वह टिकिट जो बंद ही नहीं हुआ – टेक्निकल सपोर्ट की अजब-गजब कहानी
अगर आपने कभी किसी सरकारी दफ्तर के चक्कर लगाए हैं, तो आपको फाइलें इधर से उधर घूमती देखना आम बात लगेगी। लेकिन जरा सोचिए, अगर कंप्यूटर सिस्टम खुद ही फाइलों (टिकिट) को इधर-उधर भेजने लगे और कोई भी उसे बंद करने की कोशिश करे, तो वह फिर से खुल जाए! जी हां, आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं एक ऐसी ही गुदगुदाने वाली, मगर सिर पकड़ने वाली टेक्निकल सपोर्ट की कहानी, जिसमें एक टिकट था जो बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा था।
जब दो MSPs आपस में भिड़ें, और टिकिट बना ‘फुटबॉल’!
कहानी शुरू होती है एक MSP (Managed Service Provider) कंपनी के पुराने कर्मचारी की यादों से। हुआ यूं कि उनकी कंपनी एक क्लाइंट को दूसरे MSP के हवाले कर रही थी। अब दोनों तरफ से टिकटिंग सिस्टम था – मतलब, जो भी सहायता चाहिए, वह ईमेल पर टिकट बन जाता था। पुराने MSP ने नया MSP को एक ईमेल भेजा, और दोनों सिस्टम में वही टिकट चालू हो गया।
अब जैसे ही किसी एक ने टिकट बंद किया, तो ‘शिष्टाचार’ के तौर पर एक ईमेल जाता – “अगर आपको लगता है कि काम पूरा नहीं हुआ, तो इसी ईमेल का जवाब दें।” लेकिन, जैसे ही दूसरा MSP टिकट बंद करता, वही मेल पुराने MSP के सिस्टम को मिलता, और वह टिकट फिर से खुल जाता! ऐसे ही यह टिकट पिंग-पोंग की तरह इधर से उधर घूमता रहा। लगता था जैसे कोई ऑफिस का बाबू फाइल पर से दस्तखत किए बिना बार-बार उसे लौटा रहा हो – “अरे भैया, एक बार फिर देख लो!”
ऑटो-रेस्पॉन्डर का कहर – जब मशीनें आपस में बात करने लगें
इस पूरी घटना में सबसे मजेदार किरदार थे – ईमेल ऑटो-रेस्पॉन्डर। एक कमेंट करने वाले ने लिखा, “ऑटो-रेस्पॉन्डर का क्या कहना! अगर किसी ने गलती से पूरी कंपनी के मेलिंग लिस्ट पर ऑटो-रिप्लाई लगा दिया, तो समझिए आफत आ गई।” ऐसे मेलिंग लिस्ट पर अगर एक भी बंदा ‘ऑटो-रिप्लाई’ में फंसा, तो पूरी टीम की इनबॉक्स भर जाती है।
एक और पाठक ने साझा किया – “हमारे ऑफिस में ऐसा ही हुआ था, और जब तक कोई समझदार एडमिन नहीं आया और ऑटो-रिप्लाई बंद नहीं किया, तब तक हजारों ईमेल आते रहे।”
‘धन्यवाद’ भी बना सिरदर्द!
आप सोचेंगे, टिकटिंग सिस्टम तो यूजर की सुविधा के लिए हैं, लेकिन कभी-कभी यूजर का ‘धन्यवाद’ कहना भी मुसीबत बन जाता है। एक कमेंट में बताया गया, “मैंने जैसे ही टिकट सॉल्व करके बंद किया, यूजर ने ‘थैंक यू’ में रिप्लाई कर दिया, और टिकट फिर से खुल गया! फिर से बंद करो…”
हमारे देश में भी तो होता है – कोई काम करवाओ, फिर ‘धन्यवाद’ बोलने के लिए अलग से कॉल या मैसेज! टेक्निकल सपोर्ट वालों के लिए यह ‘शुक्रिया’ भी कभी-कभी नासूर बन जाता है।
‘टिकिट टेनिस’ और मेल स्टॉर्म – जब सिस्टम खुद ही बिगड़ जाए
कुछ पाठकों ने तो इसे ‘टिकिट टेनिस’ कहा – मतलब, एक टिकट इधर से उधर, बार-बार खुलना-बंद होना। एक और मजेदार किस्सा – “हमारे सिस्टम और ग्राहक के सिस्टम ने एक-दूसरे को नए टिकट की पुष्टि भेजी, तो हर बार नया टिकट बन जाता। सुबह ऑफिस पहुंचे तो देखा, इनबॉक्स में दो हज़ार से ज्यादा टिकट!” सोचिए, अगर आपके WhatsApp ग्रुप में एक ही मैसेज खुद-ब-खुद हजार बार आ जाए, तो क्या हाल होगा!
किसी ने इसे ‘मेल स्टॉर्म’ कहा – मतलब, मेल की बारिश! अगर दोनों तरफ ऑटो-रिस्पांस चला तो सिस्टम क्रैश भी हो सकता है। ये सब एक छोटी सी गलती या सिस्टम में नियम न बनाने से हो जाता है।
हल तो था – लेकिन जुगाड़ भारतीय ही लगाए!
आखिरकार, इस टिकट की ‘मुसीबत’ से छुटकारा कैसे मिला? दोनों MSPs में से एक ने टिकट की ईमेल आईडी बदल दी, यानी टिकट सिस्टम को धोखा दे दिया! टिकट बंद, मेल भी बंद, और सबने राहत की सांस ली। असली भारतीय जुगाड़!
एक पाठक ने बढ़िया कहा – “अगर यह रोज़ होता तो हम सिस्टम में नियम बना देते, लेकिन एक ही बार की बात थी, तो हाथ से ही ठीक कर दिया। आखिर, हर समस्या का हल जुगाड़ में है!”
निष्कर्ष – क्या आपके ऑफिस में भी टिकटिंग सिस्टम की ऐसी कहानियां हैं?
इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है कि चाहे सिस्टम कितना भी स्मार्ट क्यों न हो, कभी-कभी छोटी-सी बात बड़ी आफत बन जाती है। टेक्नोलॉजी जितनी मददगार है, उतनी ही ‘खतरनाक’ भी हो सकती है अगर सही नियम न बनें।
तो अगली बार जब आपके ऑफिस में टिकट बार-बार खुल जाए, या कोई ‘धन्यवाद’ बोलकर मुश्किल में डाल दे, तो हंस लीजिए – आप अकेले नहीं हैं! क्या आपके साथ भी कभी ऐसी कोई टिकटिंग या ऑटो-रेस्पॉन्डर वाली घटना घटी है? नीचे कमेंट में जरूर बताइए, और दूसरों को भी हंसी का मौका दीजिए!
मूल रेडिट पोस्ट: The ticket that just would not close.