का अनुभव कराएगी।
एक्वा रूम में लक्ज़़त में डूब जाएं, जहाँ आपका निजी गर्म खनिज स्नान आपका इंतज़ार कर रहा है। यह फ़ोटो-यथार्थवादी चित्र शांति और विश्राम का सार प्रस्तुत करता है, जो रोज़मर्रा के तनाव से भागने का एकदम सही तरीका है। जानिए हमारे मेहमान इस अनन्य अनुभव की कितनी तारीफ़ करते हैं!

हमारे देश में होटल बुकिंग का अनुभव वैसे ही किसी शादी के कार्ड की तरह होता है—सुंदर, रंगीन, पर अंदर से उलझनों भरा! अब सोचिए, अगर किसी होटल का एक कमरा पूरे इलाके में मशहूर हो, और हर कोई उसी के पीछे पड़ा हो, तो क्या हालात बनेंगे? आज की कहानी एक ऐसे ही ‘अक्वा रूम’ की है, जिसमें ना कोई सोफा है, ना जादू का दरवाजा, लेकिन उम्मीदें आसमान छूती हैं।

जब रूम का सपना, हकीकत से बड़ा हो जाए

होटल में एक ‘अक्वा रूम’ है, जिसमें प्राइवेट हॉट मिनरल टब है—मतलब घर बैठे ही स्पा का मजा! बाकी कमरे तो साधारण हैं, उनके लिए तो सबको बाहर कॉमन बाथ में ही जाना पड़ता है। अब जरा सोचिए, ऐसी खास जगह किसे नहीं चाहिए? यही वजह है कि ऑनलाइन बुकिंग साइट्स पर लोग अक्सर कन्फ्यूज हो जाते हैं। वहाँ कभी-कभी ऐसा दिखा दिया जाता है कि जैसे वो ‘अक्वा रूम’ ही बुक हो गया है, जबकि असलियत में कोई दूसरा साधारण कमरा बुक हो जाता है।

और फिर शुरू होता है बहस का सिलसिला—"भैया, मैंने तो यही रूम बुक किया था", "नहीं साहब, आपके पास तो ये वाला कमरा है"… मानो पटना से दिल्ली की ट्रेन में बैठकर मुंबई पहुँचने की उम्मीद कर रहे हों!

ग्राहक की जिद और होटलवाले की मजबूरी

अब आते हैं हमारे कहानी के हीरो की ओर—एक बुजुर्ग ग्राहक, जिनकी याददाश्त ग़ज़ब है, पर शायद होटल की वेबसाइट से भी ज़्यादा तेज़! साहब ने फोन किया—"भाई, मैं पहले भी रह चुका हूँ, मुझे वही ‘अक्वा रूम’ चाहिए लेकिन तीन लोगों के लिए और दो बिस्तर भी चाहिए।"

होटलवाले ने बड़े ही प्यार से समझाया, "साहब, ये रूम सिर्फ दो लोगों के लिए है और इसमें एक ही बिस्तर है।" साहब बोले—"कोई बात नहीं, मैं सोफे पर सो जाऊँगा।" होटलवाले ने सिर पकड़ लिया—"साहब, इसमें सोफा है ही नहीं!"

फिर भी साहब का जवाब—"मुझे तो वही चाहिए!" होटलवाले ने समझाया कि अगर तीन लोगों को रहना है, तो दो कमरे लेने पड़ेंगे, पर वो तो महंगा हो गया। साहब बार-बार ऑनलाइन वही कमरा उस रेट में दिखा रहे थे, जिसमें वो रहना चाहते थे। होटलवाले ने भी हिम्मत नहीं हारी, हर बार धैर्य से समझाते रहे—"साहब, जो आप इंटरनेट पर देख रहे हैं, वो नकली सपना है, हकीकत में वो रूम उस दाम में, तीन लोगों के लिए, उस सुविधा के साथ, उपलब्ध नहीं है।"

ऑनलाइन बुकिंग का ‘जादू’ और ग्राहक का भरम

ऑनलाइन बुकिंग साइट्स का हाल तो ऐसा है जैसे पुराने ज़माने के जादूगर—दिखाते कुछ हैं, देते कुछ हैं! एक कमेंट करने वाले ने तो यहाँ तक कह दिया, "अगर दूसरी बार फोन आया होता, तो सीधा बोल देता—माफ़ कीजिए, रूम अभी-अभी बुक हो गया!" होटलवाले की हालत वैसी हो जाती है जैसे कोई दुकानदार बार-बार एक ही सवाल का जवाब देता रहे और ग्राहक बोले—"ये सब तो मुझे पहले ही चाहिए था, अब बुक करता हूँ।" (बाकायदा एक कमेंट में किसी ने अपने शहर के होटल का ऐसा ही किस्सा सुनाया!)

कुछ लोगों ने तो ये भी कहा कि ग्राहक अक्सर यही सोचते हैं कि होटलवाले को अपने ही होटल की सुविधाओं के बारे में कुछ नहीं पता—"भला हम क्यों झूठ बोलेंगे?" बड़ी सच्ची बात है—हमारे यहाँ भी तो दुकानदार से लेकर सरकारी बाबू तक सबको शक की नजर से देखा जाता है!

एक और मजेदार कमेंट था—"क्या आपको लगता है मैं ऑफिस के पीछे से कोई नया ‘अक्वा रूम’ निकाल लूँगा?" या फिर वो कहावत—"क्या मैं जादू की छड़ी घुमा दूँ?" यानि ग्राहक की उम्मीदें तो ऐसी हैं, जैसे होटलवाले के पास अलादीन का चिराग हो, जो मनचाहा रूम पैदा कर दे।

असलियत, उम्मीदें और भारतीय होटल संस्कृति

हमारे यहाँ होटल बुकिंग भी घर के रिश्तों जैसी है—सपने बड़े, रियलिटी छोटी! हर कोई चाहता है सबसे अच्छा, सबसे सस्ता और सबसे सुविधाजनक कमरा। पर साहब, हर होटल में ‘अक्वा रूम’ नहीं होता, और हर रूम में सोफा नहीं रखा जाता!

अक्सर लोग ऑनलाइन रेट देख-देखकर बहस करते हैं, पर उन्हें ये नहीं पता कि ऑनलाइन साइट्स की अपनी फीस होती है, और सीधे बुकिंग करने पर रेट कम भी हो सकता है। एक कमेंट में तो यही कहा गया—"साहब, आप जो रेट देख रहे हैं, वो सिर्फ दो लोगों के लिए है, तीन के लिए नहीं। और वो भी बिना मिनरल टब के!"

ऐसे में होटलवाले का धैर्य रखना भी किसी तपस्या से कम नहीं। ग्राहक की जिद्द हो या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की चतुराई, होटलवाले को तो हर किसी का सामना करना ही पड़ता है। और असली मजा तब आता है, जब ग्राहक चौथी बार भी वही सवाल पूछकर, आख़िरकार बुकिंग कर ही लेता है—"अरे भैया, यही तो मुझे जानना था!"

निष्कर्ष: आपकी होटल बुकिंग की कहानी क्या है?

तो अगली बार जब आप होटल में रूम बुक करें, ज़रा ध्यान से पढ़िए—कहीं आपके सपनों का ‘अक्वा रूम’ सिर्फ बुकिंग साइट की माया तो नहीं? और अगर होटलवाले बार-बार समझा रहे हैं, तो हो सकता है वो सच ही बोल रहे हों—आखिरकार, "होटलवाले भी इंसान हैं, जादूगर नहीं!"

क्या आपके साथ कभी ऐसा मजेदार किस्सा हुआ है? या किसी होटल में आपको भी अपनी उम्मीदों और हकीकत में फर्क देखने को मिला? नीचे कमेंट में ज़रूर साझा करें—शायद आपकी कहानी पर भी कभी कोई ब्लॉग लिख जाए!


मूल रेडिट पोस्ट: Sir, You Can’t Sleep on the Couch… There Is No Couch