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सेना की ट्रेनिंग में जब अफसर की अकड़ पर भारी पड़ा कोयला खदान का जवान

1960 के दशक के अनुभवी नेता सार्जेंट फ्रेंच के साथ प्रशिक्षण ले रहे सैनिक।
1960 के दशक की सेना के प्रशिक्षण का सिनेमाई अनुभव, जिसमें सार्जेंट फ्रेंच, अपने सैनिकों के बीच सम्मान और शक्ति का प्रतीक हैं। मेरे परदादा के पहले हफ्ते की यह कहानी नेतृत्व और भाईचारे की गतिशीलता को उजागर करती है।

सेना की ट्रेनिंग में अनुशासन और डर, दोनों का स्तर अलग ही होता है। लेकिन क्या हो जब अफसर की अकड़ के सामने किसी जवान की देहाती हिम्मत खड़ी हो जाए? आज की कहानी में आपको मिलेगा सेना की ट्रेनिंग का एक ऐसा वाकया, जिसमें एक अफसर की घमंड की हवा एक कोयला खदान के मजदूर ने निकाल दी।

दो तरह के अफसर: सम्मान कमाने वाले और सम्मान मांगने वाले

सेना में अक्सर दो किस्म के अफसर मिलते हैं – एक वो जो अपने व्यवहार और नेतृत्व से सम्मान कमाते हैं, और दूसरे वो, जो सिर्फ अपनी वर्दी और रैंक दिखाकर सम्मान की उम्मीद रखते हैं। कहानी के मुताबिक, 1960 के दशक में इंग्लैंड में सेना की ट्रेनिंग के पहले हफ्ते में ही नए जवानों को इन दोनों तरह के अफसरों का सामना करना पड़ा।

पहले थे सार्जेंट फ्रेंच – भारी-भरकम कद-काठी वाले, जिनकी आवाज़ ऐसी कि दीवारें हिल जाएं। वो थोड़े सनकी भी थे, जैसे अगर किसी जवान का बिस्तर उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा, तो चादरें खिड़की से बाहर फेंक देते। उनकी बातों से डर तो लगता, लेकिन उनका डर सम्मान में बदल जाता था, क्योंकि वो खुद भी मैदान में सबसे आगे रहते।

घमंड का टकराव: जब नया अफसर बना मजाक

अब आते हैं दूसरे तरह के अफसरों पर – जो सिर्फ रैंक और पद का रौब झाड़ते हैं। यहीं पर एंट्री होती है सार्जेंट हैवर्थ की। उन्होंने सुना कि सार्जेंट फ्रेंच ने कैसे नए भर्ती जवानों को ‘अगर किसी को आपत्ति हो तो पीछे जाकर मर्दों की तरह निपटा लेंगे’ वाली चुनौती दी थी, और किसी की हिम्मत नहीं हुई थी सामने आने की।

सार्जेंट हैवर्थ ने भी सोचा कि वो यही तरीका अपनाएंगे, और उन्हीं की नकल करते हुए जवानों के सामने वही डायलॉग मार दिया – “अगर किसी को मेरी बात से दिक्कत है तो अपनी रैंक, मेडल सब उतारकर पीछे चलो, मर्दों की तरह निपटेंगे!” उन्हें पूरा भरोसा था कि सब डर जाएंगे और उनका सम्मान और बढ़ जाएगा।

पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

असली हीरो की एंट्री: कोयला खदान वाला ‘जायंट’

जैसे ही सार्जेंट हैवर्थ ने चुनौती दी, एक छह फुट लंबा, भारी-भरकम शरीर वाला, कोयला खदान का पूर्व मजदूर सामने आ गया – बिलकुल हिंदी फिल्मों के देहाती पहलवान की तरह! उसने हाथ उठाकर कहा, “साहब, चलिए, मर्दों की तरह निपटा लेते हैं।”

इतना सुनते ही सार्जेंट हैवर्थ की हालत पतली हो गई। तुरंत बहाना बनाकर, पूरे दस्ते को छुट्टी दे दी और खुद चुपचाप खिसक लिए। बाकी जवानों के चेहरों पर मुस्कान थी – आखिरकार घमंड का सिर नीचा हो गया था।

कम्युनिटी की मज़ेदार प्रतिक्रिया: “मुंह से बड़े वादे, हाथ से छोटी हिम्मत!”

रेडिट पर इस कहानी पर खूब चर्चा हुई। एक पाठक ने लिखा, “कभी-कभी लोग ऐसे दावे कर बैठते हैं, जिन्हें खुद निभा नहीं सकते!” एक ने तो देसी तंज कसते हुए कहा, “मुंह से बड़े वादे, हाथ से छोटी हिम्मत!” – ये कहावत तो हर गांव-कसबे में सुनने को मिलती है।

कुछ ने इस पर हँसी मजाक भी किया – जैसे एक ने लिखा, “छह फुट का मजदूर तो हमारे मोहल्ले में भी कई घूमते हैं, बस अफसरों के सामने वैसे खड़े हो जाएं तो सबका रुतबा हवा हो जाए!”

एक और मज़ेदार टिप्पणी थी, “सेना में असली अफसर वो है, जो डांटता भी है और खुद आगे भी रहता है; बाकी तो सिर्फ रैंक दिखाने वाले हैं।”

कुछ पाठकों ने ये भी स्पष्ट किया कि सार्जेंट असल में अफसर (Officer) नहीं, बल्कि नॉन-कमीशंड ऑफिसर (NCO) होते हैं – हमारे यहां भी हवलदार या सूबेदार इसी तरह माने जाते हैं।

निष्कर्ष: सम्मान दिल से, डर सिर्फ दिखावे का

इस कहानी से एक सीधी सीख है – असली सम्मान जबरदस्ती नहीं मिलता, उसे कमाना पड़ता है। चाहे सेना हो या कोई भी दफ्तर, रौब-दाब से लोग बस डरते हैं, दिल से नहीं मानते। और जब किसी देसी जिगर वाले इंसान की हिम्मत सामने आ जाए, तो बड़े से बड़ा घमंडी भी पानी मांगने लगता है।

तो अगली बार जब कोई अफसर या बॉस अपने ओहदे का रौब डाले, तो याद रखिए – असली ताकत इज्जत कमाने में है, न कि दिखावे में।

क्या आपके साथ भी कभी ऐसा किस्सा हुआ है, जब किसी घमंडी का घमंड उतरते देखा हो? कमेंट में जरूर बताइए और कहानी पसंद आई हो तो शेयर करना न भूलें!


मूल रेडिट पोस्ट: You want soldiers to fight you? Ok