रहस्यमयी ग्राहक और कंपनी की तुगलकी फरमान: जब नियमों का मज़ाक बना
क्या आपने कभी किसी दुकान में रात के वक्त काम किया है? सोचिए, न ग्राहक, न कोई साथी, बस आप, दुकान और कंपनी के बेमतलब नियम! अमेरिका की एक बड़ी सुविधा स्टोर में काम करने वाले कर्मचारी 'फ्रॉगलेट' के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। उनकी कहानी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई – और इसमें छुपा है हर नौकरीपेशा के लिए एक बड़ा सबक!
रहस्यमयी ग्राहक: कंपनी की चाल या कर्मचारियों की सजा?
हमारे देश में अक्सर दुकान या ऑफिस में अचानक 'मालिक' का आना मानो परीक्षा का दिन हो। लेकिन अमेरिका में इस परंपरा को 'मिस्ट्री शॉपिंग' कहते हैं – यानी कंपनी ऐसे गुप्त ग्राहक भेजती है जो कर्मचारी की हर हरकत का गुप्त मूल्यांकन करता है। और इसी पर तय होती है आपकी तनख्वाह या वेतन वृध्दि!
फ्रॉगलेट की शिफ्ट रात 10 बजे से सुबह 6 बजे की थी – अकेले। दुकान में रात के वक्त ग्राहक मुश्किल से आते थे, लेकिन कंपनी का फरमान था – गर्म ताज़ा कॉफी और 'रोलर ग्रिल' (जिसमें हॉटडॉग, तकीटो वगैरह) हमेशा भरे रहें। ज़रा सोचिए, दिल्ली की किसी दुकान में रात 2 बजे ताज़ा समोसे या चाय रखने को कहा जाए – जबकि कोई ग्राहक ही नहीं!
फ्रॉगलेट ने समझदारी से अपने मैनेजर से पूछा, "रात में ग्राहक नहीं आते, तो ताज़ा कॉफी और स्नैक्स क्यों बनाऊँ? कंपनी की नीति है, लेकिन दुकान की भी कोई समझदारी होनी चाहिए।" जवाब मिला – "हर लाइन में पूरे नंबर लाओ, बस यही काम है तुम्हारा।"
आदेश का पालन, लेकिन 'मालिकाना अंदाज़' में
अब शुरू हुई 'मालिशियस कंप्लायंस' – यानी आदेश का पालन तो होगा, लेकिन मालिक को ही नुकसान! फ्रॉगलेट ने जैसे ही शिफ्ट शुरू की, ताज़ा कॉफी और सारे स्नैक्स बना दिए। 12 बजे तक कुछ भी नहीं बिका, तो सब फेंक दिया और नए बना दिए। सुबह 4 बजे फिर वही – पुराने फेंको, नए बनाओ। नतीजा? हर रात 100 डॉलर (करीब 8,000 रुपये) का सामान कूड़ेदान में!
कमेंट्स में एक पाठक ने लिखा – "भई, कंपनी को जब तक खुद जेब से नुकसान न हो, तब तक समझ नहीं आती!" (ये बात सच है – हमारे यहाँ भी अक्सर सेठ जी तब ही जागते हैं जब नुकसान दिखे।)
कर्मचारी बनाम कंपनी: क्या सच में न्याय होता है?
फ्रॉगलेट को अब हर मूल्यांकन में पूरे नंबर मिलने लगे – और वेतन वृद्धि भी। लेकिन मैनेजर ने जल्दी ही बुलाकर कहा – "अब बस करो, इतनी बर्बादी मत करो। नंबर पूरे लाओ, लेकिन सामान मत फेंको!"
कई पाठकों ने कहा, "सिर्फ आगे के लिए वेतन वृद्धि क्यों? पिछले सारे नुकसानों का भी मुआवज़ा मिलना चाहिए था!" एक ने तो यहाँ तक लिखा, "अगर स्टोर नीति और कंपनी नीति आपस में टकरा रही हैं, तो भुगतना कर्मचारी को क्यों पड़े?" ये सवाल हर दफ्तर, हर दुकान में गूंजता है – क्या नियम वाकई तर्कसंगत हैं या बस दिखावे के लिए?
चुटीले कमेंट्स और भारतीय संदर्भ
एक मज़ेदार कमेंट था – "हमारे यहाँ भी गुप्त ग्राहक भेजने की बजाय अगर कोई 'गुप्त कर्मचारी' भेजा जाए, जो मालिक की हरकतों का मूल्यांकन करे, तो असली न्याय हो!" सोचिए, किसी सरकारी दफ्तर में ऐसा हो जाए, तो क्या नज़ारा होगा!
कई पाठकों ने साझा किया कि खुद 'मिस्ट्री शॉपर' रहते हुए हमेशा कर्मचारियों को अच्छे अंक दिए – "भई, खुद खुदरा दुकान में काम किया है, पता है कितना मुश्किल होता है।"
एक और पाठक बोले – "ये सब KPI (मुख्य प्रदर्शन संकेतक) का खेल है। जब मापदंड ही लक्ष्य बन जाए, तो असली काम पीछे छूट जाता है।" इसे अर्थशास्त्र में 'गुडहार्ट का नियम' कहते हैं, और सच पूछिए तो हमारे सरकारी विभागों के 'रजिस्टर' या 'फाइल मूवमेंट' भी कुछ-कुछ ऐसे ही हैं – दिखावे के लिए, असलियत में कोई मतलब नहीं!
निष्कर्ष: सीख क्या है?
इस कहानी से साफ है – कभी-कभी कंपनी की नीतियाँ, जमीन की हकीकत से बिल्कुल अलग होती हैं। कर्मचारी अपने विवेक से काम करें, तो नुकसान; नियमों का अंधा पालन करें, तो भी नुकसान – फर्क बस इतना कि मालिक को तब ही समझ आती है जब जेब ढीली हो।
आपकी दुकान, दफ्तर या कंपनी में भी ऐसे 'बेमतलब' नियम हैं? क्या आपने कभी किसी आदेश का पालन ऐसे किया कि मालिक को ही सबक मिल जाए? अपने अनुभव नीचे ज़रूर साझा करें – क्योंकि असली बदलाव वहीं से आता है!
आज की कहानी यही सिखाती है – नीति से बड़ी समझदारी है, और कभी-कभी मज़ाकिया अंदाज में भी बड़ा सबक दिया जा सकता है!
मूल रेडिट पोस्ट: Mystery Shopping Nonsense