मैराथन में खुद को हीरो समझने वाले मेहमान की अनोखी कहानी
कहते हैं, 'अपनी तारीफ खुद करना, कभी-कभी भारी पड़ जाता है!' होटल रिसेप्शन पर काम करने वालों के पास ऐसी-ऐसी कहानियाँ होती हैं, जिन्हें सुनकर आप हँसी रोक नहीं पाएंगे। हाल ही में शेमरॉक मैराथन वीकेंड के दौरान एक ऐसे ही 'महान' मेहमान की दास्तान सामने आई, जो खुद की तारीफों के पुल बाँधते-बाँधते आखिरकार खुद ही फँस गया।
अगर आपने कभी बड़े शहरों में या टूरिस्ट जगहों पर मैराथन जैसी प्रतियोगिताएँ देखी हों, तो समझ सकते हैं कि वहाँ का माहौल बिल्कुल मेला जैसा होता है। हर कोई खुद को 'सुपरस्टार' समझता है, और कुछ तो ऐसे कि लगता है जैसे उनके बिना मैराथन अधूरी रह जाएगी!
हर कोई हीरो, कोई नहीं खास
मैराथन वाले वीकेंड पर होटल रिसेप्शन की रौनक ही अलग होती है। हर कमरे में धावक, हर कोने में उनकी बातें — "मैंने इतनी दूर दौड़ा", "मेरी टाइमिंग इतनी शानदार रही", "मेरे कलेक्शन में इतने मैडल हैं" वगैरह-वगैरह। लेकिन इस बार तो हद ही हो गई!
एक जनाब आए, उम्र करीब तीस के आसपास, चेहरे पर आत्मविश्वास (या कहें घमंड) और साथ में उनकी पत्नी, जो वाकई आकर्षक थीं। हमारे देश में अक्सर ऐसा देखा जाता है कि शादीशुदा जोड़े एक-दूसरे का सम्मान रखते हैं, लेकिन यहाँ जनाब पूरी तरह खुद की तारीफ में लगे हुए थे। BMW कार, ब्रांडेड जूते, और बातें ऐसी, जैसे ओलंपिक जीतकर आए हों। होटल की रजिस्टर पर दस्तखत करते-करते वे अपनी मैराथन 'महारत' का पूरी रिसेप्शन टीम को पाठ पढ़ा गए।
घमंड का गुब्बारा एक पल में फुस्स
मैराथन के दिन सुबह से ही होटल में गहमा-गहमी थी। सभी धावक मैदान में थे। लेकिन दोपहर होते-होते वही 'मिस्टर मैराथन' की पत्नी रिसेप्शन पर घबराई हुई आईं। पता चला, महोदय दौड़ते-दौड़ते बीच में ही बुरी तरह क्रैम्प का शिकार हो गए और मेडिकल टेंट में पहुँच गए। इधर उनकी पत्नी ने बिना रुके पूरी 26.2 मील की दौड़ पूरी की और वापस होटल आईं, एकदम ताज़ा-तरीन!
अब होटल स्टाफ की जिम्मेदारी थी कि पति महोदय का पता लगाएँ। आधे घंटे तक फोन घुमाए गए, इधर-उधर पूछताछ हुई, आखिरकार पता चला कि 'मिस्टर मैराथन' मेडिकल टेंट में आराम फरमा रहे हैं। यहाँ एक कमेंट में किसी ने मज़ेदार बात लिखी — "लगता है जनाब खुद को साबित करने के चक्कर में हद से ज्यादा तेज़ दौड़ गए, और नतीजा सामने है!"
बड़बोलेपन की कीमत
अगले दिन जब ये जोड़ा चेक-आउट करने आया, तो पति महोदय का चेहरा बता रहा था कि रात भर कितनी 'मैराथन' चल चुकी है। थके-हारे, सुस्त हालात में भी उन्होंने रिसेप्शन पर एक बार फिर खुद की तारीफ कर ही डाली — "ये मेरी चौथी या पाँचवीं बेस्ट टाइमिंग रही!"
इतना सुनते ही रिसेप्शनिस्ट मन ही मन मुस्कुरा दिए, क्योंकि सच्चाई तो सब देख ही चुके थे। एक और कमेंट में किसी ने चुटकी ली, "ये तो वही बात हो गई — किया धरा कुछ और, ढोल पीटा कुछ और!"
यहाँ एक और मज़ेदार कमेंट का ज़िक्र करना ज़रूरी है — "शायद जनाब अपनी बीवी या बाकी धावकों को इम्प्रेस करने के चक्कर में अपनी हदें पार कर गए और खुद ही मुसीबत में फँस गए।" सच कहें, तो हमारे यहाँ भी कई बार लोग शादी-ब्याह, समाजिक आयोजनों या ऑफिस मीटिंग में खुद को बड़ा साबित करने के लिए ओवरएक्टिंग कर बैठते हैं, और फिर मज़ाक का पात्र बन जाते हैं।
सीख क्या है?
मूल कहानी से एक सीधी-सी सीख मिलती है — खुद की तारीफ करने से कहीं बेहतर है, अपने काम से लोगों को इम्प्रेस करना। और अगर कभी खुद को 'सुपरस्टार' समझने लगें, तो याद रखिए, हर भीड़ में हम जैसे हजारों लोग होते हैं।
रिसेप्शनिस्ट ने जाते-जाते सिर्फ इतना कहा — "धन्यवाद, सुरक्षित यात्रा की शुभकामनाएँ!" बस, बात खत्म।
अंत में एक मुस्कान
किसी ने कमेंट में लिखा, "जनाब इतनी कोशिश कर रहे थे इम्प्रेस करने की, लेकिन असली हीरो तो उनकी पत्नी निकली, जो बिना किसी शोरशराबे के पूरी दौड़ ताज़गी के साथ पूरी कर गईं!"
तो अगली बार जब आप खुद को 'हीरो' समझें, तो ध्यान रखें — कई बार असली हीरो वे होते हैं, जो बिना बोले, चुपचाप अपना काम कर जाते हैं।
आपका क्या अनुभव रहा ऐसे 'बड़बोले' लोगों से? कमेंट में जरूर बताइएगा, और अगर कहानी पसंद आई हो तो शेयर करना न भूलें!
मूल रेडिट पोस्ट: Last guest story of the night