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मेहमान की शिकायतें और रिसेप्शनिस्ट की बेबसी: होटल की वो कहानी, जो हर भारतीय समझ सकता है

होटल के रिसेप्शन क्षेत्र की सिनेमाई छवि, जिसमें एक चिंतित स्टाफ सदस्य और मेहमान की बातचीत है।
इस सिनेमाई चित्रण में, एक होटल का स्टाफ सदस्य मेहमानों के साथ बातचीत की जटिलताओं का सामना कर रहा है, जो इस बात को दर्शाता है कि कैसे एक प्रतीत होता हुआ सुंदर प्रवास एक अप्रत्याशित खराब समीक्षा के साथ समाप्त होता है। जानें कि इन स्थितियों का प्रबंधन कैसे करें हमारे नवीनतम ब्लॉग पोस्ट में!

होटल में काम करना वैसे तो बड़ा ही रोचक काम लगता है। हर दिन नए लोग, नए चेहरे, और नए अनुभव। पर अगर आप सोचते हैं कि होटल के रिसेप्शन पर बैठना बस मुस्कुराने और चाबी देने का काम है, तो जनाब आपसे बड़ा मासूम कोई नहीं! असली मज़ा तब आता है जब कोई मेहमान बिना कुछ कहे-समझे जा कर होटल की ऑनलाइन रेटिंग गिरा देता है, और फिर मैनेजमेंट की मीटिंग में सबकी आँखें आपके चेहरे पर टिकी होती हैं।

आज की कहानी ऐसे ही एक रिसेप्शनिस्ट की है, जो मेहमानों की अनकही शिकायतों और उनकी 'सिर्फ शिकायतें कर-भाग जाओ' वाली आदत से परेशान हो गया। सोचिए, आपके ऑफिस में कोई समस्या हो, और आप बॉस को बताने के बजाय सोशल मीडिया पर पोस्ट डाल दें – क्या होगा?

जब मेहमान बोले: "मैं तो रिव्यू लिख दूँगा!"

तो हुआ यूं कि होटल के रिसेप्शन पर एक सज्जन आए। बड़े ही भले इंसान लगे – मुस्कुराते हुए चेक-इन किया, कोई गिला-शिकवा नहीं। पर असली ड्रामा तब शुरू हुआ जब, तीन-चार दिन बाद अचानक होटल की वेबसाइट पर एक बुरा रिव्यू चमकने लगा – "यहाँ वाई-फाई काम नहीं करता, स्टाफ ने ध्यान नहीं दिया।"

रिसेप्शनिस्ट बेचारा परेशान! सोच में पड़ गया – जब आप सामने थे, तब तो कुछ कहा ही नहीं, न शिकायत, न नाराजगी, और अब सबके सामने शिकायतें उगल दीं?

समस्या का असली माजरा काफी मजेदार था। एक दिन वही मेहमान रिसेप्शन पर आए और बोले – "वाई-फाई कहता है कि उसे रीबूट करो।" रिसेप्शनिस्ट ने समझाने की कोशिश की, "सर, हमारे यहाँ दो नेटवर्क हैं – एक गेस्ट के लिए, एक स्टाफ के लिए। मुझे राउटर का एक्सेस नहीं है, पर मैं देख सकता हूँ..."
पर मेहमान का मूड तो अलग ही चलता था – "ठीक है, मैं रिव्यू लिख दूँगा, अगली बार कहीं और रुक लेंगे!" और गुस्से में चलते बने।

रिसेप्शनिस्ट सोचता रह गया – "अरे भैया, आप बताते तो सही, मैं स्टाफ वाला नेटवर्क भी दे देता! पर आपको तो शिकायत करनी थी, मदद नहीं लेनी थी।"

भारत में भी आम है ये 'शिकायत बाद में, समस्या अभी छुपाओ' वाली आदत

अगर आप सोच रहे हैं कि ये सब बस विदेशों में होता है, तो ज़रा गौर करिए। हमारे यहाँ भी कितने लोग ऑफिस, बैंक या दुकान में कोई दिक्कत हो, तो वहीं बोलने के बजाय बाद में सोशल मीडिया पर या मोहल्ले की बैठकों में शिकायत करते हैं! एक मजाक मशहूर है – "दूध फट जाए तो ग्राहक दुकानदार से नहीं, पड़ोसी से कहता है।"

रेडिट पर भी कई लोगों ने अपने अनुभव साझा किए। एक कमेंट में लिखा था, "मेरे यहाँ ग्राहक नहाने के पानी का प्रेशर कम होने पर फोन करता है – खुद को प्लम्बर बताता है, लंबा भाषण देता है, पर जब मैं रूम नंबर पूछकर मदद का वादा करता हूँ, तो फोन काट देता है।"

एक और मजेदार किस्सा – एक ग्राहक ने किचन सिंक में पानी कम आने की शिकायत की। रिसेप्शनिस्ट औज़ार लेकर पहुंचा, ग्राहक बोला – "ये पूरी बिल्डिंग का प्रेशर कम है, मुझे छूट चाहिए!" रिसेप्शनिस्ट ने सिंक का 'एरेटर' खोल दिया, और पानी इतना तेज़ आया कि सब हैरान! ग्राहक की पत्नी मुस्कुराती रही, और जनाब का सिर शर्म से झुक गया।

शिकायत करने का सही तरीका – तुरंत बोलो, मौका दो!

एक और उपयोगकर्ता ने बड़ी सच्ची बात लिखी – "मैं अपने मेहमानों को कहता हूँ, जहाँ भी घूमने जाएँ, अगर कोई दिक्कत हो, तुरंत होटल या एजेंट को बताएँ। बाद में शिकायत करोगे, तो मैं भी क्या कर लूँगा?"

यही बात भारतीय संदर्भ में भी बिल्कुल फिट बैठती है। सोचिए, आप शादी में गए, खाने में नमक कम लगा – आप कुक को बोल दें तो स्वाद सुधर सकता है, पर बाद में घर आकर बड़बड़ाने से क्या होगा?

जैसा एक और कमेंट में मजाकिया अंदाज़ में लिखा – "खाना खा के प्लेट खाली कर दी, और फिर शिकायत कर दी कि स्वाद अच्छा नहीं था!"

ऑनलाइन रिव्यू – जुबां से न सही, कीबोर्ड से शिकायत करना आसान!

रेडिट पर एक और कमेंट आया – "कई लोग सामने कुछ नहीं बोलते, पर ऑनलाइन खूब बोल जाते हैं। असल में, लोगों को सामने बोलना टकराव लगता है, पर इंटरनेट पर अनजान बनकर बोलना आसान है।"

आजकल हमारे यहाँ भी यही चलन है। होटल हो या रेस्टोरेंट, लोग ऑनलाइन रिव्यू में कट-पेस्ट शिकायतें लिख देते हैं, पर मैनेजर के सामने शरमा जाते हैं। एक होटल मैनेजर ने बड़ी अच्छी राय दी – "अगर कोई शिकायत है, बताइए, हम तुरंत हल करेंगे। अगर नहीं कर पाए, तब शिकायत का हक बनता है।"

निष्कर्ष: अगली बार समस्या हो, तो 'शिकायत बाद में' नहीं, 'समाधान अभी' अपनाएँ

तो भाइयों और बहनों, अगली बार जब आप होटल, रेस्टोरेंट, या कहीं भी जाएँ और कोई दिक्कत हो, तो वहीं के वहीं बता दीजिए। आँखे तरेरने या बाद में ऑनलाइन 'रिव्यू' लिखने से अच्छा है कि सामने वाले को मौका दें – क्या पता वो आपकी बात सुनते ही समस्या हल कर दे!

और होटल वालों के लिए भी एक सीख – हर शिकायत को नोट करें, क्योंकि कभी-कभी ग्राहक की शिकायत समाधान से ज़्यादा 'फ्री में कुछ' पाने के लिए होती है। जैसे एक कमेंट में लिखा गया – "कुछ लोग तो जानबूझकर शिकायतें नहीं बताते ताकि बाद में मुआवजा मिल सके!"

आपका क्या अनुभव है? नीचे कमेंट में जरूर बताइए – क्या आपको भी कभी ऐसा कोई ग्राहक मिला, या आपने खुद कभी ऐसे हालात झेले हैं?

शुक्रिया और अगली बार होटल जाएँ, तो 'रिसेप्शनिस्ट अंकल' को ज़रूर याद करिएगा!


मूल रेडिट पोस्ट: IF YOU TELL ME I CAN HELP YOU!