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सेल्फ-चेकआउट से नाराज़ ग्राहक और उसकी ‘आज़ादी’ की अनोखी लड़ाई

खुद-सेवा चैकआउट पर फंसे एक निराश आदमी का कार्टून 3डी चित्र, चारों ओर बिखरे सामान और अराजकता के साथ।
आइए मिलते हैं हमारे मजेदार खुद-सेवा चैकआउट विरोधी से, जो एक बिखराव से निपटते हुए हंसी-मजाक के पल में हैं, जबकि चारों ओर खुद-सेवा चैकआउट की आवाज़ें गूंज रही हैं। यह जीवंत कार्टून 3डी कला खुदरा जीवन की अराजकता को दर्शाती है, जो हंसी को एक व्यस्त दुकान में काम करने की रोजमर्रा की चुनौतियों के साथ जोड़ती है।

आजकल शॉपिंग करना जितना आसान हो गया है, उतना ही मनोरंजक भी। खासकर जब बात आती है उन ‘विशेष’ ग्राहकों की, जो अपने अनोखे तर्क और तामझाम के साथ दुकान में आते हैं। अगर आपने कभी किसी सुपरमार्केट या स्टोर में काम किया है, तो आप समझ सकते हैं कि ग्राहक सिर्फ सामान ही नहीं, कहानियाँ भी खरीदने-बेचने आते हैं। आज की कहानी एक ऐसे ही ग्राहक की है, जो सेल्फ-चेकआउट मशीन से ऐसे चिढ़े जैसे कोई दादी अपने पुराने तांबे के बर्तन छोड़ने को कह दे!

‘मेरी आज़ादी, मेरी मर्ज़ी!’ – ग्राहक का घोषणापत्र

सोचिए, आप एक छोटे से स्टोर में काम कर रहे हैं। आपकी कंपनी कंजूस है, इसलिए अक्सर आपको अलग-अलग काम करने पड़ते हैं – कभी कैशियर, कभी सफाईकर्मी, कभी काउंटर पर। आज ऐसे ही एक दिन, एक कर्मचारी (जिसे हम ‘विक्रेता’ कहेंगे) को एक गलियारे में गिरा सामान साफ़ करना पड़ा। तभी, करीब 40 साल के एक सज्जन दो डिब्बे लेकर काउंटर की ओर इशारा करते हैं कि जल्दी से बिल बना दीजिए।

विक्रेता सोचता है – “काउंटर खोलूंगा तो लंबी लाइन लग जाएगी, क्यों न सेल्फ-चेकआउट पर ही इनका बिल बना दूँ, वो भी खुद बना दूँ, इन्हें कुछ करना भी नहीं पड़ेगा।” लेकिन जनाब ग्राहक तो बिफर पड़े – “सेल्फ-चेकआउट बिलकुल नहीं! ये मेरी ‘फ्रीडम ऑफ चॉइस’ है, मैं तय करूंगा कैसे पेमेंट करूंगा।”

अब विक्रेता की जगह कोई भी भारतवासी होता, तो मन में यही सोचता – ‘भैया, इतना नाटक? दो डिब्बों के लिए?’ लेकिन बेचारा विक्रेता चुप रहा, बस मन ही मन ‘ज्यादा ड्रामेबाज़ी’ कहकर काउंटर पर बिल बना दिया।

ग्राहकों की ‘फ्रीडम’ – हकीकत या भ्रम?

यहाँ एक बहुत दिलचस्प बात निकलकर आती है – क्या वाकई ग्राहक की ‘चॉइस’ इतनी निरंकुश है? एक कमेंट में किसी ने बड़ी सटीक बात कही – “अगर मैन्युअल काउंटर बंद है और सेल्फ-चेकआउट ही खुला है, तो चॉइस है कहाँ?” कोई और जोड़ता है – “दुकान जो सुविधा दे रही है, वही है। चाहो तो खरीदो, नहीं तो बाहर का रास्ता खुला है।”

हमारे देश में भी ऐसे दृश्य आम हैं – कभी नोटबंदी के समय, कभी पेट्रोल पंप पर, कभी रेलवे टिकट काउंटर पर – ग्राहक को जो व्यवस्था मिले, उसी में तालमेल बैठाना पड़ता है। कई बार लगता है कि ‘जो है, वही है’। लेकिन फिर भी, कुछ ग्राहक अपनी ‘आजादी’ का झंडा लेकर खड़े हो जाते हैं, मानो दुकान उनके लिए ही खुली हो!

एक और टिप्पणी में तो मज़ेदार तंज़ था – “ये लोग ‘फ्रीडम ऑफ चॉइस’ के नाम पर अपने लिए खुद ही मुश्किल चुनते हैं।” कोई और बोला, “भैया, आपकी आज़ादी है, लेकिन दुकानदार के पास भी है – वो भी काम खत्म करके घर जा सकता है!”

तकनीक बनाम परंपरा – किसकी जीत?

कुछ ग्राहकों को सेल्फ-चेकआउट से इतनी चिढ़ है कि उनका तर्क सुनकर हँसी आ जाए – “अगर मुझे मशीन से बिल बनाना है, तो दुकानवाले मुझे सैलरी क्यों नहीं देते?” एक कमेंट में लिखा – “सेल्फ-चेकआउट मेरी जिंदगी आसान करता है, मुझे किसी से बात नहीं करनी पड़ती।” कोई और कहता है – “आदमी खुद से गलती कम करता है, कैशियर तो कभी-कभी ऑर्डर ही गड़बड़ कर देते हैं!”

लेकिन परंपरा के पक्षधर भी कम नहीं। एक सज्जन ने कहा – “सेल्फ-चेकआउट के आने से युवाओं के लिए नौकरी के मौके घट गए हैं। दुकानें कहती हैं कि इससे सस्ता हो जाएगा, लेकिन कभी हुआ क्या?” कोई और बोला – “पहले टेलीफोन ऑपरेटर थे, फिर ATM आया, अब कैशियर भी मशीन बन गए। कल को हम खुद ही सब करेंगे, नौकरी किसे मिलेगी?”

हमारे भारतीय संदर्भ में भी देखा जाए, तो तकनीक और परंपरा की यह जंग हर जगह चलती है – चाहे वह ऑनलाइन शॉपिंग हो, डिजिटल पेमेंट या फिर रेलवे टिकट का रिजर्वेशन। कोई कहता है, “मुझे तो काउंटर से टिकट चाहिए, मशीन पर भरोसा नहीं,” तो कोई कहता है, “फोन पर कर लिया, लाइन में क्यों लगूं?”

दुकानदारों की दुविधा और ग्राहकों का ड्रामा

असल में, दुकानदार की भी अपनी मजबूरियाँ हैं। कभी स्टाफ कम है, कभी सुरक्षा का मसला। एक कमेंट में किसी ने बिल्कुल भारतीय अंदाज़ में कहा – “अगर कोई सामान गिरा है, तो पहले सफाई ज़रूरी है, ग्राहक बाद में। सुरक्षा पहले, फिर सुविधा।”

कई बार ग्राहक का ड्रामा सिर्फ उसका ‘मुख्य पात्र’ बनने का शौक होता है – “मेरी आज़ादी, मेरी मर्ज़ी!” लेकिन दुकान चलाने वाले को हर किसी की मर्जी के हिसाब से व्यवस्था बदलनी पड़े, तो क्या दुकान चलेगी? एक और टिप्पणी – “अगर सेल्फ-चेकआउट ही खुला है, तो यहीं से बिल बनेगा, नहीं पसंद तो अगले हफ्ते आइए!”

भारतीय दुकानों में भी यह दृश्य आम है – कई बार ग्राहक चिल्लाता है, “भैया, लाइन लगा दो!” लेकिन दुकानदार व्यस्त है, तो इंतजार करना ही पड़ता है, चाहे टिकट काउंटर हो या राशन की दुकान।

निष्कर्ष – ‘आजादी’ और ‘समझदारी’ का संतुलन

कहानी का सार यही है – हर ग्राहक को अपनी पसंद है, लेकिन हर दुकान की भी अपनी व्यवस्था है। तकनीक आई है तो उसका मकसद सहूलियत बढ़ाना है, न कि दुकानदार या ग्राहक को परेशान करना। बेशक, कभी-कभी मशीनें गड़बड़ करती हैं, कभी इंसान। लेकिन हमेशा सब अपने-अपने रोल में बेस्ट देने की कोशिश करते हैं।

तो अगली बार जब आप किसी दुकान में जाएं और सेल्फ-चेकआउट या नई व्यवस्था से सामना हो, तो सोचिए – क्या वाकई इतना बड़ा मुद्दा है या हम भी उस ग्राहक की तरह ‘आजादी’ के नाम पर थोड़ा ज्यादा ड्रामा कर रहे हैं?

आपका क्या अनुभव है – क्या आप सेल्फ-चेकआउट पसंद करते हैं या इंसान से बात करना? नीचे कमेंट में जरूर बताइएगा, और अगर मज़ेदार किस्सा हो तो शेयर करें – क्योंकि असली मसाला तो इन्हीं कहानियों में है!


मूल रेडिट पोस्ट: Anti-selfcheckout guy who's just soooo over-the-top