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सास ने जबरन चर्च ले जाना चाहा, दामाद ने तर्क से दिया ज़बरदस्त जवाब

एक महिला धार्मिक कट्टरपंथी से बहस कर रही है, जो चर्च में जाने और विश्वासों पर परिवारिक संघर्ष को दर्शाता है।
इस फोटो-यथार्थवादी दृश्य में, एक महिला अपनी अत्यधिक धार्मिक सास के खिलाफ खड़ी है, जो भिन्न आस्थाओं के तनाव और पारिवारिक दबावों के बीच व्यक्तिगत विश्वासों की लड़ाई को दर्शाता है।

परिवारों में सास-बहू या सास-दामाद की नोकझोंक तो हर घर की कहानी है, लेकिन जब उसमें धर्म और ज़िद का तड़का लग जाए, तो बात अलग ही मज़ेदार हो जाती है। आज मैं आपको एक ऐसे ही दिलचस्प किस्से के बारे में बताने जा रहा हूँ, जिसमें एक सास अपने दामाद को ज़बरदस्ती अपने चर्च ले जाना चाहती थी, लेकिन दामाद ने जिस तर्क और होशियारी से जवाब दिया, वो सुनकर आप भी मुस्कुरा उठेंगे।

जब सास बनीं 'परिवार की धर्मगुरु'

अब सोचिए, आपने शादी की और आपकी सास जी अपनी धार्मिकता के लिए पूरे मोहल्ले में मशहूर हैं। मानिए, जैसे हमारे यहाँ कोई ताईजी या बुआजी होती हैं, जिनकी हर बात पत्थर की लकीर मानी जाती है। ऐसी ही थीं इस कहानी की सास – घर की खुद-घोषित धर्मगुरु, कट्टर धार्मिक, हर हफ्ते तीन-तीन बार चर्च जाना, और बाकायदा सबको साथ ले जाना उनका नियम।

हमारे दामाद जी की हालत वही थी, जैसे किसी हिंदी फिल्म के हीरो की – खुद की आस्था अलग, पत्नी की अलग, लेकिन दोनों का धर्म में उतना ज़्यादा विश्वास नहीं। फिर भी, सासू मां की जिद, "मेरे घर में रह रहे हो, तो चर्च चलना ही पड़ेगा। परिवार की इज़्ज़त का सवाल है!" अब बताइए, हमारे यहाँ भी तो अक्सर सुनने को मिलता है – "घर में आए हो, तो नियम मानने ही पड़ेंगे!"

दामाद का तर्क – "जैसा देश, वैसा भेष!"

दामाद ने एकदम देसी अंदाज़ में सोचा – 'आ बैल मुझे मार' क्यों करूँ? उन्होंने शांति बनाए रखने के लिए पहले तो ना-नुकुर की, लेकिन जब सासू मां टस से मस नहीं हुईं, तो दिमाग की बत्ती जल गई। बोले, "मांजी, आप बिल्कुल सही कह रही हैं। आपके घर में आपके नियम। लेकिन कल जब आप हमारे घर आएंगी, तो फिर आपको भी हमारे धर्म के अनुसार हमारे चर्च में आना पड़ेगा।"

बस, सासू मां के चेहरे का रंग उड़ गया। जैसे हमारे यहाँ कोई पंडित जी को मस्जिद बुला ले, या मौलवी साहब को मंदिर। दामाद की ये बात सुनकर बाकी घरवाले भी मुस्कुरा उठे। बावजूद इसके, सासू मां ने पहले तो बहाने बनाए, लेकिन दामाद जी ने कहा, "अभी सबके सामने, भगवान को साक्षी मानकर बोलिए – आप हमारे घर आएंगी, तो हमारे चर्च चलेंगी।" आखिरकार, सासू मां को मानना ही पड़ा – "ठीक है, तुम हमारे चर्च मत आओ।"

यहाँ एक पाठक की टिप्पणी याद आई – "घर में पोते-पोतियाँ हैं, तो सासू मां चाहें या न चाहें, जाना तो पड़ेगा ही!" यानी हमारे समाज में भी, दादी-नानी का बच्चों से मिलना सबसे बड़ा लालच होता है।

चर्च में 'पापों की स्वीकारोक्ति' – भारतीय नजरिए से

यहाँ एक मज़ेदार बात और है – उस चर्च में हर सदस्य को अपने 'पाप' सबके सामने स्वीकारने पड़ते थे। जैसे हमारे यहाँ कभी-कभी गाँव के चौपाल या समाज पंचायत में लोग अपने गुनाह कबूल करते हैं। एक आदमी ने वहाँ बताया कि उसकी पत्नी को सेक्स पसंद है, और बुज़ुर्गों ने उसे सलाह दी – "ऐसी औरत को छोड़ दो!" सोचिए, हमारे देश में अगर कोई पंचायत में ये बोले, तो पंचायत वाले भी भौचक्के रह जाएँ। एक पाठक ने चुटकी लेते हुए लिखा – "अगर मैं वहाँ होता, तो कह देता – मेरी बीवी को सेक्स बहुत पसंद है, और इसी लिए मैंने उससे शादी की!"

यहाँ एक और पाठक की बात काबिले-गौर है – "अगर दामाद चर्च में खड़े होकर कह देता – मैं 1 तीमुथियुस 2:12 के खिलाफ जाकर अपनी सासू मां को परिवार चलाने दे रहा हूँ, उसके लिए क्षमा चाहता हूँ – तो सासू मां की तो हालत ही खराब हो जाती!" हमारे यहाँ भी तो कई बार कोई ससुराल वाले तर्क के आगे चुप हो जाते हैं।

कट्टरता बनाम तर्क – धर्म की असल शिक्षा

इस कहानी का असली मज़ा यही है कि दामाद जी ने धार्मिक कट्टरता का जवाब तर्क और शांति से दिया। एक पाठक ने बहुत सही लिखा – "अक्सर धार्मिक लोग तर्क से डरते हैं, लेकिन दामाद जी ने सासू मां को उन्हीं के हथियार से मात दी।" खुद कहानी के लेखक ने भी कहा – "सासू मां कभी ये नहीं समझ पाईं कि किसी कैथोलिक स्कूल के पूर्व छात्र के साथ बाइबल पर बहस करने का अंजाम क्या होता है।"

एक और पाठक ने बड़ी सुंदर बात कही – "धर्म की असली सीख यही है – 'जैसा व्यवहार अपने लिए चाहते हो, वैसा दूसरों के साथ करो।' लेकिन लोग अक्सर अपने हिसाब से बाइबल या किसी भी धार्मिक ग्रंथ के हिस्से चुन लेते हैं, जो उन्हें दूसरों पर हुकूमत करने में मदद करे।"

निष्कर्ष – तर्क, प्यार और थोड़ी सी चतुराई

तो भाइयों-बहनों, परिवार में तकरार हो या धार्मिक मतभेद, अगर आप तर्क, प्यार और थोड़ा सा हास्य रखेंगे, तो बड़ी से बड़ी जिद भी पटरी पर आ सकती है। सास-बहू या सास-दामाद के रिश्तों में अक्सर अहं या परंपरा की दीवारें खड़ी हो जाती हैं, लेकिन सही समय पर सही तर्क और हल्की मुस्कान से आप माहौल हल्का बना सकते हैं।

अब आप बताएँ – क्या कभी आपके घर में भी ऐसी कोई धार्मिक जिद या परंपरा से जुड़ी अजीब घटना हुई है? आप ऐसे हालात में क्या करते? अपने अनुभव कमेंट में जरूर लिखें और इस कहानी को अपने दोस्तों-रिश्तेदारों के साथ शेयर करें। कौन जाने, किसी की सासू मां या मम्मीजी को भी थोड़ा 'तर्क का प्रसाद' मिल जाए!


मूल रेडिट पोस्ट: MIL tried to force me to attend their church services - I responded with logic instead