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स्कूल के नियमों का खेल: जब प्रिंसिपल खुद फँस गए अपनी चाल में

ट्रैक्टर पर आते छात्रों के साथ एक ग्रामीण स्कूल का दृश्य, 2000 के छोटे शहर का अहसास।
इस फोटोरियलिस्टिक छवि में, छात्र स्कूल में देशी जीवन की आत्मा लाते हैं, 2000 में छोटे शहर की शिक्षा की अनोखी खासियत को दर्शाते हुए।

स्कूल के दिन वैसे तो हर किसी के लिए यादगार होते हैं, लेकिन कभी-कभी वहाँ ऐसे किस्से भी घट जाते हैं जो उम्रभर हँसी-ठिठोली और सीख दोनों दे जाते हैं। सोचिए, अगर आपके स्कूल में कोई नया प्रिंसिपल आए, और आते ही अजीब-अजीब फरमान सुनाने लगे—तो आप क्या करेंगे? आज हम ऐसी ही एक अनोखी घटना की बात कर रहे हैं, जिसमें छात्रों ने अपने नए प्रिंसिपल को उन्हीं के नियम-कायदों में उलझाकर ऐसा सबक सिखाया कि वो खुद ही अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर चल दिए!

गाँव का स्कूल, नए प्रिंसिपल की धमक और विद्रोही छात्र

यह किस्सा है साल 2000 का। अमेरिका के एक छोटे से गाँव का स्कूल, जहाँ बच्चे ट्रैक्टर पर स्कूल आते, जेब में छोटी कटार (पॉकेट नाइफ) रखते, और देसी गंवई अंदाज में जींस और बटन-डाउन शर्ट पहनते थे। अब ऐसे माहौल में अगर कोई बड़ा शहर—डैलस जैसे मेट्रो सिटी—से आया प्रिंसिपल अचानक स्कूल का मुखिया बन जाए, तो संस्कृति का टकराव तो होना ही था।

हमारे कहानी के हीरो—कुछ किशोर—उस भीड़ में अलग ही रंग के थे। वे 'एमो' और 'गॉथ' स्टाइल में रहते, काले कपड़े, चैन वाली पैंट, और लम्बे ट्रेंच कोट पहनते थे। स्कूल में एकदम अलग दिखते थे, यानी एकदम 'अपने टशन में'!

जैसे ही नए प्रिंसिपल साहब आए, सबसे पहले फरमान निकाला—"कोई पॉकेट नाइफ नहीं चलेगा"। गाँव के बच्चे बोले, "ठीक है, कोई बात नहीं!" लेकिन असली खेल तो यहीं से शुरू हुआ।

धर्म, गहने और 'मैजिक: द गैदरिंग' का विवाद

प्रिंसिपल की नजर जल्दी ही गॉथ बच्चों पर टिक गई। उन्होंने देखा, ये बच्चे अलग तरह के गहने पहनते हैं—जैसे पेंटाकल, जिसे वे 'शैतानी चिन्ह' समझ बैठे। बस, तुरंत आदेश आ गया—"कोई 'शैतानवादी' गहना नहीं चलेगा!"

अब भैया, ये बच्चे भी कम नहीं थे! असल में ये सब पढ़ाकू टाइप के थे—'नर्ड्स'—जो शतरंज और 'Magic: The Gathering' जैसे खेल खेलते थे। उन्होंने तुरंत स्कूल बोर्ड के नियम निकाल लिए और सबने खुद को 'विकन' (Wiccan) धर्म का घोषित कर दिया। बोले, "धर्म की आज़ादी है, हमें पहनना है!"

माता-पिता ने भी बच्चों का साथ दिया। प्रिंसिपल को नियमों के आगे झुकना पड़ा। अब बारी आई ट्रेंच कोट और लंच टाइम के खेलों की। प्रिंसिपल ने कहा, "Magic खेलना बंद, ये जादू-टोना है, बाकी बच्चे असहज हो रहे हैं।"

नियमों की चाल में उलझे प्रिंसिपल

लेकिन बच्चे तो बच्चे, उन्होंने फिर से नियमों का सहारा लिया। स्कूल के नियमों के अनुसार, अगर कोई क्लब बन जाए, और उसमें शतरंज खेला जाए, तो कोई भी स्ट्रैटेजी वाला खेल चल सकता है। बस, सबने मिलकर शतरंज क्लब बना लिया, एक टीचर को स्पॉन्सर बना लिया, और लंच टाइम में दो लोग शतरंज खेलने लगे, बाकी सब Magic!

कुछ हफ्ते बाद प्रिंसिपल साहब घूमते-घूमते क्लब में आए, तो देखा—दो बच्चे शतरंज और बाकी Magic खेल रहे हैं। गुस्से में आकर बोले, "सब बंद करो, ये क्लब अब नहीं चलेगा!" लेकिन बच्चों ने फिर से नियम दिखाए—"जब तक क्लब एक्टिव है और बोर्ड से मंजूरी नहीं मिली, बंद नहीं हो सकता।"

यहाँ एक कमेंट करने वाले ने बड़ा मज़ेदार तंज कसा—"कभी-कभी तो लगता है कि स्कूल के कुछ लोग धर्म की आज़ादी समझना ही नहीं चाहते, वे बस अपना कंट्रोल कायम रखना चाहते हैं।"

जब बच्चों की जीत हुई, और प्रिंसिपल ने हार मानी

आखिरकार, बच्चों का क्लब चलता रहा। उन्होंने शतरंज में राज्य स्तर पर दूसरा स्थान भी पाया! और कुछ महीनों बाद वही प्रिंसिपल साहब, जो बच्चों को 'ठीक' करने आए थे, खुद ही इस्तीफा देकर निकल लिए।

एक पाठक ने लिखा—"क्या शानदार चाल चली बच्चों ने! अपने ही नियमों को उनके खिलाफ इस्तेमाल करना, यही तो असली जीत है।"
दूसरे ने चुटकी ली—"हमारे यहाँ भी अगर स्कूल के प्रिंसिपल ऐसे तुगलकी फरमान जारी करें, तो बच्चे तो 'पिटीशन' से लेकर सोशल मीडिया तक सब घुमा देंगे!"

निष्कर्ष: नियमों का सही इस्तेमाल भी एक कला है!

कहानी से यही सिखने को मिलता है कि नियम-कायदे हर किसी पर बराबर लागू होते हैं—चाहे वो प्रिंसिपल हों या छात्र। अगर आप अपने अधिकार और नियमों को जानते हैं, तो गलत फैसलों के खिलाफ मजबूती से खड़े रह सकते हैं।

दोस्तों, क्या आपके स्कूल में भी कभी ऐसा वाकया हुआ है जब बच्चों ने मिलकर किसी गलत नियम का विरोध किया हो? या कभी आपने नियमों का ऐसा मज़ेदार इस्तेमाल किया हो? अपने अनुभव नीचे कमेंट में जरूर साझा करें—शायद अगली कहानी आपकी हो!


मूल रेडिट पोस्ट: Be careful what you ask for.