विषय पर बढ़ें

रूड' क्यों? – जब आपकी मनमानी पूरी न हो, तो सामने वाला बुरा!

एक गुस्से में दिखता वयस्क, बचपन की इच्छाओं की असंतोष को दर्शाता हुआ।
यह सिनेमाई चित्रण वयस्कों की निराशा को बचपन की जिद से जोड़ता है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि कैसे अनसुलझे भावनाएँ हमारे रिश्तों को प्रभावित कर सकती हैं।

हम सबने अपने बचपन में वो दृश्य देखे हैं, जब कोई बच्चा जिद करता है – “मुझे चॉकलेट चाहिए!” और जब माता-पिता ‘ना’ कह देते हैं, तो वही बच्चा नाक-भौं सिकोड़कर बोलता है, “आप कितने बुरे हैं!” पर क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ लोग बड़े होकर भी अपनी ये आदत छोड़ नहीं पाते? फर्क बस इतना है कि अब उनकी जिद बच्चों वाली नहीं, बल्कि “रूड” कहकर सामने वाले को उल्टा दोषी ठहराने की हो जाती है।

आज की कहानी एक होटल के फ्रंट डेस्क पर तैनात कर्मचारी की है, जिसने बड़े ही मजेदार अंदाज में ऐसे ही एक परिवार की हरकतों का सामना किया – और हां, अंत तक आते-आते खुद भी मुस्कुरा उठा!

ग्राहक के ‘रूड’ होने का असली मतलब

भारतीय होटल, बैंक या किसी भी सेवा केंद्र पर जाएं – एक खास किस्म का ग्राहक आपको जरूर मिलेगा। ये वो लोग होते हैं, जो मनचाही चीज़ मांगते हैं, और जब नियम या पॉलिसी के कारण उन्हें ‘ना’ सुननी पड़ती है, तो तमतमाते हुए कहते हैं, “आप बहुत रूड हैं!” इस कहानी में भी कुछ ऐसा ही हुआ।

एक परिवार होटल में चेक-इन करने आया। सबकुछ सामान्य था, लेकिन चेक-इन के दौरान मैडम ने पूछा – “क्या हम अपनी कार यहीं छोड़ सकते हैं?” आगे बातचीत से पता चला कि वे एक रात ठहरने के बाद फ्लाइट पकड़ लेंगी और लगभग एक हफ्ते बाद लौटेंगी। यानी, कार को हफ्ते भर के लिए होटल पार्किंग में छोड़ना चाहती थीं! फ्रंट डेस्क स्टाफ ने विनम्रता से समझाया – “माफ कीजिए, हमारा होटल पार्क-एंड-फ्लाई सुविधा नहीं देता।”

बस फिर क्या था! मैडम का पारा चढ़ गया – “मैंने कॉल करके पूछा था, तब तो हाँ बोला था!” स्टाफ सोच रहा था – “अगर आपने पहले से पूछ लिया था, तो फिर मुझसे क्यूं पूछ रही हैं?” लेकिन उसने संयम नहीं खोया और पूछा – “किससे बात हुई थी?” जवाब मिला – “नाम तो नहीं पूछा, पर कॉल लॉग दिखा सकती हूं!” अब कॉल लॉग में क्या लिखा होगा – ‘हां, मैडम, आप कार छोड़ दीजिए?’ खैर, स्टाफ ने फिर नियम समझाया।

“मुझे तो चाहिए, चाहे जो हो जाए!” – जिद और बहस का भारतीय संस्करण

बात बढ़ी, तो मैडम बोलीं – “हमने तो इसी वजह से होटल बुक किया!” स्टाफ ने भी भारतीय स्टाइल में समाधान सुझाया – “अगर चाहें, तो अभी आपकी बुकिंग कैंसिल कर सकते हैं, ताकि आप कोई और होटल चुन लें जहां पार्किंग मिल जाए।” लेकिन मैडम बोलीं – “इतनी रात को? क्या आप मजाक कर रहे हैं?” (वैसे, रात के 7 बजे थे, पर भारतीय समाज में 7 बजे भी ‘रात’ मानी जाती है, है ना?)

फिर आया क्लासिक डायलॉग – “मैनेजर से बात कराइए।” अब मैनेजर साहब तो मौजूद नहीं थे, तो स्टाफ ने कहा – “सुबह मिल लीजिएगा।” इस बीच पति महोदय चुपचाप कार्ड स्वाइप कर रहे थे, और मैडम ‘करेन’ स्माइल के साथ गुस्से को मुस्कान में ढालने की कोशिश कर रही थीं – वही, बड़ी-बड़ी आँखें, बर्फ सी ठंडी मुस्कान, और भीतर से खौलता गुस्सा!

“रूड” का असली राज़ – जब ‘ना’ सुनना न आए

इस पूरी घटना के बाद अगली सुबह होटल को एक तगड़ा रिव्यू मिला – “बहुत खराब कम्युनिकेशन! हमें फोन पर बोला गया था, लेकिन फ्रंट डेस्क वाले बहुत रूड और मदद नहीं करने वाले थे।” मैडम ने तो स्टाफ का समाधान सुझाने का मज़ाक भी उड़ाया – जैसे उसने कहा हो, “जाओ, कहीं और चले जाओ!”

लेकिन होटल मैनेजर ने भी जवाब में पॉलिसी साफ-साफ दोहरा दी और बताया कि स्टाफ ने नियमों के तहत, पूरी प्रोफेशनलिज्म के साथ मदद करने की कोशिश की थी। अब भला हो ऐसे मैनेजरों का, जो अपने स्टाफ की पीठ थपथपाते हैं!

रेडिट पर एक कमेंट था – “जब भी रिव्यू में ‘रूड’ लिखा मिले, समझ लो कि असल में ग्राहक को उसकी मनमानी नहीं मिली, और असली ‘रूड’ वही था!” एक अन्य यूज़र ने भारतीय तंज में कहा, “मैडम, अगर आप पूरे हफ्ते कार पार्क करना चाहती हैं, तो सात रात के हिसाब से हर रात के रूम का खर्च जोड़ लीजिए – बनता है ₹10,000+!” कितना सही कहा – हर मांग का कोई न कोई दाम तो होता है!

यहां एक और मजेदार कमेंट था – “कुछ लोग तो कॉल लॉग दिखाकर साबित करना चाहते हैं कि उनकी बात हुई है, जैसे कॉल लॉग में बातचीत रिकॉर्ड हो जाती है!” बिल्कुल ऐसा ही होता है जब कोई कहता है, “मैंने तो फलां अंकल से पूछा था, उन्होंने बोला था…”

क्या ‘ना’ सुनना भी एक कला है?

हमारे समाज में, खासकर जब कोई सेवा संबंधी बात हो, ‘ना’ सुनना और उसे स्वीकार कर लेना आज भी एक बड़ी बात है। अक्सर लोग बहस करने लगते हैं, या नियम तोड़ने की जुगत में लग जाते हैं। एक कमेंट में लिखा था – “कुछ लोग तो हर बात पर मोलभाव की तरह ‘ना’ को भी बहस का मुद्दा बना लेते हैं, और जब सामने वाला झुकता नहीं, तो उसे ‘रूड’ बोल देते हैं।”

सोचिए, अगर बचपन में हमें भी हर बात पर ‘हां’ ही मिलती, तो क्या हम बड़े होकर कभी हार या ‘ना’ का सामना कर पाते? शायद नहीं! यही वजह है कि सेवा क्षेत्र में काम करने वाले अक्सर कहते भी हैं – “सबको खुश रखना असंभव है, लेकिन नियम सबके लिए बराबर हैं।”

निष्कर्ष: “रूड” कौन – जो नियम माने या जो जिद करे?

तो अगली बार जब किसी होटल, बैंक या ऑफिस में आपकी मांग पूरी न हो, तो एक पल ठहरकर सोचिए – क्या वाकई सामने वाला ‘रूड’ है, या आपको भी ‘ना’ सुनना सीखना चाहिए? आखिरकार, नियम सबके लिए होते हैं, और कभी-कभी मदद करने की कोशिश भी ‘रूड’ लग सकती है, अगर हमारी उम्मीदें हद से ज्यादा हों।

क्या आपके साथ भी ऐसा कोई अनुभव हुआ है? कमेंट में जरूर बताइए – और हां, अगली बार ‘रूड’ कहने से पहले, सामने वाले की मजबूरी भी समझिए!


मूल रेडिट पोस्ट: 'Rude' = 'You didn't give me what I want and now I'm mad'