लाइन में घुसपैठिए को छोटी सी बदला, बड़ा सबक: सुपरमार्केट की सच्ची घटना
कभी-कभी ज़िंदगी में छोटी-छोटी बातें बहुत बड़े सबक सीखा जाती हैं। खासकर तब, जब कोई दूसरों की इज़्ज़त किए बिना अपने फायदे के लिए नियम तोड़ता है। ऐसी ही एक मजेदार और सच्ची घटना हुई एक सुपरमार्केट में, जहाँ एक साहब ने लाइन तोड़कर बुजुर्गों का हक छीना—लेकिन किस्मत ने उन्हें ऐसा चुपचाप सबक सिखाया कि शायद आज तक समझ नहीं पाए होंगे कि गलती कहाँ हुई!
सुपरमार्केट में लाइन का खेल: जब बड़प्पन पीछे छूट गया
हम भारतीयों के लिए लाइन में लगना कोई नई बात नहीं। चाहे रेलवे स्टेशन हो या राशन की दुकान, लाइन की अपनी मर्यादा है। और जब समाज में बुजुर्गों या विकलांगजनों के लिए विशेष व्यवस्था हो, तो हम उनका सम्मान और भी ज़रूरी मानते हैं। लेकिन इस घटना में, एक खुद को बहुत चालाक समझने वाले जनाब ने सारी मर्यादा तोड़ दी।
सुपरमार्केट की कहानी है—जहाँ एक तरफ बुजुर्ग और विकलांगजन के लिए कुर्सियाँ लगी थीं, ताकि वे आराम से अपनी बारी का इंतज़ार कर सकें। सब कुछ सामान्य था, जब तक एक युवक आया और सीधे इन बुजुर्गों के आगे जाकर लाइन में घुस गया। जब एक सज्जन (हमारे कहानी के नायक) ने टोका, तो उस युवक ने हँसते हुए ताना मारा, “मैं तो लाइन में इन्हें खड़ा देख नहीं रहा!” मानो बुजुर्ग बैठें तो उनका हक छिन जाता है। बुजुर्ग चुप रहे, माहौल थोड़ी देर के लिए असहज हो गया, और हमारे नायक के मन में गुस्सा खौलने लगा।
बदला: चुपचाप, मीठा और असरदार
कहते हैं, बदला वही जो समय पर और ठंडे दिमाग से लिया जाए। कुछ मिनट बाद, मौका खुद चलकर आया। वह युवक अपने फोन पर व्यस्त था और उसके ट्रॉली में कैंपिंग का सामान भरा था—नींद की थैली, पेपर प्लेट्स, मैगी, पोर्टेबल स्टोव... और सबसे खास, एक छोटा सा ब्यूटेन गैस का डिब्बा।
हमारे नायक ने मौका ताड़ा और चुपचाप वह ब्यूटेन का डिब्बा अपनी टोकरी में डाल लिया। युवक ने ध्यान ही नहीं दिया! युवक ने बाकी सामान खरीदा, खुश-खुश चला गया। हमारे नायक ने ब्यूटेन समेत अपना सामान खरीद लिया और मन ही मन मुस्कुराए—क्योंकि उस युवक के कैंपिंग ट्रिप का मज़ा अब बिगड़ने वाला था!
सोचिए, जब वो जंगल में अपने दोस्तों के सामने अपनी चालाकी का रौब झाड़ रहा होगा, और स्टोव चलाने की बारी आई—तो पता चलेगा, गैस ही नहीं! न गरम खाना, न चाय, न कॉफी—सिर्फ कड़क मैगी और अपनी बदतमीज़ी का स्वाद।
जनता की राय: “ऐसा बदला तो सोने पे सुहागा!”
रेडिट पर इस कहानी ने खूब धूम मचाई। एक पाठक ने लिखा, “आपने दुनिया को थोड़ा बेहतर बना दिया।” कई लोगों को ये बदला बिलकुल सही और संतोषजनक लगा। किसी ने व्यंग्य में कहा, “अब उस युवक को गैस के लिए उतना ही वक्त बर्बाद करना पड़ेगा, जितना उसने लाइन में खड़े होकर बचाना चाहा था!”
एक और पाठक ने मज़ेदार अंदाज़ में लिखा, “कहीं जंगल में वह युवक ठंडी मैगी चबा रहा होगा और सोच रहा होगा—कहाँ गड़बड़ हो गई!” किसी ने मज़ाक में जोड़ा, “बदला ठंडे पोर्क एंड बीन्स के साथ सबसे बढ़िया लगता है।”
कुछ लोगों ने तो कल्पना कर डाली, “काश वो कैंपसाइट कोई बुजुर्ग ही चला रहे हों, ताकि युवक को अपना व्यवहार याद आ जाए!” एक अन्य पाठक ने लिखा, “शायद वह बार-बार कह रहा होगा, ‘मैंने गैस तो ट्रॉली में डाली थी, यकीन मानो!’ और अब खुद पर ही शक कर रहा होगा।”
हमारी संस्कृति में सबक: सम्मान भी जरूरी, सबक भी
हमारे यहाँ तो कहा भी जाता है—“जैसी करनी, वैसी भरनी।” दूसरों का हक मारने से कभी किसी का भला नहीं होता। इस घटना ने एक बड़ी बात याद दिला दी—कभी-कभी चुपचाप लिया गया छोटा सा बदला, किसी को जिंदगी भर याद रह सकता है।
रेडिट पर एक और कमेंट बड़ा दिलचस्प था: “आपने चोरी नहीं की, बस उस बद्तमीज़ इंसान को कर्मा से मिलवा दिया!” और सच कहें तो, कई बार ऐसा ही जरूरी भी हो जाता है। जब लोग समाज के नियम तोड़ते हैं, तो उन्हें ये एहसास दिलाना भी जरूरी है कि हर चालाकी का अंत अच्छा नहीं होता।
निष्कर्ष: आपकी राय क्या है?
तो दोस्तों, आपको ये कहानी कैसी लगी? क्या आपने कभी ऐसे किसी घुसपैठिए को अपने अंदाज़ में सबक सिखाया है? या किसी सुपरमार्केट, रेलवे स्टेशन, या बैंक में ऐसी कोई घटना देखी है? अपनी राय, अनुभव या मजेदार किस्से जरूर साझा करें!
कभी-कभी छोटी सी शरारत, बड़ी सीख दे जाती है—और दुनिया को थोड़ा बेहतर बना जाती है।
आपका क्या मानना है—ऐसे ‘पेटी रिवेंज’ यानी छोटी-छोटी बदला, समाज में जरूरी है या नहीं? कमेंट में जरूर बताइएगा!
मूल रेडिट पोस्ट: I 'stole' from a shopping cart