विषय पर बढ़ें

रंगभेद वाले मैनेजर को छोटे-छोटे सिक्कों से मिली बड़ी सज़ा: एक मज़ेदार बदले की कहानी

एक एनीमे-शैली की चित्रण जिसमें एक काले मैकेनिक ने भेदभावी प्रबंधक का सामना किया है।
इस आकर्षक एनीमे चित्रण में, एक काला ब्रिटिश मैकेनिक अपने भेदभावी प्रबंधक का सामना करता है, जो भेदभाव के खिलाफ संघर्ष की भावना को व्यक्त करता है। यह शक्तिशाली छवि विपरीत परिस्थितियों पर काबू पाने और कार्यस्थल में पूर्वाग्रह के खिलाफ लड़ाई की यात्रा को दर्शाती है।

क्या आपने कभी ऑफिस में ऐसा महसूस किया है कि किसी को सिर्फ उसकी जाति, रंग या नाम की वजह से अलग नज़र से देखा जाता है? सोचिए, अगर ऐसी हालत आपके साथ हो और आपके बॉस भी उसी लाइन में हों, तो आप क्या करेंगे? आज की ये कहानी है UK के एक अफ्रीकी मूल के ब्लैक ब्रिटिश मैकेनिक की, जिसने अपने नस्लभेदी मैनेजर को ऐसा मज़ेदार सबक सिखाया कि पूरी टीम देखती रह गई!

जब इंसानियत हारने लगे, तब चुप्पी तोड़ना जरूरी है

ये कहानी है एक ऐसे शख्स की, जो पांच साल की उम्र में वेल्स, UK आया था और HGV मैकेनिक की नौकरी करता था। शुरुआत में सब ठीक रहा, लेकिन जैसे-जैसे उसे अपने रंग और नाम को लेकर कॉलेज में और वर्कशॉप में ताने सुनने पड़े, उसका भरोसा हिलने लगा। हमारे यहां भी अक्सर लोग "अरे, ये तो बिहारी है", "ये तो दक्षिण भारतीय है", "इनका नाम बड़ा अजीब है" जैसी बातें कर देते हैं, लेकिन वहां तो मामला और भी आगे निकल गया।

उसके मैनेजर ने हद कर दी—कभी उसके अफ्रो बालों को छूना, नाम पर मज़ाक उड़ाना, कभी अफ्रीकी दोस्तों से धुआं उठाकर बात करने वाला जोक मारना, तो कभी सबके सामने कह देना कि 'ब्लैक लोगों को कॉलेज में घुसने नहीं देना चाहिए क्योंकि उनका IQ कम होता है'। सोचिए, अगर आपके बॉस ही आपको बार-बार नीचा दिखाए, तो मन में कितनी आग जलती होगी!

बदले का तरीका—सीधा, सुलझा हुआ और ज़रा हटके

अब यहां हमारे देश में होता तो कोई चुपके से शिकायत कर देता, या फिर चाय की दुकान पर खूब भड़ास निकालता। लेकिन इस बंदे ने एकदम देसी जुगाड़ निकाला—'बदला भी लेना है, और मज़ा भी आना चाहिए!'

उस मैनेजर की आदत थी कि वो सभी स्टाफ के लिए थोक में स्नैक्स और ड्रिंक्स लाता और सबको 50 पैसे या 1 पाउंड के सिक्कों में पेमेंट करने को कहता। एक दिन एक गरीब मैकेनिक ने चिल्लर में पेमेंट कर दिया, तो मैनेजर ने उसे सबके सामने डांट दिया। यहीं से बदले की प्लानिंग शुरू हुई।

कुछ दिन बाद, जब मैनेजर ने "रंग वाले इंसान पर हूडी पहनकर कभी भरोसा मत करना" वाला कमेंट किया, तो ये सहन नहीं हुआ। उसने घर जाकर 1 और 2 पेन्स के सिक्कों में पूरे 4 पाउंड गिन-गिनकर पैक किए और अगले दिन सारे स्नैक्स उठाकर वही सिक्के मैनेजर को पकड़ाए। जैसे ही ब्रेक में मैनेजर ने देखा कि पूरा काउंटर चवन्नियों और दो पैसों से भर गया है, तो आग बबूला हो गया! कैमिस्ट्री की लैब में जैसे रिएक्शन होता है, वैसे ही वहां भी माहौल गरम हो गया।

जब भीड़ खामोश हो, तब अकेले की हिम्मत मायने रखती है

मैनेजर ने चिल्लाया, "तुम लोगों को और कोई काम नहीं है क्या? अब मैं ये सब बंद कर दूंगा!" पूरी टीम के सामने वो बौखला गया, लेकिन बंदा खड़ा-खड़ा मुस्कुराता रहा। कुछ लोगों ने कहा, "तूने सबका नुकसान कर दिया, कल सही पैसे लेकर आना।" लेकिन असल में उन्होंने कभी उसकी परेशानी नहीं समझी थी।

रेडिट पर एक यूजर ने लिखा—"तुमने सबका 'सिस्टम' बिगाड़ा नहीं, असली सिस्टम तो वो था जिसमें रोज़ नस्लभेद दिखता था और सब चुप रहते थे।" हमारे यहां भी कुछ लोग कहते हैं, "अरे, चुप रहो, सिस्टम ऐसे ही चलता है," लेकिन अगर कोई आवाज़ न उठाए, तो बदलाव कैसे आएगा?

कई कमेंट्स में लोगों ने तारीफ की—"ये तो छोटा बदला था, असल में ऐसे लोगों को और बड़ा सबक मिलना चाहिए!" कोई बोला, "भाई, तू तो लीजेंड है, ऐसे लोगों को चवन्नी-चवन्नी का हिसाब देना ही चाहिए।" एक कमेंट तो ऐसा था जैसे हमारे देसी मुहावरे का अनुवाद—"भगवान करे, तेरा एक्स-बॉस हमेशा चिल्लर ही गिनता रहे!"

आखिर में—सम्मान सबका हक है

कहानी का अंत भी कम दिलचस्प नहीं था। मैनेजर को कंपनी ने 'इज्ज़त बचाने के लिए' खुद ही इस्तीफा देने को कहा, लेकिन टीम के बाकी लोग भी OP (कहानी के लेखक) से दूर रहने लगे। आखिरी दिन मैनेजर ने सबके लिए खाना लाया, पर OP ने कंटीले अंदाज में उस खाने को छुआ तक नहीं, बल्कि अपने काम में लगा रहा। जब मैनेजर ने हाथ मिलाने की उम्मीद की, तो उसने नजरअंदाज कर दिया।

कई लोगों ने सलाह दी—"दोस्त, आगे बढ़ो, अपनी बिरादरी के नेटवर्क बनाओ, जो तुम्हारा साथ दे। जैसे यहां जाति या क्षेत्र के लोग एक-दूसरे का सहारा बनते हैं, वैसे ही तुम्हें भी अपनी पहचान और आत्मसम्मान के लिए खड़ा होना चाहिए।"

क्या आपने भी ऑफिस में ऐसा कुछ देखा-सुना है?

अगर आप भी कभी ऑफिस, कॉलेज या दोस्तों के बीच ऐसी भेदभाव वाली हरकतों के गवाह बने हैं, तो चुप न रहें। ज़रूरी नहीं कि हर लड़ाई बड़ी हो, कभी-कभी चवन्नियों और दो पैसों से भी बड़ा संदेश जा सकता है।

तो दोस्तों, अगली बार जब आपको लगे कि कोई आपका या किसी और का अपमान कर रहा है, तो याद रखिए—इज्ज़त हर किसी का जन्मसिद्ध अधिकार है, चाहे वो किसी भी रंग, जाति, धर्म या लिंग का हो। अपनी आवाज़ उठाइए, और अगर मौका मिले, तो मज़ेदार बदला भी लीजिए!

आपकी इस पर क्या राय है? क्या आप भी कभी ऐसे किसी ऑफिस ड्रामे का हिस्सा बने हैं? नीचे कमेंट में जरूर बताइए, और अगर कहानी पसंद आई हो तो शेयर करना न भूलें—क्योंकि बदलाव की शुरुआत एक छोटी सी चवन्नी से भी हो सकती है!


मूल रेडिट पोस्ट: Revenge on a racist manager was worth the backlash