मीटिंग्स जो सिर्फ ईमेल में हो सकती थीं: नाइट शिफ्ट कर्मचारियों की व्यथा
क्या आपने कभी सोचा है कि ऑफिस की मीटिंग्स असल में कितनी ज़रूरी होती हैं? या फिर, क्या वे सिर्फ वक्त की बर्बादी हैं? खासकर जब आप रात की शिफ्ट में काम करते हों, और आपको अपने नींद के समय में मीटिंग के लिए बुला लिया जाए! आज की कहानी ठीक इसी मुद्दे पर है – और यकीन मानिए, इसमें आपको हंसी भी आएगी और कुछ कड़वी सच्चाई भी समझ आएगी।
रात की शिफ्ट और दिन की मीटिंग: ये अन्याय कब तक?
हमारे कहानी के नायक, जो कि एक होटल के फ्रंट डेस्क पर नाइट शिफ्ट में काम करते हैं, को ठीक शाम 4 बजे मीटिंग के लिए बुलाया जाता है। अब सोचिए, उनके लिए तो यह रात के बीचोंबीच का वक्त है। भारत में भी, जहां लोग अक्सर दिन-रात की शिफ्टों में काम करते हैं – जैसे कॉल सेंटर, अस्पताल, होटल – वहां ये समस्या आम है। ऊपर से, बाहर बर्फ गिर रही थी और सड़कों पर नमक बिखरा पड़ा था, फिर भी साहब जी पैदल चलकर मीटिंग में पहुंचे।
लेकिन मीटिंग में कौन-कौन आया? बस वही असिस्टेंट मैनेजर, जिसकी शिफ्ट खत्म हो रही थी, और दूसरा शिफ्ट वाला कर्मचारी। खुद नायक तो वैसे भी अपनी ड्यूटी पर नहीं होते, सिर्फ मीटिंग के लिए आये। और मीटिंग कितनी देर चली? पूरे 5 मिनट! अब बताइये, नींद खराब करके, ठंड और बर्फ में चलकर अगर सिर्फ 5 मिनट के लिए बुलाया जाये, तो किसका मूड ठीक रहेगा?
'ये सब तो ईमेल में भी हो सकता था!'
इस तरह की मीटिंग्स के बारे में एक कमेंट करने वाले ने बड़ी सही बात कही – "ये सब तो ईमेल में भी हो सकता था!" (सोचिए, अगर हमारे यहाँ भी हर मीटिंग के बाद ऑफिस में चाय की जगह सबको एक-एक मेल मिल जाया करे, तो कितनी राहत मिले!) एक और कमेंट में यह भी कहा गया कि उनके एक शिक्षक दोस्त ने अपनी डायरी पर 'मीटिंग्स जो ईमेल में हो सकती थीं' का टैग ही लगा रखा है।
असल में, ऑफिस मीटिंग्स का बहाना बनाकर कर्मचारियों का कीमती समय और नींद दोनों बर्बाद करना, अपने आप में एक 'भारतीय' परंपरा बनती जा रही है! और यहाँ तो हालत यह थी कि पिछले मीटिंग में भी केवल एक अन्य व्यक्ति आया था, बाकी कोई नहीं। उन्हीं की तरह भारत के कई लोग भी मीटिंग्स के लिए लंबा सफर तय करते हैं, ट्रैफिक में फंसते हैं, और फिर भी काम की बात बस चंद मिनटों में खत्म हो जाती है।
नाइट शिफ्ट कर्मचारियों की सुनो!
कई कमेंट्स में नाइट शिफ्ट कर्मचारियों की पीड़ा खुलकर सामने आई। एक सज्जन ने लिखा – "मैंने अपने मैनेजर को साफ कह दिया कि मैं रात की शिफ्ट करता हूँ, दिन में मीटिंग्स में नहीं आ सकता। अगर बहुत ज़रूरी हो तो मेरी शिफ्ट का कोई और इंतज़ाम कर लो, क्योंकि नींद से समझौता नहीं कर सकता।"
एक और मज़ेदार सुझाव आया – "अगर आपको बुलाया ही गया है, तो पजामा पहनकर, नींद में ही पहुँच जाओ। शायद तब मैनेजमेंट को समझ आ जाएगा कि ये समय आपके लिए दिन का नहीं, रात का है।" भारत में तो कई लोग मीटिंग में चाय-कॉफी की मग लिए, बेमन से बैठे मिलेंगे, लेकिन पजामे में आना तो अलग ही लेवल का विरोध है!
मैनेजमेंट की जिम्मेदारी और हल
एक अनुभवी मैनेजर ने कमेंट किया – "मैं रात की शिफ्ट वाले कर्मचारियों के लिए मीटिंग्स को हमेशा वैकल्पिक रखता हूँ। अगर ज़रूरी हो, तो अलग से उनकी सुविधा अनुसार जानकारी देता हूँ।" यही सोच हमारे यहाँ भी अपनाई जानी चाहिए।
सोचिए, अगर हॉस्पिटल या होटल में कोई रातभर जागकर काम करता है और अगले दिन उसे मीटिंग के लिए बुलाया जाये, तो उसकी कार्यक्षमता पर भी असर पड़ेगा। आखिर, हर कोई चाहता है कि उसका सम्मान हो और उसकी मेहनत की कद्र हो।
कुछ लोगों ने ये भी बताया कि अमेरिका के कई राज्यों में नियम है – अगर आपको मीटिंग के लिए बुलाया जाता है, तो कम से कम 2-3 घंटे की सैलरी दी जानी चाहिए, चाहे मीटिंग 10 मिनट की हो। भारत में भी ऐसी बातें धीरे-धीरे चर्चा में आ रही हैं, लेकिन अभी तक जागरूकता कम है।
निष्कर्ष: मीटिंग का मतलब, मेल में बता दो!
कहानी के नायक ने अंत में कह ही दिया कि अब वे ऐसी मीटिंग्स में नहीं आएँगे, जिसमें उनकी नींद और समय की कदर न हो। और असिस्टेंट मैनेजर भी मान गईं।
सच कहें तो, आज की डिजिटल दुनिया में, छोटी-छोटी जानकारियाँ मेल या वॉट्सएप ग्रुप में ही भेजी जा सकती हैं। मीटिंग्स सिर्फ तब होनी चाहिए जब वाकई चर्चा या brainstorming ज़रूरी हो। बाकी सब – "भैया, मेल भेज दो!"
आपका क्या अनुभव है? क्या आपके ऑफिस में भी ऐसे '5 मिनट की मीटिंग्स' होती हैं, या फिर आप भी कभी पजामे में ही पहुँच गए? अपने अनुभव नीचे कमेंट में ज़रूर शेयर करें!
(और हाँ, अगली बार कोई आपको अनावश्यक मीटिंग के लिए बुलाये, तो ये ब्लॉग जरूर दिखा देना!)
मूल रेडिट पोस्ट: Employee meetings