शोरगुली पड़ोसिन को उसी की आवाज़ से सबक सिखाया – एक मज़ेदार बदला
क्या आपके पड़ोस में भी कभी ऐसे लोग रहे हैं जिनकी वजह से आपके घर में चैन की नींद हराम हो गई हो? ऑफिस के अगले दिन सुबह जल्दी उठना हो और रात को कोई पार्टीबाज़ ज़ोरदार म्यूज़िक, शोर-गुल, चीख-पुकार के साथ पूरी गली सिर पर उठा ले – ऐसी स्थिति में कोई भी अपना सब्र खो सकता है। लेकिन आज की कहानी में हमारे नायक ने गुस्से की जगह चुना 'पेटी' बदला, और जो किया वो हर किसी के चेहरे पर मुस्कान ला देगा।
जब हर हफ्ते पड़ोस बदल जाता है शादी-बारात में
ज़रा सोचिए, आप अपने ही घर में चैन से सो नहीं सकते, क्योंकि बगल वाले घर में हर हफ्ते 'बारात' जैसा माहौल रहता है। कभी-कभी तो लगता है जैसे देसी शादी के 'डांस फ्लोर' पर आ गए हैं, जहाँ रात के एक बजे लड़ाई शुरू, बोतल फोड़ने की आवाज़, और फिर अचानक 'मैन! आई फील लाइक अ वुमन!' गाने पर जोरदार चीख-चीखकर गाना – यानी पूरी रात का तमाशा। हमारे लेखक के साथ भी यही हुआ। बेचारे ने कई बार सोचा कि शिकायत करूँ, लेकिन आमने-सामने उलझने का दिल नहीं किया।
बदला भी कुछ हटके – चुपचाप, लेकिन करारा!
हमारे नायक ने सोचा – 'जैसी करनी, वैसी भरनी'। एक दिन जब फिर वही ड्रामा चालू हुआ, तो उन्होंने खिड़की से मोबाइल निकालकर पूरा ऑडियो रिकॉर्ड कर लिया। पड़ोसिन के गानों, लड़ाई-झगड़े और बोतल फोड़ने की आवाज़ सब कैद हो गई। फिर अगली सुबह जब खुद ऑफिस जाने के लिए जल्दी उठे, तो कुत्ते को टहलाने की जगह बड़ा सा स्पीकर निकाला और उसे पड़ोसिन की खिड़की की ओर तान दिया। दरवाज़े बंद किए, और फिर प्ले कर दिया – वही रात की रिकॉर्डिंग!
अब जो हुआ, वो सुनकर आपको भी मज़ा आ जाएगा – कुछ ही मिनटों में पड़ोसिन की नींद खुली, खिड़की बंद करने की आवाज़ें आने लगीं और गुस्से में 'ये क्या बकवास है!' जैसा रिएक्शन मिला। सबसे मज़ेदार बात – पड़ोसिन को अपनी ही आवाज़ से इतनी शर्मिंदगी हुई कि कई दिनों तक हमारे नायक को देखकर सिर झुकाकर निकल गई। जैसे किसी स्कूल के शरारती बच्चे को प्रिंसिपल के सामने शर्मिंदगी हो!
कम्युनिटी की राय: 'जैसी करनी, वैसी भरनी'
रेडिट पर इस कहानी को पढ़कर कई लोगों ने अपने-अपने अनुभव शेयर किए। एक पाठक ने लिखा – "लोगों को तब तक अपनी गलती का एहसास नहीं होता, जब तक उनके सामने उनकी हरकतें ना रख दी जाएँ।" सच है, बड़े-बुज़ुर्ग भी कहते हैं – 'दूसरों की नींद खराब करोगे तो एक दिन खुद की भी होगी।'
एक और यूज़र ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा – "शानिया का गाना सुनना अलग बात है, लेकिन खुद की आवाज़ में सुनना और भी ज़्यादा दर्दनाक!" वहीं किसी ने पूछा कि अगली मुलाकात में क्या हुआ, तो लेखक ने बताया – "वो मुझे देखकर कई दिनों तक नजरें नहीं मिला पाई, चुपचाप निकल जाती थी।" मतलब बात बन गई!
एक और दिलचस्प तरीका कम्युनिटी से आया – किसी ने अपने शोरगुली पड़ोसियों के बच्चों तक को रात को मैसेज करना शुरू कर दिया कि 'आपके मम्मी-पापा बहुत शोर कर रहे हैं, ज़रा समझाइए!' – और ये तरीका भी बड़ा कारगर निकला।
भारतीय समाज में ऐसे बदले क्यों जरूरी हैं?
हमारे यहाँ भी कई बार मोहल्ले में कोई 'पार्टीबाज़' या 'लाउड स्पीकर वाले' पड़ोसी निकल आते हैं, जो सबकी नींद और शांति खराब कर देते हैं। कभी शादी में डीजे का शोर, कभी त्योहारों में लाउडस्पीकर – ऐसे में लोग पुलिस में शिकायत करने से हिचकिचाते हैं। लेकिन ऐसे छोटे, मज़ेदार और सोच-समझकर लिए गए बदले कभी-कभी ज़्यादा असरदार साबित होते हैं। ये कहानी हमें बताती है कि बिना लड़ाई-झगड़े के भी, थोड़ा सा 'पेटी' बनकर, हम दूसरों को उनकी गलती का एहसास दिला सकते हैं।
निष्कर्ष: आपके पास भी ऐसी कोई कहानी है?
तो दोस्तों, अगली बार जब आपके पड़ोस में भी कोई रात-दिन शोरगुल मचाए, तो सीधी लड़ाई के बजाए थोड़ा सा 'क्रिएटिव' सोचें। क्या पता, आपकी भी कहानी वायरल हो जाए! और हाँ, अगर आपके पास भी ऐसी कोई मज़ेदार 'पेटी रिवेंज' वाली कहानी है, तो कमेंट में ज़रूर शेयर करें। आखिर, हर मोहल्ले में एक-आध 'शोरगुली' पड़ोसी तो होते ही हैं – और जुगाड़ू जवाब भी!
कहानी पढ़कर कैसी लगी? ऐसे और किस्से पढ़ना पसंद करेंगे? अपनी राय ज़रूर बताइए!
मूल रेडिट पोस्ट: noise complaint but make it autobiographical