सॉफ़्टवेयर की रिलीज़ की भागदौड़: जब फ्लॉपी डिस्क और अंतिम समय के बदलावों ने मचाया कोहराम
समय पर डिलीवरी, ग्राहकों की उम्मीदें और ऑफिस की भागदौड़ — इन तीनों का मेल हो जाए तो ऑफिस का माहौल किसी बॉलीवुड मसाला फिल्म जैसा हो जाता है। आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं एक ऐसे सॉफ्टवेयर इंजीनियर की दिलचस्प कहानी, जिसने पुराने फ्लॉपी डिस्क के जमाने में रिलीज़ शेड्यूल, अचानक बदलती ज़रूरतों, और ऑफिस की ‘जुगाड़’ संस्कृति का पूरा स्वाद चखा।
जरा सोचिए, जब एक सॉफ्टवेयर को दर्जनों फ्लॉपी डिस्कों में कस्टमाइज करके, हर क्लाइंट के हिसाब से पैक किया जाता था, और फिर अचानक आख़िरी मिनट में कोई नई शर्त आ जाए — तो क्या हाल होता होगा? चलिए, इसी दिलचस्प सफर पर चलते हैं...
फ्लॉपी डिस्क का ज़माना: मेहनत, पसीना और थोड़ी नींद
आजकल तो सारा सॉफ्टवेयर इंटरनेट से डाउनलोड हो जाता है, लेकिन 90 के दशक में, जब लोग ‘MS DOS’ और शुरुआती ‘Linux’ पर काम करते थे, तब सॉफ्टवेयर का पैकेज बनाना ही बड़ा काम था। हमारे नायक की कंपनी टेलीकॉम कंपनियों के लिए एक खास सॉफ्टवेयर बनाती थी, जिसे हर क्लाइंट के लिए अलग-अलग कस्टमाइज करना पड़ता था। सोचिए, 12 फ्लॉपी (5¼ इंच) या 6 फ्लॉपी (3½ इंच) में एक सॉफ्टवेयर पैक करना, हर डिस्क पर लेबल चिपकाना, और फिर सैकड़ों कॉपी बनाना — जैसे किसी शादी के कार्ड छपवाने की तैयारी हो!
ऑफिस में हर कोई किसी शादी वाले भाई की तरह जुटा था — “सली, ये रही डिस्क 3 की मास्टर कॉपी, 100 कॉपी बना दो”, “फ्रेड, तुम्हारे पास डिस्क 2 है, चलो लग जाओ।” बाद में एक ड्राइव ड्यूप्लिकेटर आ गया, जैसे बारात में हलवाई की जगह केटरर आ जाए — थोड़ी राहत!
आख़िरी मिनट का ट्विस्ट: “भैया, स्पेसिफिकेशन बदल गए हैं!”
किसी भी इंडस्ट्री में मीटिंग्स मशहूर होती हैं — और यहां भी इंडस्ट्री फोरम की बैठक ऐन उसी हफ्ते रखी गई, जब सॉफ्टवेयर रिलीज़ होने वाला था। हमारे इंजीनियर ने तो वीकेंड में ऑफिस में ही डेरा डाल दिया — डिस्क ड्यूप्लिकेट की, लेबल प्रिंट किए, CompUSA से नई डिस्क खरीदीं, और सोने के लिए सिर्फ एक सोफा था। सोमवार को पैकेज भेजकर सोचा, “अब तो घर जाकर आराम करूंगा।”
लेकिन किस्मत की मार देखिए, ऑफिस लौटते ही मैनेजर बोले — “जिन्हें कन्वेंशन पर भेजा था, वो जल्दी बात करना चाहते हैं।” मोबाइल फोन का तो जमाना नहीं था, सो इंतजार किया। जब बात हुई तो पता चला, “इंडस्ट्री में इमरजेंसी बदलाव हो गया है, दो फील्ड बदलने हैं, वरना बड़ी कंपनियां ऑर्डर एक्सेप्ट नहीं करेंगी।”
पांच मिनट में कोड बदला, एक घंटे में इन्क्रिमेंटल कम्पाइलिंग की, फिर से डिस्कों में पैकिंग, लेबलिंग, और CompUSA से और डिस्क लाना। पुराने पैकेज तो वैसे ही रद्दी हो गए।
न खत्म होने वाली चेंज्स की कतार: “अभी और भी है...”
मंगलवार को जैसे-तैसे टीम के साथ नई डिस्क पैक कीं, तभी फिर फ़ोन — “भैया, एक और बदलाव!” इस बार शर्त इतनी पेचीदा थी, जैसे शादी में हलवाई बदल गया हो और मेन्यू बदलते ही सबको फिर से काम पर लगा दो।
कमेंट सेक्शन में एक यूज़र ने तो बड़े मज़ेदार अंदाज में कहा — “डेडलाइन निकल गई है, अब क्या हमें पूरी स्पेसिफिकेशन मिल सकती है?” ये दर्द तो हर आईटी वाले ने कभी न कभी महसूस किया है। जैसा कि एक दूसरे यूज़र ने जोड़ा, “इंजीनियरिंग टीम तो हमेशा आख़िरी वक्त तक सब कुछ लटकाए रखती है, फिर अचानक हमसे कहती है कि सब छोड़ो, बस यही काम करो।” ऐसा लगता है जैसे भारतीय दफ्तरों में ‘जुगाड़’ के अलावा और कोई नीति ही नहीं!
आखिरकार राहत... और फिर वो आख़िरी झटका!
बुधवार को बॉस ने फैसला किया — “शिपिंग रोक दो, गुरुवार को भेजेंगे।” लेकिन गुरुवार आते-आते नए सरकारी नियम आ गए, टीम में सबको प्रोडक्शन लाइन में खड़ा किया, पड़ोसी डिपार्टमेंट वालों को भी बुला लिया, और दो एक्सपर्ट डेवलपर्स को कस्टमाइजेशन सौंप दिया। किसी ने बाहर से थाई फूड मंगाया, ताकि एनर्जी बनी रहे — जैसे परीक्षा के समय मैगी और चाय का सहारा!
शुक्रवार को तो जैसे फोन की बाढ़ आ गई — “डिस्क कब आएगी?” कुछ फ्लॉपी में राइट एरर भी थी, पर जैसे भारतीय दूल्हे के जूतों का जुगाड़ हो जाता है, वैसे ही क्लाइंट्स के पास बैकअप था।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। शुक्रवार शाम को वही कंपनी जिसने बदलाव करवाए थे, बोली — “हम तो अपनी रिलीज़ विंडो मिस कर गए, अभी दो हफ्ते तक पुरानी स्पेसिफिकेशन पर ही ऑर्डर स्वीकारेंगे!” अब फिर से सबको फोन — “भाई, दो हफ्ते तक नया सॉफ्टवेयर मत चलाना, पुराना ही यूज़ करना।”
सीख: रिलीज़ से पहले स्पेसिफिकेशन फाइनल कर लो, वरना...
आख़िरकार, कंपनी ने 5¼ इंच फ्लॉपी को अलविदा कह दिया और सीडी पर शिफ्ट हो गए। सबने राहत की सांस ली — जैसे शादी के बाद बारातियों को फ्री में मिठाई मिल जाए!
इस कहानी से यही सीख मिलती है — “जब तक ग्राहक की ज़रूरतें पूरी तरह फाइनल न हों, रिलीज़ की तारीख मत तय करो।” वरना सॉफ्टवेयर रिलीज़ की भागदौड़, शादी के हलवाई की तरह, आख़िरी मिनट तक बदलती ही रहेगी!
आपके ऑफिस में भी ऐसे दिलचस्प किस्से हुए हैं? अपनी कहानी नीचे कमेंट में ज़रूर साझा करें — हो सकता है अगली बार आपकी कहानी पर ब्लॉग लिखें!
मूल रेडिट पोस्ट: Shipping Woes- Don't schedule releases if your requirements are not final.