मैकडोनाल्ड्स की लालसा और केविन की नौकरी का ‘बर्गर’ – जब ब्रेक बना ब्रेकअप!
क्या आपने कभी सोचा है कि काम के दौरान अचानक कुछ खाने का मन करे और उसी चक्कर में आपकी नौकरी ही चली जाए? जी हाँ, आज हम एक ऐसी ही घटना की बात करने जा रहे हैं, जहाँ केविन नामक युवक की मैकडोनाल्ड्स की भूख, उसकी नौकरी का आखिरी ‘ऑर्डर’ बन गई। इस कहानी में है हास्य, हैरानी और थोड़ा सा ‘क्या सोच रहे थे, केविन?’ वाला मसाला—जो हर भारतीय दफ्तर या दुकान में कभी न कभी चर्चा में आ ही जाता है।
ब्रेक का बवाल: दस मिनट की छुट्टी, पंद्रह मिनट की दूरी!
हमारे देश में भी दुकानों या मॉल में काम करने वाले कर्मचारियों को छोटी-छोटी ब्रेक दी जाती हैं, ताकि वो थोड़ा सुकून पा सकें—कोई चाय पीता है, कोई नमकीन खाता है या फिर वॉट्सएप पर स्टेटस चेक कर आता है। लेकिन यहाँ कहानी थोड़ी अलग है। केविन को मिली थी दस मिनट की छुट्टी, और उसका मन हो गया मैकडोनाल्ड्स के बर्गर पर। अब सोचिए, जब पेट में चूहे दौड़ रहे हों और सामने बर्गर का सपना हो, तो कौन सा केविन खुद को रोक पाएगा?
पर यहाँ गड़बड़ ये थी कि दुकान से मैकडोनाल्ड्स की दूरी करीब दस से पंद्रह मिनट पैदल थी। यानी, केविन के पास था दस मिनट का ब्रेक और रास्ता था कम से कम बीस-तीस मिनट का। अब इस गणित में केविन पास तो हो नहीं सकता था। हुआ भी यही—केविन अपनी मस्ती में चला गया, लेकिन जब तक लौटा, मैनेजमेंट उसकी तलाश में सर्किट बना चुका था। एक कमेंट करने वाले ने चुटकी ली—“तो भाई, आधा घंटा पैदल जाने में और लौटने में, केविन ने नया ही रिकॉर्ड बना दिया!”
मैनेजमेंट की चिंता और साथियों की ‘लंच ब्रेक’ की बाट
अब सोचिए, आपकी पूरी टीम काम में लगी है, और एक सदस्य अचानक गायब हो जाए। बाकी लोग तो बेचारे सोचेंगे, “कहाँ गया ये?” हमारे यहाँ भी अकसर ऐसे मौके आते हैं जब कोई ऑफिस में ‘गायब’ हो जाता है और बाकी साथी वेटिंग लिस्ट में आ जाते हैं—“भैया, मेरा लंच कब होगा?”
केविन के साथी ने भी यही महसूस किया। वो अपनी शिफ्ट के दो-चार घंटे पूरे कर चुका था और इंतजार कर रहा था कि केविन लौटे, ताकि वो भी लंच पर जा सके। पर केविन का तो ‘ब्रेक’ सीधा ब्रेकअप बन गया! एक और कमेंट में किसी ने लिखा—“भैया, टाइमिंग की गणना मत बताओ, बस इतना बताओ, केविन कितनी देर तक गायब था!” इस पर खुद पोस्ट लिखने वाले ने साफ किया—“वो लगभग एक घंटे के लिए गायब था, मेरी शिफ्ट के बीच में ही।”
नौकरी गई, पर बर्गर का स्वाद रह गया
हमारे यहाँ कहावत है, ‘भूख सब्र नहीं जानती।’ लेकिन ऑफिस या काम की मर्यादा भी कोई चीज़ होती है। केविन का बर्गर तो पेट में चला गया, पर नौकरी हाथ से निकल गई। मैनेजमेंट ने आते ही उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया—यानि, ‘मैकडोनाल्ड्स बाहर और नौकरी भी बाहर।’ किसी ने मज़ाक में लिखा—“बाय-बाय केविन!” और एक और कमेंट में मज़ेदार सुझाव आया—“मैकडोलैंड्स नाम का नया रेस्तरां खोल दो, जहाँ हर कोई बिना टाइम लिमिट के खा सके।”
इसी तरह की घटनाएं भारत के दफ्तरों में भी होती हैं—कभी चाय के ठेले पर लंबा ब्रेक, कभी ऑफिस कैंटीन में लंबी गपशप। लेकिन अंत में सीख यही है—काम के समय को लेकर लापरवाही कभी-कभी भारी पड़ जाती है।
सीख और हँसी—केविन की कहानी से क्या समझें?
केविन की दास्तां पर चर्चा करते हुए एक पाठक ने बढ़िया टिप्पणी की—“भैया, चाहे बर्गर जितना भी स्वादिष्ट हो, नौकरी सबसे ऊपर है।” और सच भी यही है। काम के दौरान छोटी-छोटी इच्छाओं को अगर समय और मर्यादा के साथ न निभाया जाए, तो नतीजा भुगतना पड़ सकता है। साथ ही, यह भी सीख है कि हर ऑफिस में एक न एक केविन मिल ही जाता है, जो अपनी हरकतों से सबको हैरान कर देता है।
आखिर में, हम सबके भीतर थोड़ा-सा केविन छिपा रहता है, जो कभी-कभी नियमों को भूलकर दिल की सुन लेता है। लेकिन याद रखिए—ऑफिस का टाइम है, तो टिफिन खोलिए, बर्गर की तलब ऑफिस के बाद ही शांत कीजिए!
आपकी राय?
क्या आपके ऑफिस या कॉलेज में कभी किसी ने ऐसी हरकत की है? क्या आपको भी कभी अपनी पसंदीदा डिश के लिए ऑफिस के नियमों की अनदेखी करनी पड़ी है? अपनी मज़ेदार या चटपटी कहानियाँ नीचे कमेंट में जरूर साझा करें। और अगर आपको केविन की कहानी पसंद आई, तो इसे अपने दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें—शायद अगली बार कोई ‘केविन’ बनने से पहले दो बार सोचे!
मूल रेडिट पोस्ट: Kevin fired for eating out.